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	<title>hasya-vyangya &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/hasya-vyangya/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hasya-vyangya"</description>
	<pubDate>Mon, 13 Oct 2008 12:36:35 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

<item>
<title><![CDATA[प्यार ने खलनायक बनाया-हास्य व्यंग्य कवितायें]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/?p=17</link>
<pubDate>Mon, 13 Oct 2008 04:09:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.hi.wordpress.com/2008/10/13/pyar-ne-khalnayak-banaya-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[हमने पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हमने पूछा था अपने दिल को<br />
बहलाने के लिए किसी  जगह का पता<br />
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया<br />
जहां बिकती है दिल की खुशी<br />
दौलत के सिक्कों से<br />
जहाँ पहुंचे तो सौदगरों ने<br />
मोलभाव में उलझा दिया<br />
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी<br />
और दिमाग का चैन<br />
तो इस दुनिया में रहता<br />
हर आदमी क्यों इतना बैचैन<br />
हम घर पहुंचे और सांस ली<br />
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा<br />
जिस चैन को ढूंढते थक गए थे<br />
आखिर उसने ही उसका पता दिया<br />
-------------------<br />
दोस्ती निभाने के वादे<br />
किये नही जाते<br />
निभाए जाते हैं।<br />
जुबान से कहने के<br />
मौक़े आते हैं हर दिन<br />
निभाने के कभी कभी आते हैं।<br />
देखा रोज यह कहने वालों की<br />
भीड़ लगी रहती है कि कोइ<br />
मुसीबत में हमें याद कर लेना<br />
घिरता हूँ जब चारों और से<br />
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं<br />
जो हर पल निभाने की कसमें<br />
सबसे ज्यादा खाते हैंदोस्ती निभाने के वा दे<br />
किये नही जाते<br />
निभाए जाते हैं।<br />
जुबान से कहने के<br />
मौक़े आते हैं हर दिन<br />
निभाने के कभी कभी आते हैं।<br />
देखा रोज यह कहने वालों की<br />
भीड़ लगी रहती है कि कोइ<br />
मुसीबत में हमें याद कर लेना<br />
घिरता हूँ जब चारों और से<br />
वही दोस्त सबसे पहले छोड़ जाते हैं<br />
जो हर पल निभाने की कसमें<br />
सबसे ज्यादा खाते हैं<br />
------------------<br />
कोई भी जब मेरे पास<br />
वादों का पुलिंदा लेकर आता है<br />
मैं समझ जाता हूँ<br />
आज  लुटने का दिन है<br />
पहले सलाम करते हैं<br />
फिर पूछते हैं  हालचाल<br />
फिर याद दिलाते हैं<br />
पुरानी दोस्ती का इतिहास<br />
मैं इन्तजार करता हूँ<br />
उनकी फरमाइश सुनने का<br />
वह सुनाते हैं शब्द चुन चुन कर<br />
दावा यह कि केवल तुम अपने हो<br />
इसीलिये कह रहा हूँ<br />
मैं समझ जाता हूँ<br />
आज एक दोस्त अपने से<br />
सबंध ख़त्म होने का दिन है<br />
________________</strong><br />
<strong><br />
उदास होकर फंदेबाज घर आया<br />
और बोला<br />
‘दीपक बापू, बहुत मुश्किल हो गयी है<br />
तुम्हारे भतीजे ने मेरे भानजे को<br />
दी गालियां और घूंसा जमाया<br />
वह बिचारा तुम्हारी और मेरी दोस्ती का<br />
लिहाज कर पिटकर घर आया<br />
दुःखी था बहुत तब एक लड़की ने<br />
उसे अपनी कार से बिठाकर अपने घर पहुंचाया<br />
तुम अपने भतीजे को कभी समझा देना<br />
आइंदा ऐसा नहीं करे<br />
फिर मुझे यह न कहना कि<br />
पहले कुछ न बताया’</p>
<p>सुनकर क्रोध में उठ खड़े हुए<br />
और कंप्यूटर बंद कर<br />
अपनी टोपी को पहनने के लिये लहराया<br />
फिर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कभी क्या अभी जाते हैं<br />
अपने भाई के घर<br />
सुनाते हैं भतीजे को दस बीस गालियां<br />
भले ही लोग बजायें मुफ्त में तालियां<br />
उसने बिना लिये दिये कैसे तुम्हारे भानजे को दी<br />
गालियां और घूंसा बरसाया<br />
बदल में उसने क्या पाया<br />
वह तो रोज देखता है रीयल्टी शो<br />
कैसे गालियां और घूंसे खाने और<br />
लगाने के लिये लेते हैं रकम<br />
पब्लिक की मिल जाती है गालियां और<br />
घूसे खाने से सिम्पथी<br />
इसलिये पिटने को तैयार होते हैं<br />
छोटे पर्दे के कई महारथी<br />
तुम्हारा भानजा भी भला क्या कम चालाक है<br />
बरसों पढ़ाया है उसे<br />
सीदा क्या वह खाक है<br />
लड़की उसे अपनी कार में बैठाकर लाई<br />
जरूर उसने सलीके से शुरू की होगी लड़ाई<br />
सीदा तो मेरा भतीजा है<br />
जो मुफ्त में लड़की की नजरों में<br />
अपनी इमेज विलेन की बनाई<br />
तुम्हारे भानजे के प्यार की राह<br />
एकदम करीने से सजाई<br />
उस आवारा का हिला तो लग गया<br />
हमारे भतीजा तो अब शहर भर की<br />
लड़कियों के लिये विलेन हो गया<br />
दे रहे हो ताना जबकि<br />
लानी थी साथ मिठाई<br />
जमाना बदल गया है सारा<br />
पीटने वाले की नहीं पिटने वाले पर मरता है<br />
गालियां और घूंसा खाने के लिये आदमी<br />
दोस्त को ही दुश्मन बनने के लिये राजी करता है<br />
यह तो तुम्हारे खानदान ने<br />
हमारे खानदान पर एक तरह से विजय पाई<br />
हमारे भतीजे ने मुफ्त में स्वयं को खलनायक बनाया</strong><br />
.........................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://rajlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्द प्रकाश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हास्य व्यंग्य कविता-जैसे अपनी  जिंदगी से आती हो उबासी ]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/?p=15</link>
<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 17:19:58 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.hi.wordpress.com/2008/10/13/jindgi-men-ubasi-hasya-kavita/</guid>
<description><![CDATA[लंबा तगड़ा और आकर्षक चेहरे वाला
वह लड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लंबा तगड़ा और आकर्षक चेहरे वाला<br />
वह लड़का शहर की फुटपाथ<br />
पर चला जा रहा था<br />
सामने एक सुंदर गौरवर्ण लडकी<br />
चली आ रही थी<br />
यह सड़क बायें थी वह दायें था<br />
पास आते ही दोनों के कंधे टकराये<br />
पहली नजर में दोनों एक दूसरे को भाये<br />
दृश्य फिल्म  का हो गया<br />
दोनों को ही इसका इल्म हो गया<br />
लड़की चल पड़ी उसके साथ<br />
अब वह बायें से दायें चलने लगी</p>
<p>चलते चलते बरसात भारी हो गयी<br />
सड़क अब नहर जैसी नजर आने लगी<br />
लड़की ने कहा-<br />
‘यह क्या हुआ<br />
यह कैसी मेरी और तुम्हारी इश्क की डील हुई<br />
जिस सड़क से निकली थी<br />
वह डल झील हो गयी<br />
पर मैं तो चल रही थी बायें ओर<br />
दायें कैसे चलने लगी<br />
तुम अब पलट कर मेरे साथ बायें  चलो’<br />
ऐसा कहकर वह पलटने लगी </p>
<p>लड़के ने कहा<br />
‘मेरे घर में अंधेरा है<br />
एक ही बल्ब था फुक गया है<br />
खरीद कर जा रहा हूं<br />
मां बीमार है उसके लिये<br />
दवायें भी ले जानी है<br />
यह तो पहली नजर का प्यार था<br />
जो शिकार हो गया<br />
वरना तो दुनियां भर की<br />
