औचक पहुँचे , उस दिन हमने साँझ को शुरु होते देखा चनमा सट्टी चौराहे पर की उस चाय – दुकान में ढलती साँझ हमारे पहुँचने तक जो गहगह होती थी अब जानता हूँ उस चाय – दुकान की साँझ बहुत पह… more →
शैशवअफ़लातून wrote 1 year ago: औचक पहुँचे , उस दिन हमने साँझ को शुरु होते देखा चनमा सट्टी चौराहे पर की उस चाय – दुकान मे … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: वे बच्चे मूँडी गोत कर जिन्हें बारह घण्टे करना होता है काम दरिद्रता के कोख-जाये बेटे लक्ष्मी की अमरबे … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: Technorati tags: हिन्दी कविता, ज्ञानेन्द्रपति, टेडी बियर में बचे हुए भालू, hindi poem, gyanendrapati … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: खेसाड़ी दाल की तरह निन्दित उखाड़कर फेंक दिया जाऊँगा भारतीय कविता के क्षेत्र से उस जगह लाल गाल व … more →