wrote 3 months ago: बुझती हुई लौ में रूकती हुई साँसों में आपके हर ग़मों के आहों में मैं नहीं मैं तो हु आप … more →
wrote 6 months ago: दर्द कितना है दिल में न जान पाओगे, हम रोज़ अपने ग़म का इश्तेहार नहीं करते, जो आँख से टपकें लहू तो बत … more →
wrote 1 year ago: हर शाम को हम उनका नाम लिया करते हैं दिल के ज़ख्मो को थोड़ा और ताज़ा करते हैं उनकी खुशियों के किस्से … more →
wrote 1 year ago: कभी फूलो कभी बहारो ने लूटा, कभी मझधार कभी किनारों ने लूटा. लुटते रहे कदम कदम पर हम, कभी नजरो कभी इश … more →