मुसीबतें मेरे ही पीछे लगी<br />
तुम जाओ बायें रास्ते<br />
मैं तो दाएं ही जाऊंगा<br />
अब नहीं करूंगा दिल्लगी’</p>
<p>लड़की ने कहा<br />
‘तो तुम भी मेरी तरह फुक्कड़ हो<br />
तुम्हारे कपड़े देखकर<br />
मुझे गलतफहमी हो गयी थी<br />
जो पहली नजर के प्यार का<br />
सजाया था सपना<br />
दूसरी नजर में तुम्हारी सामने आयी असलियत<br />
वह न रहा अपना<br />
इसलिये यह पहले नजर के प्यार की डील<br />
करती हूं कैंसिल’<br />
ऐसा कहकर वह फिर बायें चलने लगी। </strong><br />
----------------------<br />
<strong>एक विचारक पहुंचा दूसरे के पास<br />
और बोला<br />
'यार आजकल कोई<br />
अपने पास नहीं आता है<br />
हमसे पूछे बिना यह समाज<br />
अपनी राह पर चला जाता है<br />
हम अपनी विचारधाराओं को<br />
लेकर करें जंग<br />
लोगों के दिमाग को करें तंग<br />
ताकि वह हमारी तरफ आकर्षित हौं<br />
 और विद्वान की तरह  सम्मान करें<br />
नहीं तो हमारी विचारधाराओं का<br />
हो जायेगा अस्तित्व ही खत्म<br />
उसे बचने का यही रास्ता नजर आता है'</p>
<p>दूसरा बोला<br />
'यार, पर हमारी विचारधारा क्या है<br />
यह मैं आज तक नहीं समझ पाया<br />
लोग तो मानते हैं विद्वान पर<br />
मैं अपने को नही मान पाया<br />
अगर ज्यादा सक्रियता दिखाई<br />
तो पोल खुल जायेगी<br />
नाम  बना रहे लोगों में<br />
इसलिये कभी-कभी<br />
बयानबाजी कर देता हूँ<br />
इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं आता है'</p>
<p>विचारक बोला<br />
'कहाँ तुम चक्कर में पड़ गये<br />
विचारधाराओं में द्वंद में भला<br />
सोचना कहाँ आता है<br />
लड़कर अपनी इमेज पब्लिक में<br />
बनानी है<br />
बस यही होता है लक्ष्य<br />
किसी को मैं कहूं  मोर<br />
तो तुम बोलना चोर<br />
मैं कहूं किसी से बुद्धिमान<br />
तुम बोलना उसे बैईमान<br />
मैं बजाऊँ किसी के लिए ताली<br />
तुम उसके लिए बोलना गाली<br />
बस इतने में ही लोगों का ध्यान<br />
अपने तरफ आकर्षित हो जाता है'</p>
<p>दूसरा खुश होकर उनके पाँव चूने लगा<br />
और बोला<br />
'धन्य जो आपने दिया ज्ञान<br />
अब मुझे अपना भविष्य अच्छा नजर आता है'</p>
<p>विचारक ने अपने पाँव<br />
हटा लिए और कहा<br />
'यह तो विचारों के धंधे का मामला है<br />
सबके सामने पाँव मत छुओ<br />
वरना लोग हमारी वैचारिक जंग पर<br />
यकीन नहीं करेंगे<br />
मुझे तो लोगों को भरमाने में ही<br />
अपना हित नजर आता है।</strong><br />
-------------------<br />
<strong>कुछ लोग होते हैं पर<br />
कुछ दिखाने के लिये बन जाते लाचार<br />
अपनी वेदना का प्रदर्शन करते हैं सरेआम<br />
लुटते हैं लोगों की संवेदना और र<br />
छद्म आंसू बहाते<br />
कभी कभी दर्द से दिखते मुस्कराते<br />
डाल दे झोली में कोई तोहफा<br />
तो पलट कर फिर नहीं देखते<br />
उनके लिये जज्बात ही होते व्यापार </p>
<p>घर हो या बाहर<br />
अपनी ताकत और पराक्रम पर<br />
इस जहां में जीने से कतराते<br />
सजा लेते हैं आंखों में आंसू<br />
और चेहरे पर झूठी उदासी<br />
जैसे अपनी  जिंदगी से आती हो उबासी<br />
खाली झोला लेकर आते हैं बाजार<br />
लौटते लेकर घर  दानों भरा अनार </p>
<p>गम तो यहां सभी को होते हैं<br />
पर बाजार में बेचकर खुशी खरीद लें<br />
इस फन में होता नहीं हर कोई माहिर<br />
कामयाबी आती है उनके चेहरे पर<br />
जो दिल  में गम न हो फिर भी कर लेते हैं<br />
सबके सामने खुद को गमगीन जाहिर<br />
कदम पर झेलते हैं लोग वेदना<br />
पर बाहर कहने की सोच नहीं पाते<br />
जिनको चाहिए लोगों से संवेदना<br />
वह नाम की ही वेदना पैदा कर जाते<br />
कोई वास्ता नहीं किसी के दर्द से जिनका<br />
वही  बाजार में करते वेदना बेचने और<br />
संवेदना खरीदने का व्यापार<br />
........................</p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</blockquote>
<p>अन्य ब्लाग1.<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a> <a href="http://dprajk.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a> 3.<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिन पर है दौलत मेहरबान-हास्य व्यंग्य कवितायें]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/?p=12</link>
<pubDate>Sun, 12 Oct 2008 12:46:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.hi.wordpress.com/2008/10/12/jin-par-hain-daulat-mehrban-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[
धन, पद और प्रतिष्ठा की शक्ति
हो जाती है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong><br />
धन, पद और प्रतिष्ठा की शक्ति<br />
हो जाती है जिन पर मेहरबान<br />
क्यों न करे वह उस पर अभिमान<br />
इस जहां में सभी यही चाहते हैं<br />
जिनसे दूर है यह सब<br />
वह रहते हैं परेशान<br />
गर्दन ऊपर उठाएँ देखते हैं<br />
होकर हैरान</p>
<p>उनके लड़के मोटर साइकिलों<br />
और कारों में चलते गरियाते हैं<br />
अभावों से है वास्ता जिनका<br />
वह उन्हें देखकर सहम जाते हैं<br />
अपने वाहन को चलाते है ऐसे<br />
जैसे करते हौं फिल्मी स्टंट<br />
कोई नहीं कर पाता उनको शंट<br />
जो रोकने की कोशिश करे<br />
उस पर टूट पड़ें बनकर हैवान</p>
<p>गरीब अगर अमीर की चौखट पर<br />
जाना बंद कर दे<br />
जाये तो तैयार रहे<br />
झेलने के लिए अपमान<br />
सड़क पर चले तो<br />
किसी से डरे या नहीं<br />
नव-धनाढ्यों की सवारी से<br />
बचकर चले<br />
न हार्न दें<br />
चाहे जहां और जब रूक जाएँ<br />
मन में आये वहीं रूक जाएँ<br />
यही उनकी पहचान</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
तेज गति से मति होती वैसे ही मन्द<br />
फिर बाप के पैसे, पद और प्रतिष्ठा का<br />
नशा हो जिनको<br />
वह क्यों होंगे किसी नियम के पाबन्द<br />
वह पडा है उनकी तिजोरी में बंद<br />
अपने जीवन की सुरक्षा<br />
अपने ही हाथ में रखो<br />
बाकी करेंगे अपने भगवान<br />
--------------------------</p>
<p>वाह रे बाज़ार तेरा खेल<br />
मैदान में पिटे हीरो को<br />
कागज और फिल्म पर<br />
चमकाकर और सजाकर<br />
जनता के बीच देता है ठेल</p>
<p>क्रिकेट में कोई विश्वकप नही<br />
जीत सके जो तथाकथित महान<br />
ऐसे प्रचार का जाल बिछाते हैं<br />
कि लोग फिर<br />
उनके दीवाने बन जाते हैं<br />
अपने पुराने विज्ञापन इस<br />
तरह सबके बीच लाते हैं कि<br />
लोग हीरो की नाकामी से<br />
हो जाते हैं अनजान<br />
और बिक जाता है बाजार में<br />
उनका रखा और सडा-गडा तेल</p>
<p>न ताज कभी चला न चल सकता है<br />
उस पर हुए करोड़ों के वारे-न्यारे<br />
और वह चला भी ख़ूब<br />
प्रचार ऐसा हुआ कि<br />
पैसेंजर में नही लदा<br />
खुद ही बन गया मेल</p>
<p>कहै दीपक बापू<br />
शिक्षा तो लोगों में बहुत बढ़ी है<br />
पर घट गया है ज्ञान<br />
शब्दों का भण्डार बढ़ गया है<br />
आदमी की अक्ल में<br />
पर अर्थ की कम हो गयी पहचान<br />
बाजार में वह नहीं चलता<br />
चलाता है बाजार उसे<br />
सामान खरीदने नहीं जाता<br />
बल्कि घर लूटकर आता<br />
और कभी सामान तो दूर<br />
हवा में पैसे गँवा आता<br />
