दुहरी होने लगी कमर | कन्धों पर भारी है सर | राम-राम आदाब बंद हैं धर्मों में बँट गया शहर | शाम हुई घर जाना है पर कैसा औ’ किसका घर | क्यूँ हर रात सताता है रोज़ सुबह होने का डर | मौसम क्या रुक पाये… more →
Joshi Kaviraiwrote 1 year ago: सारा खेल उधार हो गया | घर भारत सरकार हो गया | उन्हें मुनाफ़ा हमको घाटा यह कैसा व्यापार हो गया | नगरी … more →
wrote 1 year ago: जब तक तेरे पास रहे | एक सुखद एहसास रहे | मुस्काते ही आँसू आए महफ़िल में उपहास रहे | मन में अम्बर का स … more →
wrote 1 year ago: दो बातें दो पल कर देखो | साथ हमारे चल कर देखो | दुनिया इतनी बुरी नहीं है ख़ुद से ज़रा निकल कर देखो | … more →
wrote 1 year ago: सूरज रोज़ सफ़र में है | फ़िर तू ही क्यों घर में है ? अपने बाज़ू तोलो तो पानी हर पत्थर में है | वो परदे … more →
wrote 1 year ago: फिर कोई खिचड़ी पकाई जा रही है | व्याकरण उल्टी पढ़ाई जा रही है | कैद हैं सारे उजाले फाइलों में वक्त पर … more →
wrote 1 year ago: आपका पूरा प्रदर्शन हो गया है | हर जगह पर दूरदर्शन हो गया है | अब न बदलेंगे यहाँ मौसम कभी मुल्क का वा … more →
wrote 1 year ago: केवल उधार है खातों में, कब अन्न पड़ा इन आंतों में, था एक वोट जो सौंप दिया, सरकार! तुम्हारे हाथों में … more →
wrote 1 year ago: फ़ाइलों में फ़सल हो रहे हैं | रेत में भी कमल हो रहे हैं | वक़्त को तुक नहीं मिल रही है आप ताज़ा ग़ज़ल ह … more →