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	<title>food-for-though &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/food-for-though/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "food-for-though"</description>
	<pubDate>Wed, 09 Jul 2008 14:09:05 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[सबक]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=243</link>
<pubDate>Fri, 16 May 2008 18:32:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
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<description><![CDATA[
कई काम दूर से बहुत कठिन दिखते हैं,लेकि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li>कई काम दूर से बहुत कठिन दिखते हैं,लेकिन एक बार शुरू कर दें तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं।</li>
<li>असंभव कुछ नही होता। बस थोडे से अतिरिक्त प्रयास की जरूरत होती है।</li>
<li>There is always scope for improvement.</li>
<li>प्राथमिकताएं तय करना बहुत जरूरी है, अन्यथा काफी समय उन कार्यों में नष्ट हो जाता है, जिनकी जरूरत नही थी ।</li>
<li>कब क्या किसे कह रहे हैं, इस बारे में बहुत सावधान रहना चाहिय। ना जाने कब कौन सी बात उलटी पड जाये ।</li>
<li>Never React, Always Respond. तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिये। समय लेकर ठंडे दिमाग से सोंच कर अपनी बात कहनी चाहिये। ('चक दे इंडिया' में एक संवाद था, 'हर लडाई उसी समय नही लडी जाती, कुछ बाद के लिये भी छोड देना चाहिये'।)</li>
<li>Nobody is indispensable. हमारे पहले भी दुनिया थी और हमारे बाद भी दुनिया चलेगी।</li>
<li>हर काम, छोटे सा छोटा, अथवा बडा से बडा, कुछ सीखने का अवसर देता है, बशर्ते हम सीखने को तैयार हों।</li>
<li>Never ever believe things which looks too obvious.</li>
<li>Never judge people, based on first impression or their looks. Take time.</li>
<li>COMMUNICATE. विवाद कितने भी हो जायें, संवाद बना रहना चाहिये। अक्सर एक फोन काल कई सारी गलतफहमियों को दूर करने के लिये काफी होती है।</li>
</ul>
<p>इनमें से कुछ सबक खुद ठोकर खाकर सीखे हैं, कुछ दूसरों को देख कर। ये बात अलग है कि ये जानने और दिमाग में होने के बावजूद अक्सर गलतियां कर बैठते हैं। यहां लिख दिये हैं ताकि सनद रहे।</p>
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<title><![CDATA[द थ्योरी आफ "कूडे का ट्रक"]]></title>
<link>http://saptrang.wordpress.com/?p=242</link>
<pubDate>Fri, 02 May 2008 07:30:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>Nitin Bagla</dc:creator>
<guid>http://saptrang.wordpress.com/?p=242</guid>
<description><![CDATA[सुबह सुबह किसी बात पर मूड खराब हुआ तो य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सुबह सुबह किसी बात पर मूड खराब हुआ तो यह "कूडे के ट्रक वाला सिद्धांत" याद आ गया। कुछ दिन पहले एक ई पत्र में प्राप्त हुआ था। सार कुछ इस तरह से है।</p>
<blockquote><p>क्या आप एक खराब ड्राइवर, किसी अभद्र कर्मचारी, किसी बदमिजाज दुकानदार के चक्कर में अपना दिन खराब कर लेते हैं? सडक चलते आपसे किसी ने कुछ कह दिया, कोई दुकानदार बद्तमीजी से पेश आया, रेस्तरां में गये और सर्विस अच्छी नही हुई आदि आदि? एक अच्छे/सफल इन्सान का गुण यह है कि वह किस तरह से ऐसी गैरजरूरी बातों को नज़रअंदाज करके अपना ध्यान जरूरी कामों पर लगाये। कूडे के ट्रक का सिद्धांत कहता है कि -</p>
<p>"कई लोग कूडे से भरे ट्रक की तरह होते हैं। वे अपने साथ साथ क्रोध, भय, घृणा, नैराश्य का कचरा अन्दर में समेटे चलते हैं। जैसे जैसे यह कचरा उनके अन्दर भरता चला जाता है, उन्हे इसे कहीं फेंकने की जरूरत महसूस होती है। ठीक कचरे से भरे ट्रक की तरह। हो सकता है बदकिस्मती से आज आप उनके रास्ते में आ गये और उन्होने इसे आपके ऊपर फेंक दिया।</p>
<p><strong>तो अबकी बार कोई अपना <em>कचरा</em> आपके ऊपर इस तरह फेंके, तो इसे दिल पर मत लीजिये। सामने वाले पर तरस खाइये। मुस्कुराकर उसे नजरंदाज कीजिये और खुश रहिये। आप ज्यादा अच्छा और प्रसन्न महसूस करेंगे। और हाँ, ये भी देखें कि कितनी बार हम अपना गुस्सा दूसरों पर उतारते हैं और कचरे के ट्रक की तरह बर्ताव करते हैं।"</strong></p></blockquote>
<p>ई मेल में इसके रचियता का नाम था, David J Polly. थोडा गूगल किया तो पता चला कि "The Law of Garbage Truck" डेविड साहब का ट्रेड मार्क है। वे एक ख्यातनाम वक्ता और लेखक हैं। कचरे के ट्रक वाली कहानी विस्तार से आप <a href="http://pos-psych.com/news/david-j-pollay/20071002426" target="_blank">यहाँ</a> पढ सकते हैं, अंग्रेजी में। इस पर एक <a href="http://www.bewareofgarbagetrucks.com/home" target="_blank">वेबसाइट</a> भी है। <a href="http://www.bewareofgarbagetrucks.com/blog/blogger.html" target="_blank">यहाँ</a> और <a href="http://davidjpollay.typepad.com/david_j_pollay/" target="_blank">यहाँ</a> डेविड साहब के ब्लाग भी हैं।</p>
<p>सिद्धांत सुनने में अच्छा लगता है ना। भारतीय दर्शन पर नज़र डालेंगे तो हमारे यहां इस तरह का दृष्टांत भगवान  बुद्ध के प्रेरक प्रसंगों में मिलता है। जब एक व्यक्ति बुद्ध को खूब गालियां देता है पर वो जरा भी विचलित नही होते। शिष्य के पूंछने पर उसे समझाते हैं कि भई जब वो गालियां मैने स्वीकार ही नहीं कीं तो वो तो उसी के पास रही ना। मुझे लगी ही नही। मुझे उससे क्या फर्क पडता है।</p>
<p>सो नया तो कुछ भी नही है, बचपन से पढते आ रहे हैं, जीवन में उतार सकें तो बात बने।</p>
]]></content:encoded>
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