विज्ञापन और बाजार का या खेल<br />
जिसने कमाया वही सिकंदर<br />
जिसने गँवाया वह बंदर<br />
इससे कोई मतलब नही कि<br />
कौन है पास कौन है फेल<br />
-------------------</p>
<p>आँखें देखतीं हैं<br />
कान सुनते हैं<br />
और जीभ का काम है बोलना<br />
पर जो पहचान करे<br />
सुनकर जो गुने<br />
और जो श्रीमुख से<br />
शब्द व्यक्त करे<br />
वह कौन है<br />
हाथ करते हैं अपना काम<br />
टांगों का काम है चलना<br />
और कंधे उठाएं बोझ<br />
पर जो पहुँचाता है लक्ष्य तक<br />
जो देता है दान<br />
और जो दर्द को सहलाता है<br />
वह कौन है</p>
<p>कहैं दीपक बापू<br />
कहाँ उसे बाहर ढूंढते हो<br />
क्यों व्यर्थ में त्रस्त होते हो<br />
बैठा तुम्हारे मन में<br />
तुम उससे बात नहीं करते<br />
इसलिये वह मौन है<br />
जब तक तुम हो<br />
तब तक वह भी है<br />
तुम्हारा अस्तित्व है उससे<br />
उसका जीवन है तुमसे<br />
तुम सीमा में बंधे रहते हो<br />
उसकी शक्ति अनंत है<br />
तुम पहचानने की कोशिश करके देखो<br />
वह तुम्हारा अंतर्मन नहीं तो और कौन है<br />
</strong></strong><br />
-----------------</p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है। <a href="http://teradipak.blogspot.com">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a><br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://deepakraj.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
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<a href="http://anantraj.blogspot.com">3.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कोई प्यार की भाषा नहीं समझता-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/?p=10</link>
<pubDate>Sat, 11 Oct 2008 10:44:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.hi.wordpress.com/2008/10/11/payar-ki-bhasha-koyi-nahin-samjhta/</guid>
<description><![CDATA[अपने साथ भतीजे को भी
फंदेबाज घर लाया औ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने साथ भतीजे को भी<br />
फंदेबाज घर लाया और बोला<br />
‘दीपक बापू, इसकी सगाई हुई है<br />
मंगेतर से रोज होती मोबाइल पर बात<br />
पर अब बात लगी है बिगड़ने<br />
उसने कहा है इससे कि एक ‘प्रेमपत्र लिख कर भेजो<br />
तो जानूं कि तुम पढ़े लिखे<br />
 नहीं भेजा तो समझूंगी गंवार हो<br />
तो पर सकता है रिश्ते में खटास’<br />
अब आप ही से हम लोगों को  आस<br />
इसे लिखवा दो कोई प्रेम पत्र<br />
जिसमें हिंदी के साथ उर्दू के भी शब्द हों<br />
यह बिचारा सो नहीं पाया पूरी रात<br />
मैं खूब घूमा इधर उधर<br />
किसी हिट लेखक के पास फुरसत नहीं है<br />
फिर मुझे ध्यान आया तुम्हारा<br />
सोचा जरूर बन जायेगी बात’</p>
<p>सुनकर बोले दीपक बापू<br />
‘कमबख्त यह कौनसी शर्त लगा दी<br />
कि उर्दू में भी शब्द हों जरूरी<br />
हमारे समझ में नहीं आयी बात<br />
वैसे ही हम भाषा के झगड़े में<br />
फंसा देते हैं अपनी टांग ऐसी कि<br />
निकालना मुश्किल हो जाता<br />
चाहे कितना भी जज्बात हो अंदर<br />
नुक्ता लगाना भूल जाता<br />
या कंप्यूटर घात कर जाता<br />
फिर हम हैं तो आजाद ख्याल के<br />
तय कर लिया है कि नुक्ता लगे या न लगे<br />
लिखते जायेंगे<br />
हिंदी वालों को क्या मतलब वह तो पढ़ते जायेंगे<br />
उर्दू वाले चिल्लाते रहें<br />
हम जो शब्द बोले  उसे<br />
हिंदी की संपत्ति बतायेंगे<br />
पर देख लो भईया<br />
कहीं नुक्ते के चक्कर में कहीं यह<br />
फंस न  जाये<br />
इसके मंगेतर के पास कोई<br />
उर्दू वाला न पहूंच जाये<br />
हो सकता है गड़बड़<br />
हिंदी वाले सहजता से नहीं लिखें<br />
इसलिये जिन्हें फारसी लिपि नहीं आती<br />
वह उर्दू वाले ही  करते हैं<br />
नुक्ताचीनी और बड़बड़<br />
प्रेम से आजकल कोई प्यार की भाषा नहीं समझता<br />
इश्क पर लिखते हैं<br />
पब्लिक में हिट दिखते हैं<br />
 इसलिये मुश्क कसते हैं शायर<br />
फारसी  का देवनागरी लिपि से जोड़ते हैं वायर<br />
इसलिये हमें माफ करो<br />
कोई और ढूंढ लो<br />
नहीं बनेगी हम से तुम्हारी बात<br />
.........................................................................</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख <a href="http://deepakraj.wordpress.com">'दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चुंबन का स्वाद न मीठा होता है न नमकीन-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://zeedipak.wordpress.com/?p=5</link>
<pubDate>Sat, 11 Oct 2008 08:12:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://zeedipak.hi.wordpress.com/2008/10/11/chunban-ka-svad-hindi-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[सिनेमा या टीवी के पर्दे पर चुंबन का दृ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>सिनेमा या टीवी के पर्दे पर चुंबन का दृश्य देखकर लोगों के मन में हलचल पैदा होती है। अगर ऐसे में कहीं किसी  प्रसिद्ध हस्ती ने किसी दूसरी हस्ती का सार्वजनिक रूप से चंुबन लिया और उसकी खबर उड़ी तो हाहाकार भी मच जाता है।  कुछ लोग मनमसोस कर रह जाते हैं कि उनको ऐसा अवसर नहीं मिला पर कुछ लोग समाज और संस्कार विरोधी बताते हुए सड़क पर कूद पड़ते हैं।  चुंबन विरोधी चीखते हैं कि‘यह समाज और संस्कार  विरोधी कृत्य है और इसके लिये चुंबन लेने और देने वाले को माफी मांगनी चाहिये।’</p>
<p>अब यह समझ में नहीं आता कि सार्वजनिक रूप से  चुंबन लेना समाज और संस्कारों के खिलाफ है  या अकेले में भी। अगर ऐसा है तो फिर यह कहना कठिन है कि कौन ऐसा व्यक्ति है जो कभी किसी का चुंबन नहीं लेता।  अरे, मां बाप बच्चे का माथा चूमते हैं कि नहीं।  फिर अकेले में कौन किसका कैसे चुंबन लेता है यह कौन देखता है और कौन बताता है?</p>
<p>सार्वजनिक रूप से चुंबन लेने पर लोग ऐसे ही  हाहाकार मचा देते हैं भले ही लेने और देने वाले आपस में सहमत हों।  अगर किसी विदेशी होंठ ने किसी देशी गाल को चुम लिया तो बस राष्ट्र की प्रतिष्ठा के लिए खतरा और समाज और संस्कार विरोधी और भी न जाने कितनी  नकारात्मक संज्ञाओं से उसे नवाजा जाता है। कहीं कहीं तो जाति,धर्म और भाषा का लफड़ा भी खड़ा  हो जाता है। पश्चिमी देशों में सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना शिष्टाचार माना जाता है जबकि भारत में इसे अभी तक अशिष्टता की परिधि में रखा जाता है। यह किसने रखा पता नहीं पर जो रखते हैं उनसे बहस करने का साहस किसी में नहीं होता क्योंकि वह सारे फैसले ताकत से करते हैं और फिर समूह में होते हैं। </p>
<p>इतना तय है कि विरोध करने वाले भी केवल चुंबन का विरोध इसलिये करते हैं कि वह जिस सुंदर चेहरे का चुंबन लेता हुआ देखते हैं वह उनके ख्वाबों में ही बसा होता है और उनका मन आहत होता है कि हमें इसका अवसर क्यों नहीं मिला? वरना एक चुंबन से समाज,संस्कृति और संस्कार खतरे में पड़ने का नारा क्यों लगाया जाता है।<br />
