कुछ गिरा है, मै यहां पर क्या गिरा है देख लूँ है लहू किसका ये उसका या मिरा है देख लूँ मै नहीं जाता था बुतखाने मगर आया हूँ अब सुन रहा हूँ के यहां चेहरा तिरा है, देख लूँ मै चला था जिस जगह से फिर वहीं पर … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 9 months ago: कुछ गिरा है, मै यहां पर क्या गिरा है देख लूँ है लहू किसका ये उसका या मिरा है देख लूँ मै नहीं जाता था … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं, जितना थामूं उड़ जाते हैं इन रस्तों में कुछ गड़बड़ है, उसकी जानिब मुड़ जाते हैं … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: ज़मीन भी जाती रही और आसमान भी ना रहा पर कटे परिंदे में उड़ने का अरमान भी ना रहा पहले तो अपने होने का व … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: दुख के चेहरे पर लकीरें याद की सुन रहा हूं सदा दिलेबरबाद की तेरी महफ़िल तेरा परचम ओ’ हुजूम अब कि … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे बंद आँखों में छुपा के प्यार रख लेंगे एक पल क्या है तू जो कह दे तो तम … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं होता नहीं है बेक़ार करते हैं हमको मालूम है वो है बेवफ़ा फिर भी हम ऐतबार … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: कुछ ख्वाब सजा रखे हैं निगाहों के आसपास कुछ गुल खिला रखे हैं निगाहों के आसपास तू मुत्तसिल हो तो ही तो … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: बेबाक हुस्न देखा तेरी क़ज़-अदाएं देखीं एक पल में ही जहाँ की सारी बलाएं देखीं कभी आसमां में इतने बादल न … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: एक पल में ही हज़ारों मुद्दतों की बात हो ज़हन में जो ले रहीं उन करवटों की बात हो आओ बोलें प्यार के इख़ला … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर क्या कमी थी प्यार में रिश्ते गया सब तोड़कर देख तू आ के ज़रा मेरी … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: ज़मीं पे पैर रखो आसमान हो जाओ जिसे दोहराये जहां दास्तान हो जाओ बेखबरी के आलम से मुल्क लरज़ाया सा है टि … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम ह … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है कोई साज़ नहीं है कानों में शहनाई सी है हाय तमाशा क्या लगा है … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: वक़्त का मुसाफ़िर छीनकर सफ़हा मेरा ले जायेगा वो इस ज़बाँ से उस ज़बाँ ये किस्सा ले जायेगा दुआ माँगी तो थी … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: मंज़िलें दिखती नहीं बस छा रहीं हैं दूरियाँ रास्ते मुश्किल किये पास आ रहीं हैं दूरियाँ हर क़दम पर बिछ र … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: रात सूनी सूनी है और सहर खामोश है तुम चले गये तो सारा शहर खामोश है कैसा तन्हा है समाँ ताज़ीर-ए-खामोशी … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये ज़िंदगी साहिलों पर अटकी हुई है अब … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: पहलू में मेरे फिर दिल-ए-बरबाद आया है वो शख्स आज फिर मुझे क्यों याद आया है हर राह पर करता फ़िरा ये प्य … more →