भीगी हुई आँखों में तस्वीर तुम्हारी है रूठी हुई हमसे तक़दीर हमारी है मैं दिवाना राहे-इश्क़ का मुसाफ़िर हूँ मेरे पाँव में पड़ी ज़ंजीर तुम्हारी है मैं तेरे लिए अपनी जान तलक दे दूँगा मैं तेरा राँझणा और तू हीर… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 10 months ago: भीगी हुई आँखों में तस्वीर तुम्हारी है रूठी हुई हमसे तक़दीर हमारी है मैं दिवाना राहे-इश्क़ का मुसाफ़िर ह … more →
विनय wrote 1 year ago: तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं वह पहली शाम जब देखा था तुम्हें मैं … more →
विनय wrote 1 year ago: तुम आये क्यों जब तुम्हें जाना ही था मुझसे दूर जाकर मुझे भुलाना ही था बदली-बदली फ़िज़ा में कुछ अपना लगा … more →
विनय wrote 1 year ago: जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे … more →
विनय wrote 2 years ago: हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके हमने हसरते-रफ़ू … more →
विनय wrote 2 years ago: मेरे ही हाथों में टूटा है दम मेरा, तेरे ही स्पर्श से तख़लीक़ हुआ है यह ‘विनय’ अभी-अभी मेर … more →
विनय wrote 2 years ago: एक अधूरी ख़ाहिश लिए मैं भटक रहा हूँ दर-ब-दर, सुनसान ख़ाली सड़कों पर अँधेरा ही अँधेरा है, इन अँधेरों … more →