ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह (ग़म : sorrows; क़ातिल : murderer; निगाहें : eyes) अपनी नज़रों में गुनहगार न होते, क्यों कर दिल ही दुश्मन हैं मुखालिफ़ … more →
कुछ पल जगजीत सिंह के नामAmarjeet Singh wrote 3 years ago: ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह (ग़म : sorrows; क … more →