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इन्सान अब बुत बनने लगे हैं - हास्य व्यंग्य कविताएँ

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: असली इंसानों के चेहरे अब बुत की तरह नजर आते। लिखता कोई और संवाद, वह बोलते हुए दिख जाते।। बहुत पढ़ लि … more →

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थप्पड़ मारकर सलाम तो किया-तीन क्षणिकायें

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: कुत्ता कहा तो क्या इनाम तो दिया आखिर गोरों ने दिया गुलाम की तरह व्यवहार किया तो क्या थप्पड़ मारकर सल … more →

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गंगा और यमुना नदियों की तरह होता है हिन्दी भाषा का दोहन-आलेख

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: अंतर्जाल पर हिंदी में सक्रिय कई ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिन्हें लिखते हुए छह साल हो गये हैं। उन लोगों की … more →

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भर्तृहरि शतकः विश्व में परिवर्तन आना स्वाभाविक

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् हिंदी में भावार्थ-परिवर्त … more →

Tags: Hindi knowledge, Hindu darshan, Hindu culture, hindi bharat, hindi india, hindu dharm, web duniya, Hindi vews, hindi megzine

मस्त राम...............की हिप हुर्र हुर्र1 comment

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: अपने कुछ ब्लाग/पत्रिका का नामकरण हमने मस्तराम के नाम पर आज कर ही दिया। आज होली का पर्व है और एक लेखक … more →

Tags: अभिव्यक्ति, इंटरनेट, चिंतन, दीपक भारतदीप, मस्तराम, रचना, व्यंग्य, संपादकीय, साहित्य

रहीम के दोहे: जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार के उपयोग की बात सोचना बेकार

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकले राम पावत पूरन परम गति, कामादिक कौ धाम कविवर रहीम कहते हैं कि अगर धो … more →

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कुछ खोई हुई

mequitnever wrote 3 weeks ago: आज मैं अपने डेस्क को ठीक कर रहा था और कहीं कोने से मेरे हाथ एक फोल्डर लगा | उस फोल्डर में रंगीन कगाज … more →

Tags: ज़िन्दगी life, Life, angry, Awareness, कविता, कवितायें, हिंदी कविता, हिंदी कवितायें, death

माक्यावैली के प्रसिद्ध कथन, " द प्रिन्स " से

mequitnever wrote 1 month ago: माक्यावैली की किताब "द प्रिन्स", 1532 में प्रकाशित निकोलो माक्यावैली द्वारा, इतालवी भाष … more →

Tags: ज्ञान, Political Science, Politics, Famous Quotations, flornce, Italy, Life, Machiavelli, Pain

परीक्षा परिणाम-हास्य व्यंग्य कविता 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: उतरा मूंह लेकर फंदेबाज घर आया और बोला- ‘दीपक बापू, बड़ा बुरा दिन आया हाईस्कूल के इम्तहान में मोहल्ले … more →

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मुस्कराहट का मुखौटा-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: बेकद्रों की महफिल में मत जाना बहस के नाम पर वहां बस कोहराम मचेगा पर कौन, किसकी कद्र करेगा। मुस्करा … more →

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आशीर्वाद-लघुकथा2 comments

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: वह युवक गरीब था तब संत के पास जाता था। वह उनके यहां आश्रम की साफ सफाई करता और फिर अपने काम पर चला ज … more →

Tags: दीपक द्वारा, दीपक भारतदीप, मस्तराम, समाज, साहित्य, सृजन, हिन्दी, Deepak bapu, Deepak bharatdeep

गुलामी जैसी आज़ादी-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: नजरें फेरकर वह चले जाते हैं। देखने में लगते हैं हमसे बेपरवाह पर हकीकत यह है कि हमारी आंखों में उनको … more →

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‘‘मैं कुर्सी हूं, किसी की सगी नहीं’’-हास्य व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: कुर्सी पर चाहे लिपिक लिखा हो या महाप्रबंधक बस वह मिलना चाहिए। अपने घर में जिस पर स्वयं बैठ सकें वह ल … more →

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मनुस्मृति-अपशब्द का उत्तर अपशब्द से न दें

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह हिंदी में भावार्थ-अध्यात्म वि … more →

Tags: अभिव्यक्ति, आध्यात्म, दीपक भारतदीप, दीपकबापू, धर्म, मातृभाषा, हिन्दी, हिन्दी पत्रिका, Culture

संत कबीरदास के दोहे-भगवान के साथ चतुराई मत करो

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: सिहों के लेहैंड नहीं, हंसों की नहीं पांत लालों की नहीं बोरियां, साथ चलै न जमात संत शिरोमणि कबीर दास … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, इंटरनेट, दीपक भारतदीप, धर्म, मस्त राम, हिन्दी, हिन्दी पत्रिका

रहीम दास के दोहे:स्वार्थ के कारण हुआ प्रेम घटता जाता है 1 comment

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: कविवर रहीम कहते हैं कि ——————- वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछ … more →

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बाजार की आस्था या आस्था का बाजार-हास्य व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: कहीं न्यूजीलैंड में इस बात को लेकर लोग नाराज है कि ‘हनुमान जी पर कंप्यूटर गेम बना दिया गया है और बच् … more →

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चाणक्य नीतिः महल पर बैठने से कौआ गरुड़ नहीं हो जाता।

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरंगः। तथापि तृष्णा रघुनंदनस्य विनाशकाले विपरीत बुद्ध … more →

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रहीम दास के दोहे: पशु अपना हित करने वाला गुड़ कभी नहीं खाते

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: कविवर रहीम कहते हैं रहिमन आलस भजन में, विषय सुखहिं लपटाय घास चरै पसु स्वाद तै, गुरु गुलिलाएं खाय म … more →

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