उसने हमसे कभी वफ़ा न की और हमने भी तमन्ना न की बहुत बोलते हैं सब ने कहा सो आदत-ए-कमनुमा न की बहुत आये बहुत गये मगर जान किसी पर फ़िदा न की उसने कही और हमने मानी उसकी कोई बात मना न की ख़ता-ए-इश्क़ के बाद ह… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 5 months ago: उसने हमसे कभी वफ़ा न की और हमने भी तमन्ना न की बहुत बोलते हैं सब ने कहा सो आदत-ए-कमनुमा न की बहुत आये … more →
विनय wrote 9 months ago: धीरे-धीरे ग़म सहना, किसी से कुछ न कहना फ़ितरत ऐसी हो गयी, दिन-रात मरके जीना शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़ … more →
विनय wrote 12 months ago: जो मुझको जानते हैं ज़रा कम जानते हैं जो नहीं जानते हैं ज़रा ज़्यादा जानते हैं जो ढीठ बनके बैठा हुआ है म … more →
विनय wrote 1 year ago: मैं सबसे बुरा था सबसे बुरा हूँ सबसे बुरा ही रहूँगा मैं जी रहा था जी रहा हूँ ऐसे ही जीता रहूँगा उसने … more →
विनय wrote 1 year ago: वह दिल में एक मस्जिद है जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ वह मन मन्दिर की देवी है जिसकी साँझ-सवेरे पूजा क … more →
विनय wrote 1 year ago: ग़म देना उनकी फ़ितरत में शामिल होगा मेरी फ़ितरत तो मुहब्बत देने की रही है दूर रहना उनकी आदत में शामिल ह … more →
विनय wrote 1 year ago: जो होता है भले के लिए होता है ख़ुद को समझने के लिए होता है इंसान की आदत है बदल जाना कि वह बदलने के ल … more →
विनय wrote 1 year ago: आदाब तुझे ऐ मेरे वतन लखनऊ आदाब तुझे मेरे जानो-तन लखनऊ है कभी आईना कभी शराब-सा तू है मेरी शोख़ी मेरा … more →
विनय wrote 1 year ago: माज़ी को बहुत खंघालते हैं लोग बेतरह मतलब निकालते हैं लोग हुआ कब मुझ से उनका बुरा किसलिए नाम मेरा उछाल … more →