दूसरे संदर्भ में इन विरोधियों को यह यकीन है कि समाज में कच्चे दिमाग के लोग रहते हैं और अगर इस तरह सार्वजनिक रूप से चुंबन लिया जाता रहा तो सभी यही करने लगेंगे।  ऐसे लोगों की बुद्धि पर तरस आता है जो पूरे समाज को कच्ची बुद्धि का समझते हैं।   </p>
<p>फिल्मों में भी नायिका के आधे अधूरे चुंबन दृश्य दिखाये जाते हैं। नायक अपना होंठ नायिका के गाल के पास लेकर जाता है और लगता कि अब उसने चुंबन लिया पर अचानक दोनों में से कोई एक या दोनों ही पीछे हट जाते हैं। इसके साथ ही सिनेमाहाल में बैठे लड़के -जो इस आस में हो हो मचा रहे होते हैं कि अब नायक  ने नायिका का चुंबन  लिया-हताश होकर बैठ जाते हैं। चुम्मा चुम्मा ले ले और देदे के गाने जरूर बनते हैं नायक और नायिक एक दूसरे के पास मूंह भी ले जाते हैं पर चुंबन का दृश्य  फिर भी नहीं दिखाई देता। </p>
<p>आखिर ऐसा क्यों? क्या वाकई ऐसा समाज और संस्कार के ढहने की वजह से है। नहीं! अगर ऐसा होता तो फिल्म वाले कई ऐसे दृश्य दिखाते हैं जो तब तक समाज में नहीं हुए होते पर जब फिल्म में आ जाते हैं तो फिर लोग भी वैसा ही करने लगते हैं। फिल्म से सीख कर अनेक अपराध हुए हैं ऐसे मेंं अपराध के नये तरीके दिखाने में फिल्म वाले गुरेज नहीं करते पर चुंबन के दृश्य दिखाने में उनके हाथ पांव फूल जाते हैंं।  सच तो यह है कि चूंबन जब तक लिया न जाये तभी तक ही आकर्षण है उसके बाद तो फिर सभी खत्म है। यही कारण है कि काल्पनिक प्यार बाजार में बिकता रहे इसलिये होंठ और गाल पास तो लाये जाते हैं पर चुंबन का दृश्य अधिकतर दूर ही रखा जाता है। </p>
<p>यह बाजार का खेल है। अगर एक बार फिल्मों से लोगों ने चुंबन लेना शुरू किया तो फिर सभी जगह सौंदर्य सामग्री की पोल खुलना शुरू हो जायेगी। महिला हो या पुरुष सभी सुंदर चेहरे सौंदर्य सामग्री से पुते होते हैं और जब चुंबन लेंगे तो उसका स्पर्श होठों से होगा।  तब आदमी चुंबन लेकर खुश क्या होगा अपने होंठ ही साफ करता फिरेगा। सौंदर्य प्रसाधनों में केाई ऐसी चीज नहीं होती जिससे जीभ को स्वाद मिले। कुछ लोगों को  तो सौदर्य सामग्री से  एलर्जी होती और उसकी खुशबू से चक्कर आने लगते हैं। अगर युवा वर्ग चुंबन लेने और देने के लिये तत्पर होगा तो उसे इस सौंदर्य सामग्री से विरक्त होना होगा ऐसे में बाजार में सौंदर्य सामग्री के प्रति पागलपन भी कम हो जायेगा।  कहने का मतलब है कि गाल का मेकअप उतरा तो समझ लो कि बाजार का कचड़ा हुआ।  याद रखने वाली बात यह है कि सौदर्य की सामग्री बनाने वाले ही ऐसी फिल्में के पीछे भी होते हैं और उनका पता है कि उसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो जीभ तक पहुंचकर उसे स्वाद दे सके। </p>
<p>कई बार तो सौंदर्य सामग्री से किसी खाने की वस्तु का धोखे से स्पर्श हो जाये तो जीभ पर उसके कसैले स्वाद की अनुभूति भी करनी पड़ती है। यही कारण है कि चुंबन को केवल होंठ और गाल के पास आने तक ही सीमित रखा जाता है। संभवतः इसलिये गाहे बगाहे प्रसिद्ध हस्तियों के चुंबन पर बवाल भी मचाया जाता है कि लोग इसे गलत समझें और दूर रहें। समाज और संस्कार तो केवल एक बहाना है। </p>
<p>एक आशिक और माशुका पार्क में बैठकर बातें कर रहे थे। आसपास के अनेक लोग उन पर दृष्टि लगाये बैठै थे। उस जोड़े को भला कब इसकी परवाह थी?  अचानक आशिक अपने होंठ माशुका के गाल पर ले गया और चुंबन लिया। माशुका खुश हो गयी पर आशिक के होंठों से क्रीम या पाउडर का स्पर्श हो गया और उसे कसैलापन लगा।   उसने माशुका से कहा‘यह कौनसी गंदी क्रीम लगायी है कि मूंह कसैला हो गया।’</p>
<p>माशुका क्रोध में आ गयी और उसने एक जोरदार थप्पड़ आशिक के गाल पर रसीद कर दिया। आशिक के गाल और माशुका के हाथ की बीचों बीच टक्कर हुई थी इसलिये आवाज भी जोरदार हुई। उधर दर्शक  तो जैसे तैयार बैठे ही थे। वह आशिक पर पिल पड़े। अब माशुका उसे बचाते हुए लोगों से कह रही थी कि‘अरे, छोड़ो यह हमारा आपसी मामला है।’</p>
<p>एक दर्शक बोला-‘अरे, छोड़ें कैसे? समाज और संस्कृति को खतरा पैदा करता है। चुंबन लेता है। वैसे तुम्हारा चुंबन लिया और तुमने इसको थप्पड़ मारा। इसलिये तो हम भी इसको पीट रहे हैं।’</p>
<p>माशुका बोली‘-मैंने चुंबन लेने पर थप्पड़ थोड़े ही मारा। इसने चुंबन लेने पर जब मेरी क्रीम को खराब बताया। कहता है कि क्रीम से मेरा मूंह कसैला हो गया। इसको नहीं मालुम कि चुंबन कोई नमकीन या मीठा तो होता नहीं है।  तभी इसको मारा। अरे, वह क्रीम मेरी प्यारी क्रीम है।’</p>
<p>तब एक दर्शक फिर आशिक पर अपने हाथ साफ करने लगा और बोला-‘मैं भी उस क्रीम कंपनी का ‘समाज और संस्कार’रक्षक विभाग का हूं। मुझे इसलिये ही रखा गया है कि ताकि सार्वजनिक स्थानों पर कोई किसी का चुंबन न ले भले ही लगाने वाला केाई भी क्रीम लगाता हो। अगर इस तरह का सिस्टम शुरु हो जायेगा तो फिर हमारी क्रीम बदनाम हो जायेगी।’</p>
<p>बहरहाल माशुका ने जैसे तैसे अपने आशिक को बचा लिया। आशिक ने फिर कभी सार्वजनिक रूप से ऐसा न करने की कसम खाइ्र्र। </p>
<p>हमारा देश ही नहीं बल्कि हमारे पड़ौसी देशों में भी कई चुंबन दृश्य हाहाकर मचा चुके हैं।  पहले टीवी चैनल वाले प्रसिद्ध लोगों के चुंबन दृश्य दिखाते हैं फिर उन पर उनके विरोधियों की प्रतिक्रियायें बताना नहीं भूलते।  कहीं से समाज और संस्कारों की रक्षा के ठेकेदार उनको मिल ही जाते हैं। </p>
<p>वैसे पश्चिम के स्वास्थ्य वैज्ञानिक चुंबन को सेहत के लिये अच्छा नहीं मानते।  यह अलग बात है कि वहां चुंबन खुलेआम लेने का शिष्टाचार है। भारतीय उपमहाद्वीप में इसे बुरा समझा जाता है। चुंबन लेना स्वास्थ्य के लिये बुरा है-यह जानकर समाज और संस्कारों के रक्षकों का सीना फूल सकता है पर उनको यह जानकर निराशा होगी कि अमेरिकन आज भी आम भारतीयों से अधिक आयु जीते हैं और उनका स्वास्थ हम भारतीयों के मुकाबले कई गुना अच्छा है। </p>
<p>वैसे सार्वजनिक रूप से चुंबन लेना अशिष्टता या अश्लीलता कैसे होती है इसका वर्णन पुराने ग्रंथों में कही नहीं है। यह सब अंग्रेजों के समय में गढ़ा गया है।  जिसे कुछ सामाजिक संगठन अश्लीलता कहकर रोकने की मांग करते हैं,कुछ लोग कहते हैं कि  वह सब अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिये रचा था।  अपना दर्शन तो साफ कहता है कि जैसी तुम्हारी अंतदृष्टि है वैसे ही तुम्हारी दुनियां होती है।  अपना मन साफ करो, पर भारतीय संस्कृति के रक्षकों देखिये वह कहते हैं कि नहीं दृश्य साफ रखो ताकि हमारे मन साफ रहें। अपना अपना ज्ञान है और अलग अलग बखान है।<br />
जहां तक चुंबन  के स्वाद का सवाल है तो वह नमकीन या मीठा तभी हो सकता है जब सौंदर्य सामग्री में नमक या शक्कर पड़ी हो-जाहिर है या दोनों वस्तुऐं उसमें नहीं होती।<br />
-----------------------------------</p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
<p></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Colorful House of Big Boss]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=348</link>
<pubDate>Sat, 11 Oct 2008 03:00:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/10/11/colorful-house-of-big-boss/</guid>
<description><![CDATA[Big Boss Ka Kotha
