Blogs about: February

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February 16 top world news

Praful wrote 4 months ago: * Chavez declares victory in Venezuela referendum February 16, 2009 Venezuelan President Hugo … more →

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Valentine's Day

Praful wrote 4 months ago: Every February, across the country, candy, flowers, and gifts are exchanged between loved ones, … more →

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देख लूँ3 comments

Rohit Jain wrote 9 months ago: कुछ गिरा है, मै यहां पर क्या गिरा है देख लूँ है लहू किसका ये उसका या मिरा है देख लूँ मै नहीं जाता था … more →

Tags: 2008 A Poetic Journey, मेरी गज़लें, Feb 2008, 2008, Add new tag, कविता, गज़ल, जैन, देख

खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं6 comments

Rohit Jain wrote 1 year ago: खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं, जितना थामूं उड़ जाते हैं इन रस्तों में कुछ गड़बड़ है, उसकी जानिब मुड़ जाते हैं … more →

Tags: मेरी गज़लें, 2008 A Poetic Journey, Feb 2008, रोहित, जैन, गज़ल, कविता, Rohit, jain

ना रहा1 comment

Rohit Jain wrote 1 year ago: ज़मीन भी जाती रही और आसमान भी ना रहा पर कटे परिंदे में उड़ने का अरमान भी ना रहा पहले तो अपने होने का व … more →

Tags: 2007 A Poetic Journey, मेरी गज़लें, Feb 2007, 2007, कविता, गज़ल, जैन, ना, रहा

दुख के चेहरे पर लकीरें याद की5 comments

Rohit Jain wrote 1 year ago: दुख के चेहरे पर लकीरें याद की सुन रहा हूं सदा दिलेबरबाद की तेरी महफ़िल तेरा परचम ओ’ हुजूम अब कि … more →

Tags: मेरी गज़लें, 2008 A Poetic Journey, Feb 2008, की, रोहित, जैन, गज़ल, कविता, Rohit

हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे1 comment

Rohit Jain wrote 1 year ago: हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे बंद आँखों में छुपा के प्यार रख लेंगे एक पल क्या है तू जो कह दे तो तम … more →

Tags: मेरी गज़लें, 2008 A Poetic Journey, Feb 2008, एक, रोहित, जैन, गज़ल, कविता, Rohit

सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं1 comment

Rohit Jain wrote 1 year ago: सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं होता नहीं है बेक़ार करते हैं हमको मालूम है वो है बेवफ़ा फिर भी हम ऐतबार … more →

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निगाहों के आसपास

Rohit Jain wrote 1 year ago: कुछ ख्वाब सजा रखे हैं निगाहों के आसपास कुछ गुल खिला रखे हैं निगाहों के आसपास तू मुत्तसिल हो तो ही तो … more →

Tags: मेरी गज़लें, 2008 A Poetic Journey, Feb 2008, एक, रोहित, जैन, गज़ल, कविता, Rohit

बेबाक हुस्न देखा तेरी क़ज़-अदाएं देखीं

Rohit Jain wrote 1 year ago: बेबाक हुस्न देखा तेरी क़ज़-अदाएं देखीं एक पल में ही जहाँ की सारी बलाएं देखीं कभी आसमां में इतने बादल न … more →

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एक पल में ही हज़ारों मुद्दतों की बात हो1 comment

Rohit Jain wrote 1 year ago: एक पल में ही हज़ारों मुद्दतों की बात हो ज़हन में जो ले रहीं उन करवटों की बात हो आओ बोलें प्यार के इख़ला … more →

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आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर2 comments

Rohit Jain wrote 1 year ago: आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर क्या कमी थी प्यार में रिश्ते गया सब तोड़कर देख तू आ के ज़रा मेरी … more →

Tags: 2008 A Poetic Journey, मेरी गज़लें, Feb 2008, 2008, आज, कविता, क्यों, गया, गज़ल

ज़मीं पे पैर रखो आसमान हो जाओ

Rohit Jain wrote 1 year ago: ज़मीं पे पैर रखो आसमान हो जाओ जिसे दोहराये जहां दास्तान हो जाओ बेखबरी के आलम से मुल्क लरज़ाया सा है टि … more →

Tags: 2008 A Poetic Journey, मेरी गज़लें, Feb 2008, 2008, आसमान, कविता, गज़ल, जाओ, जैन

वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है

Rohit Jain wrote 1 year ago: वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम ह … more →

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दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है

Rohit Jain wrote 1 year ago: दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है कोई साज़ नहीं है कानों में शहनाई सी है हाय तमाशा क्या लगा है … more →

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वक़्त का मुसाफ़िर छीनकर सफ़हा मेरा ले जायेगा

Rohit Jain wrote 1 year ago: वक़्त का मुसाफ़िर छीनकर सफ़हा मेरा ले जायेगा वो इस ज़बाँ से उस ज़बाँ ये किस्सा ले जायेगा दुआ माँगी तो थी … more →

Tags: मेरी गज़लें, 2007 A Poetic Journey, Feb 2007, रोहित, जैन, गज़ल, कविता, Rohit, jain

मंज़िलें दिखती नहीं बस छा रहीं हैं दूरियाँ

Rohit Jain wrote 1 year ago: मंज़िलें दिखती नहीं बस छा रहीं हैं दूरियाँ रास्ते मुश्किल किये पास आ रहीं हैं दूरियाँ हर क़दम पर बिछ र … more →

Tags: मेरी गज़लें, 2007 A Poetic Journey, Feb 2007, रोहित, जैन, गज़ल, कविता, Rohit, jain

रात सूनी सूनी है और सहर खामोश है

Rohit Jain wrote 1 year ago: रात सूनी सूनी है और सहर खामोश है तुम चले गये तो सारा शहर खामोश है कैसा तन्हा है समाँ ताज़ीर-ए-खामोशी … more →

Tags: 2007 A Poetic Journey, मेरी गज़लें, Feb 2007, 2007, और, कविता, खामोश, गज़ल, जैन

ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये

Rohit Jain wrote 1 year ago: ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये ज़िंदगी साहिलों पर अटकी हुई है अब … more →

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