जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे जिससे मिलते हैं वह पुल टूट गया बारिश बाढ़ बनी कि फिर हाथों से हाथ छूट गया उम्मीदें क्यों रखते हैं ज… more →
तख़लीक़-ए-नज़रSulabh wrote 1 year ago: बाढ़… बाढ़… बाढ़…! तबाही… तबाही… तबाही… !!राहत कार्य प्रभावी नही … more →
विनय wrote 1 year ago: जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे … more →