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/51.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-356" title="51" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/51.gif" alt="" width="93" height="149" /></a><a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/big-boss-ka-kotha3.pdf">Big Boss Ka Kotha</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[व्ही.आई.पी. कहलाने की चाहत-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=319</link>
<pubDate>Fri, 10 Oct 2008 16:42:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.hi.wordpress.com/2008/10/10/dimand-of-viptreatment-hindi-article/</guid>
<description><![CDATA[वैसे तो अपने देख के लोगों की यह पूरानी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे तो अपने देख के लोगों की यह पूरानी आदत है कि वह हर तरफ अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं और अब एक नयी आदत और पाल ली है। वह यह कि कहीं भी अपने को व्ही.आई.पी साबित करो। भले ही झूठमूठ पर यह बताओ कि हमें अमुक स्थान पर हमें व्ही.आई.पी. ट्रीटमेंट मिला।<br />
अपने जीवन के सफर में हमें प्रसिद्धि पाने का मोह तो कभी नहीं रहा पर कुछ हमारे  काम ऐसे रहे हैं कि वह बदनाम जरूर करा देते हैं और तब लगता है कि यह  मिली प्रसिद्धि के कारण हो रहा है।  पढ़ने का मजा खूब लिया तो लिखने के मजे लेने का ख्याल भी आया। लिखते रहे। जो मन मेंे आया लिखा मगर भाषा की दृष्टि से कभी सराहे जायेंगे यह तो ख्याल नहीं किया पर अव्यवस्थित लेखन की वजह से बदनाम जरूर हुए।  यही हाल हर क्षेत्र में रहा है। </p>
<p>अध्यात्म में झुकाव है पर भक्ति के नाम पर पाखंड कभी नहीं किया। कहीं कोई कहता है कि यहां मत्था टेको या अमुक गुरू के दर्शन करो तो हम   मना कर देते  हैं। कहते हैं कि भईया हम तो सीधे नारायण में मन लगाते हैं इन बिचैलियों से मार्ग का पता पूछें यह संभव नहीं हैं।</p>
<p>जिनके गुरु है वह अपने गुरु को मानने की  प्रेरणा देते हैं। ना करते हैं तो वह लोग कहते हैं कि गुरु के बिना उद्धार नहीं होता। हम पूछते हैं कि ‘क्या गुरु पाकर आपका उद्धार हो गया है तो जवाब देते हैं कि ‘तुम्हें अहंकार है, अरे इतनी जल्दी थोड़ा उद्धार होता है।’</p>
<p>हम कहते हैं कि हमारा उद्धार तो हो गया है क्येांकि परमात्मा ने मनुष्य योनि देकर दुनिया को समझने का अवसर दिया क्या कम है?</p>
<p>बात दरअसल यह कहना चाहते  थे कि  हम भारत के लोगों की मनोवृत्ति बहुत खराब है। हर मामले में व्ही.आई.पी. ट्रीटमेंट चाहते हैं और इसके लिये हम कुछ भी करना चाहते हैं। उनमें  यह भी एक बात शामिल है कि जिस भगवान या गूुरु को हम माने उसे दूसरे भी माने। इसलिये अपने गुरुओंं और भगवानों को लेकर दूसरे पर दबाव बनाने लगते हैं। इसके अलावा कहीं अगर आश्रम या मंदिर जाते हैं तो वहां भी अपने को व्ही. आई.पी. के रूप में देखना चाहते हैं। </p>
<p>उस दिन एक आश्रम में गये तो पता लगा कि उनके गुरु आये हैं। हमने दूर से गुरुजी को देखा और वहीं उनके प्रवचन प्रारंभ हो गये। इसी दौरान पंक्ति लगाकर उनके दर्शन करने का सिलसिला भी चला।  वहां कुछ लोग पंक्ति से अलग दूसरी पंक्ति लगाकर उनके दर्शन कर रहे थे जो यकीनन खास भक्तों के खास भक्त थे। </p>
<p>सत्संग समाप्त हुआ पर दर्शन करने वालों का तांता अभी लगा हुआ था।  हम बाहर निकल आये तो एक परिचित मिल गये। हमसे पूछा कि‘क्या गुरु महाराज के दर्शन किये।’<br />
हमने न में सिर हिलाया तो वह कहने लगे कि‘हमने तो व्ही.आई.पी. लाईन में जाकर उनके दर्शन किये। उनका एक खास भक्त मेरी दुकान पर सामान खरीदने आता है।’</p>
<p>हमने समझ लिया कि वह व्ही.आई.पी. भक्त साबित करने का प्रयास कर रहा है। </p>
<p>एक अन्य आश्रम में गये  तो वहां देखा कि बरसों पहले खुला रहने वाला ध्यान केंद्र अब बंद कर दिया गया है।  वहां सामान्य भक्तों का प्रवेश बंद कर दिया गया है केवल चंदा की रसीद कटाने और सामान लेकर जाने वालों को वहां ध्यान करने की इजाजत है। </p>
<p>हमने वहां मंदिर में दर्शन किये और उसके साथ लगे परिसर के पार्क में जाने लगे तो पता लगा कि वहां से आने वाला कम दूरी वाला रास्ता भी बंद  कर दिया गया है। घूमकर फिर वहां पार्क में गये। पार्क के साथ ही धर्मशाला भी लगी हुई है। बाहर से आये भक्तजन वहां रहते हैं और ध्यानादि कार्यक्रम में शामिल होते हैं।  वहां पार्क में अन्य लोग भी बैठे थे कोई अपने साथ भोजनादि लाया था तो को वहीं बैठे ध्यान लगा   रहा था तो कोई अपनी चादर बिछाकर आराम कर रहा था। हमने देखा कि ध्यान केंद्र से कम दूरी वाले मार्ग का  दरवाजा जो बंद था वह बार बार खुलता और बंद हो जाता। कुछ व्ही.आई.पी वहीं से ध्यान कक्ष से आते जाते। जब वह आते तो खुल जाता और फिर बंद।  हमने देखा कि वहां खड़ा एक लड़का इस दरवाजे को खोल और बंद कर रहा था।  </p>
<p>एक महिला धर्मशाला से निकलकर अपने दो बच्चों के साथ उसी रास्ते ध्यान कक्ष की तरफ जा रही थी । उसके आगे एक व्ही.आई.पी. भक्त तो निकल गया पर उस लड़के ने उस महिला और उसके बच्चों को नहीं जाने दिया। कारण बताया ‘सुरक्षा’। अब सुरक्षा के नाम आश्रम और मंदिरों में हो रहा है उस तो कहना ही क्या? देखा जाये तो व्ही.आई.पी भक्तों और उनको दर्शन कराने वालों को अवसर मिल गया है। </p>
<p>उस महिला ने  लंबे रास्ते से निकलने  के लिये  मूंह फेरा तो एक व्ही.आई.पी. भक्त वहां से लौट रहा था उसके लिये दरवाजा खुला तो वह पलट कर फिर जाने को तत्पर हुई पर उस लड़के ने मना कर दिया। यह एकदम अपमानजनक था क्योंकि उस दरवाजे के उस पार तक तो मैं भी होकर आया था। मतलब वहां से अगर कोई आये जाये तो कोई दिक्कत नहीं थी सिवाय इसके कि किसी को विशिष्ट भक्त प्रमाणित नहीं किया जा सकता था। </p>
<p>यह प्रकरण हमसे कुछ दूर बैठे दंपत्ति भी देख रहे थे। महिला ने पति से कहा-‘आप देखो। कैसे उस बिचारी के साथ उस लड़के ने बदतमीजी की। धार्मिक स्थानों पर यह बदतमीजी करना ठीक नहीं है।’</p>
<p>पति ने कहा-‘अरे, इन चीजों को मत देखा करो। हम तो भगवान में अपनी भक्ति रखते हैं। यह तो बीच के लोग हैं न इनके मन में न भक्ति है न सेवा भाव। यह सब विशिष्ट दिखने के लिये ही ऐसा करते हैं।  देखा हमारे साथ यहां कितने लोग बैठे हैं उनको इनकी परवाह नहीं है। पर यह जो विशिष्ट दिखने और दिखाने का मोह जो लोग पाल बैठते हैं उनको कोई समझा नहीं सकता। यह मान कर चलो कि जहां भगवान है तो वहां शैतान भी होगा।’<br />
हमने देखा कि वहां अनेक लोग बैठे थे। सब दूर दूर से आये थे और उनको इन घटनाओं से केाई लेना देना नहीं था। </p>
<p>सच तो यह है कि धर्म के नाम पर जो लोग व्ही.आई.पी. दिखना चाहते हैं उनको ही धर्म संकट में दिखता है क्योंकि ऐसा कर ही वह अपने को धार्मिक साबित करना चाहते हैं। मंदिरों और आश्रमों में जो भ्रष्टाचार है  उस पर कोई प्रहार होता है तो धर्म पर संकट बताकर आम भक्त  को पुकारा जाता है जबकि इन्हीं आश्रमों में उसकी कोई कदर नहीं है वहां तो को केवल विशिष्ट लोगों का ही सम्मान है। हालांकि हम जानते हैं कि यह सब होता है पर जब कहीं ध्यान लगाने जाते हैं तो इस बात की परवाह नहीं करते कि भगवान के मध्यस्थ क्या व्यवहार करते हैं क्योंकि हम सोचते हैं कि उसके हृदय में भगवान नहीं विशिष्ट मेहमान बसे हुऐ हैं सो उनसे कोई अपेक्षा भी नहीं करते।<br />
.................................................</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://zee13.mastram.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[फ्री में विलेन बनाया-हास्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=539</link>
<pubDate>Thu, 09 Oct 2008 16:03:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.hi.wordpress.com/2008/10/09/free-men-khalnayak-banaya-hindi-poem-and-shyari/</guid>
<description><![CDATA[
उदास होकर फंदेबाज घर आया
और बोला
‘दीप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
उदास होकर फंदेबाज घर आया<br />
और बोला<br />
‘दीपक बापू, बहुत मुश्किल हो गयी है<br />
तुम्हारे भतीजे ने मेरे भानजे को<br />
दी गालियां और घूंसा जमाया<br />
वह बिचारा तुम्हारी और मेरी दोस्ती का<br />
लिहाज कर पिटकर घर आया<br />
दुःखी था बहुत तब एक लड़की ने<br />
उसे अपनी कार से बिठाकर अपने घर पहुंचाया<br />
तुम अपने भतीजे को कभी समझा देना<br />
आइंदा ऐसा नहीं करे<br />
फिर मुझे यह न कहना कि<br />
पहले कुछ न बताया’</p>
<p>सुनकर क्रोध में उठ खड़े हुए<br />
और कंप्यूटर बंद कर<br />
अपनी टोपी को पहनने के लिये लहराया<br />
फिर बोले महाकवि दीपक बापू<br />
‘कभी क्या अभी जाते हैं<br />
अपने भाई के घर<br />
सुनाते हैं भतीजे को दस बीस गालियां<br />
भले ही लोग बजायें मुफ्त में तालियां<br />
उसने बिना लिये दिये कैसे तुम्हारे भानजे को दी<br />
गालियां और घूंसा बरसाया<br />
बदल में उसने क्या पाया<br />
वह तो रोज देखता है रीयल्टी शो<br />
कैसे गालियां और घूंसे खाने और<br />
लगाने के लिये लेते हैं रकम<br />
पब्लिक की मिल जाती है गालियां और<br />
घूसे खाने से सिम्पथी<br />
इसलिये पिटने को तैयार होते हैं<br />
छोटे पर्दे के कई महारथी<br />
तुम्हारा भानजा भी भला क्या कम चालाक है<br />
बरसों पढ़ाया है उसे<br />
सीदा क्या वह खाक है<br />
लड़की उसे अपनी कार में बैठाकर लाई<br />
जरूर उसने सलीके से शुरू की होगी लड़ाई<br />
सीदा तो मेरा भतीजा है<br />
जो मुफ्त में लड़की की नजरों में<br />
अपनी इमेज विलेन की बनाई<br />
तुम्हारे भानजे के प्यार की राह<br />
एकदम करीने से सजाई<br />
उस आवारा का हिला तो लग गया<br />
हमारे भतीजा तो अब शहर भर की<br />
लड़कियों के लिये विलेन हो गया<br />
दे रहे हो ताना जबकि<br />
लानी थी साथ मिठाई<br />
जमाना बदल गया है सारा<br />
पीटने वाले की नहीं पिटने वाले पर मरता है<br />
गालियां और घूंसा खाने के लिये आदमी<br />
दोस्त को ही दुश्मन बनने के लिये राजी करता है<br />
यह तो तुम्हारे खानदान ने<br />
हमारे खानदान पर एक तरह से विजय पाई<br />
हमारे भतीजे ने मुफ्त में स्वयं को खलनायक बनाया</strong><br />
.........................................................</p>
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Udarta aur Paropkar Ki Saja]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=337</link>
<pubDate>Thu, 09 Oct 2008 04:38:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/10/09/imandari-ki-saja/</guid>
<description><![CDATA[      Bure Fanse Udar Banke
Friends, This hasya Katha is based on innocense. When somebody make]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>   <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/man_frustrated.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-381" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/man_frustrated.gif" alt="" width="212" height="129" /></a>   <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/bure-fanse-udar-banke.pdf">Bure Fanse Udar Banke</a></p>
<p><strong>Friends, This hasya Katha is based on innocense. </strong><strong>When somebody makes you fool due to your innocense, honesty </strong><strong>and spirit to help poor people.</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गलतफहमी-हास्य व्यंग्य कविता ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=513</link>
<pubDate>Thu, 02 Oct 2008 16:17:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/10/02/galatfahmi-hasya-kavita-and-poem/</guid>
<description><![CDATA[लंबा तगड़ा और आकर्षक चेहरे वाला
वह लड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लंबा तगड़ा और आकर्षक चेहरे वाला<br />
वह लड़का शहर की फुटपाथ<br />
पर चला जा रहा था<br />
सामने एक सुंदर गौरवर्ण लडकी<br />
चली आ रही थी<br />
यह सड़क बायें थी वह दायें था<br />
पास आते ही दोनों के कंधे टकराये<br />
पहली नजर में दोनों एक दूसरे को भाये<br />
दृश्य फिल्म  का हो गया<br />
दोनों को ही इसका इल्म हो गया<br />
लड़की चल पड़ी उसके साथ<br />
अब वह बायें से दायें चलने लगी</p>
<p>चलते चलते बरसात भारी हो गयी<br />
सड़क अब नहर जैसी नजर आने लगी<br />
लड़की ने कहा-<br />
‘यह क्या हुआ<br />
यह कैसी मेरी और तुम्हारी इश्क की डील हुई<br />
जिस सड़क से निकली थी<br />
वह डल झील हो गयी<br />
पर मैं तो चल रही थी बायें ओर<br />
दायें कैसे चलने लगी<br />
तुम अब पलट कर मेरे साथ बायें  चलो’<br />
ऐसा कहकर वह पलटने लगी </p>
<p>लड़के ने कहा<br />
‘मेरे घर में अंधेरा है<br />
एक ही बल्ब था फुक गया है<br />
खरीद कर जा रहा हूं<br />
मां बीमार है उसके लिये<br />
दवायें भी ले जानी है<br />
यह तो पहली नजर का प्यार था<br />
जो शिकार हो गया<br />
वरना तो दुनियां भर की<br />
मुसीबतें मेरे ही पीछे लगी<br />
तुम जाओ बायें रास्ते<br />
मैं तो दाएं ही जाऊंगा<br />
अब नहीं करूंगा दिल्लगी’</p>
<p>लड़की ने कहा<br />
‘तो तुम भी मेरी तरह फुक्कड़ हो<br />
तुम्हारे कपड़े देखकर<br />
मुझे गलतफहमी हो गयी थी<br />
जो पहली नजर के प्यार का<br />
सजाया था सपना<br />
दूसरी नजर में तुम्हारी सामने आयी असलियत<br />
वह न रहा अपना<br />
इसलिये यह पहले नजर के प्यार की डील<br />
करती हूं कैंसिल’<br />
ऐसा कहकर वह फिर बायें चलने लगी। </strong>----------------------</p>
<blockquote><p><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</blockquote>
<div align="center"></div>
<p>अन्य ब्लाग1.<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a> <a href="http://dprajk.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a> 3.<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[हर जगह बैठा है सिद्ध की खाल में गिद्द-हास्य व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://deepakraj.wordpress.com/?p=535</link>
<pubDate>Thu, 02 Oct 2008 16:03:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://deepakraj.hi.wordpress.com/2008/10/02/sab-jagah-sidd-kee-aad-men-gidd-hindi-poem/</guid>
<description><![CDATA[हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में
बैठा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div align="center"><strong>हर जगह सर्वशक्तिमान के दरबार में<br />
बैठा कोई एक सिद्ध</p>
<p>आरजू लिए कोई वहां<br />
उसे देखता है जैसे शिकार देखता गिद्द<br />
लगाते हैं नारा<br />
"आओ शरण में दरबार के<br />
अपने दु:ख दर्द से मुक्ति पाओ<br />
कुछ चढ़ावा चढ़ाओ<br />
मत्था न टेको भले ही सर्वशक्तिमान के आगे<br />
पर सिद्धों के गुणगान करते जाओ<br />
जो हैं सबके भला करने के लिए प्रसिद्ध</p>
<p>इस किनारे से उस किनारे तक<br />
सिद्धो के दरबार में लगते हैं मेले<br />
भीड़ लगती है लोगों की<br />
पर फिर भी अपना दर्द लिए होते सब अकेले<br />
कदम कदम पर बिकती है भलाई<br />
कहीं सिद्ध चाट जाते मलाई<br />
तो कहीं बटोरते माल उनके चेले<br />
फिर भी ख़त्म नहीं होते जमाने से दर्द के रेले<br />
नाम तो रखे हैं फरिश्तों के नाम पर<br />
फकीरी ओढे बैठे हैं गिद्द<br />
उनके आगे मत्था टेकने से<br />
अगर होता जमाने का दर्द दूर<br />
तो क्यों लगते वहां मेले<br />
ओ! अपने लिए चमत्कार ढूँढने वालों<br />
अपने अन्दर झाँक कर<br />
दिल में बसा लो सर्वशक्तिमान को<br />
बन जाओ अपने लिए खुद ही सिद्ध </strong><br />
--------------------------------</p>
</div>
<blockquote><p align="center"><strong><a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका</a> पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।<br />
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
</blockquote>
<div align="center"></div>
<p>अन्य ब्लाग1.<a href="http://rajlekh.wordpress.com/">दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a> <a href="http://dprajk.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a> 3.<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[A Scary Satire on Gujrat Roits (2002)]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=322</link>
<pubDate>Wed, 01 Oct 2008 13:37:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/10/01/a-scary-satire-on-gujrat-roits-2002/</guid>
<description><![CDATA[   Yeh Desh Hai Veer Jawano Ka
Friends, recently the report of Nanawati Commission on Godhara has]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>  <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/native_warrior_2.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-379" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/native_warrior_2.gif" alt="" width="79" height="192" /></a> <a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/dunga1.pdf">Yeh Desh Hai Veer Jawano Ka</a></strong></p>
<p><strong>Friends, recently the report of Nanawati Commission on Godhara has published. Suddenly, the pictures of Gujrat roits move before the eyes. This cruel vyangya can explain you the  real meaning of roit in different style.</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बुद्धिजीवी समझाते है,पर समाज समझता नहीं-व्यंग्य आलेख]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=510</link>
<pubDate>Mon, 29 Sep 2008 14:38:28 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/09/29/buddhijivi-samjhate-hain-par-samaj-samjhta-nahin-vyangya/</guid>
<description><![CDATA[बहुत दिन से हमारे दिमाग में यह बात नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत दिन से हमारे दिमाग में यह बात नहीं  आ रही कि आखिर कौन किसको क्या और क्यों समझा रहा है? कब समझा रहा है यह तो समझ में  आ रहा है क्योंकि चाहे जब कोई किसी को समझाने लगता है? मगर माजरा हमारी समझ में नहीं आ रहा है। कहीं छपा हुआ पढ़ते हैं या कोई दिखा रहा है तो उसे पढ़ते हैं, मगर समझ में कुछ नहीं आ रहा है। </p>
<p>देश में अनेक जगह पर बम फटे उसमें अनेक लोग हताहत हुए और कई परिवारों पर संकट टूट पड़ा।  सब जगह तफशीश चल रही है पर इधर बुद्धिजीवियों ने देश में बहस शुरू कर दी है।  अमुक धर्म देश तोड़ता है और अमुक तो प्रेम का संदेश देता है।  जाति, भाषा और धर्म के लोग बहस किये जा रहे हैं। किसी से पूछो कि भई क्या बात है? आखिर यह बहस चल किस रही है।’</p>
<p>जवाब मिलता है कि ‘क्या करें विषयों की कमी है।’</p>
<p>जवाब सुनकर हैरानी होती है। फिर सोचते हैं कि ‘जिनको वाद और नारों पर चलने की आदत हो गयी है कि उनके लिये यह कठिनाई तो है कि जो विषय अखबार और टीवी पर दिखता हो उसके अलावा वह लिखें किस बात पर? फिर आजकल लो आलेख और व्यंग्य तात्कालिक मुद्दों पर लिखने के सभी अभ्यस्त हैं। वाद और नारों  जमीन पर खड़े लेखक लोग समाज की थोड़ी हलचल पर ही अपनी प्रतिक्रिया देना प्रारंभ कर देते हैं। आदमी का नाम पूछा और शुरू हो गये धर्म, जाति और भाषा के नाम पर एकता का नारा लेकर। अगर अपराधी है तो उसकी जाति,भाषा और धर्म की सफाई की बात करते हुए एकता की बात करते हैं। हमारे एक सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि क्या ‘आतंकी हिंसा अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है?’</p>
<p>अगर आजकल के बुद्धिजीवियों की बातें पढ़ें और सुने तो लगता है कि यह अपराध शास्त्र से बाहर है क्योंकि इसमें हर कोई ऐसा व्यक्ति अपना दखल देकर विचार व्यक्त करता है जैसे कि वह स्वयं ही विशेषज्ञ हो। व्यवसायिक अपराध विशेषज्ञों की तो कोई बात ही नहीं सुनता। अपराध के तीन कारण होते हैं-जड़ (धन),जोरु (स्त्री) और जमीन। मगर भाई लोग इसके साथ जबरन धर्म, जाति और भाषा का विवाद जोड़ने में लगे हैं। यानि उनके लिये यह अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है। </p>
<p>हम तो ठहरे लकीर के फकीर! जो पढ़ा है उस पर ही सोचते हैं। कभी सोचते हैं कि अपराध शास्त्र के लोग अपने पाठ्यक्रम का विस्तार करें तो ही ठीक रहेगा।  अब इन तीनों चीजों के अलावा तीन और चीजें भी अपराध के लिये उत्तरदायी माने-धर्म,जाति और भाषा।’</p>
<p>यहां यह स्पष्ट कर दें कि हमने अपराध शास्त्र नहीं पढ़ा उनका एक नियम हमने रट रखा है कि अपराध केवल जड़,जोरु और जमीन के कारण ही होता है। अगर अपराध शास्त्री उसमें तीन से छह कारण जोड़ लें तो हम भी अपनी स्मृतियों में बदलाव करेंगे।  अपने दिमागी कंप्यूटर में तीन से छह कारण अपराध के फीड कर देंगे। बाकी जो अन्य विद्वान है उनसे तो हम इसलिये सहमत नहीं हो सकते क्योंकि हम भी अपने को कम विद्वान नहीं समझते। एक विद्वान दूसरे विद्वान से सहमत नहीं होता यह भी हमने कहीं पढ़ा तब से चाहते हुए भी असहमति व्यक्त कर देते हैं ताकि मर्यादा बनी रहे। हां, कोई अपराध शास्त्री कहेगा तो उसे मान जायेंगे। इतना तो हम भी जानते हैं कि अपने से अधिक सयानों की बात मान लेनी चाहिये। </p>
<p>सभी आतंकी हिंसा की घटनाओं की चर्चा करते हैंं। हताहतों के परिवारों पर जो संकट आया उसका जिक्र करने की बजाय लोग उन मामलों में संदिग्ध लोगों पर चर्चा कर रहे हैं। उनके धर्म और जाति पर बहस छेड़े हुए हैं। अब समझाने वालों के जरा हाल देखिये। </p>
<p>एक तरफ कहते हैं कि दहशत की वारदात को किसी धर्म,जाति या भाषा से मत जोडि़ये। दूसरी तरफ जब वह उस पर चर्चा करते हैं तो फिर अपराधियों की जाति, भाषा और धर्म को लेकर बहस करते हैं। वह धर्म ऐसा नहीं है, वह जाति तो बहुत सौम्य है और भाषा तो सबकी महान होती है। अब समझ में नहीं आता कि वह कि हिंसक घटना से  धर्म, जाति और भाषा से अलग कर रहे हैं या जोड़ रहे हैं। यह हास्याप्रद स्थिति देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। </p>
<p>फिर कहते हैं कि संविधान और कानून का सम्मान होना चाहिये। मगर बहसों में संदिग्ध लोगों की तरफ से सफाई देने लगते हैं।  एक तरफ कहते हैं कि अदालतों में यकीन है पर दूसरी तरफ बहस करते हुए किसी के दोषी या निर्दोष होने का प्रमाण पत्र चिपकाने लगते हैं। इतना ही नहीं समुदायों का नाम लेकर उनके युवकों से सही राह पर चलने का आग्रह करने लगते हैं। हम जैसे लोग जो इन वारदातों को वैसा अपराध मानते हैं जैसे अन्य और किसी समुदाय से जोड़ने की सोच भी नहींं सकते उनका ध्यान भी ऐसे लोगों की वजह से चला जाता है।  </p>
<p>इस उहापोह में यही सोचते हैं कि आखिर लिखें तो किस विषय पर लिखें। अपराध पर या अपराधी के समुदाय पर। अपराध की सजा तो अदालत ही दे सकती है पर अपराधी की वजह से  जाति,धर्म, और भाषा के नाम पर बने भ्रामक समूहों की चर्चा करना हमें पसंद नहीं है।  ऐसे में सोचते हैं कि नहीं लिखें तो बहुत अच्छा।  जिन लोगों ने इन वारदातों में अपनी जान गंवाई है उनके तो बस जमीन पर बिखरे खून का फोटो दिखाकर उनकी भूमिका की इतिश्री हो जाती है और उनके त्रस्त परिवार की एक दो दिन चर्चा रहती है पर फिर शुरू हो जाता है अपराधियों के नाम का प्रचार। हादसे से पीडि़त परिवारों की पीड़ा को इस तरह अनदेखा कर देने वाले बुद्धिजीवियों को देखकर उनके संवेदनशील होने पर संदेह होता है।</p>
<p>फिर शुरू होता है समझने और समझाने का अभियान। इस समय सभी जगह यह समझने और समझाने का अभियान चल रहा है।  हम बार बार इधर उधर दृष्टिपात करते हैं पर आज तक यह समझ में नहीं आया कि कौन किसको क्या और क्यों समझा रहा है? समझाने वाला तो कहीं लिखता तो कहीं बोलता दिखता है पर वह समझा किसको रहा है यह दिखाई नहीं देता।<br />
-------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://razlekh-hindi.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन-पत्रिका...’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[ A Scrutiny of Horror Film  "Phoonk"]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=284</link>
<pubDate>Fri, 26 Sep 2008 15:56:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/09/26/a-scrutiny-of-horror-film-foonk/</guid>
<description><![CDATA[         Ramgopal Verma Ki &#8220;Phoonk&#8221;   
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p> <a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/ag00410_.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-302" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/ag00410_.gif" alt="" width="75" height="94" /></a>     <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/lo.gif"></a>   <a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/phoonk2.pdf">Ramgopal Verma Ki "Phoonk"</a>   <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/lo.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-371" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/lo.gif" alt="" width="84" height="85" /></a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[A Hasya Lekh on Polution]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=275</link>
<pubDate>Wed, 24 Sep 2008 06:28:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/09/24/a-hasya-lekh-on-polution/</guid>
<description><![CDATA[           Hum Se Hai Pradushan
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>       <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/ag00321_.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-387" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/ag00321_.gif" alt="" width="193" height="112" /></a>    <a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/polution4.pdf">Hum Se Hai Pradushan</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[A Dashing Satire on Home Minister -Shivraj Patil]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=252</link>
<pubDate>Sun, 21 Sep 2008 06:32:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/09/21/a-dashing-satire-on-home-minister-shivraj-patil/</guid>
<description><![CDATA[     Sajana Hai Mujhe&#8230;&#8230;..
When Rome was burning Nero was playing flute and when Delh]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/ag00222_1.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-253" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/ag00222_1.gif" alt="" width="106" height="100" /></a>     <a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/sajana-hai-mujhe2.pdf">Sajana Hai Mujhe........</a></p>
<p><strong>When Rome was burning Nero was playing flute and when Delhi was burnig our Home Minister was changing suits.</strong></p>
<p><strong></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[शब्दों के सौदागर के हाथ बिक या अपने लिए लिख-व्यंग्य कविता  hasya vyangya kavita]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=103</link>
<pubDate>Sat, 20 Sep 2008 13:26:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.hi.wordpress.com/2008/09/20/likhta-hai-to-bikta-dikh-hindi-poem-and-kavita/</guid>
<description><![CDATA[बिकने के लिए तैयार है तो
फिर सौदे जैसा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बिकने के लिए तैयार है तो<br />
फिर सौदे जैसा लिख और दिख</p>
<p>बाज़ार के कायदे हैं अपने<br />
जहां मत देख ईमानदार बने रहने के सपने<br />
दाम तेरी पसंद का होगा<br />
काम खरीददार के मन जैसा होगा<br />
भाव होगा वैसा ही होगा जैसा दाम<br />
शब्द होंगे तेरे, पर नाम कीमत देने वाले होगा<br />
अपने नाम को आसमान में<br />
चमकता देने  की चाहत छोड़ देना होगा<br />
वहां तो उसको ही शौहरत मिलेगी<br />
जिसका घर भी उड़ता होगा<br />
तू जमीन में रेंगना सीख ले<br />
इशारों को समझ कर लिख<br />
जैसा वह चाहें वैसा दिख </p>
<p>मत कर भरोसा शब्दों की जंग लड़ने वालों पर<br />
अपनी जिन्दगी में तरसे हैं<br />
वह कौडियों के लिए<br />
उनका लिखा बेशकीमती हो गया<br />
उनके मरने के बाद<br />
अमीरों पर उनके नाम से रूपये बरसे हैं<br />
पेट में भूख हो तो कलम तलवार नहीं हो सकती<br />
करेगी प्रशस्ति गान किसी का<br />
तभी तेरी रोटी पक  सकती<br />
कब तक लिखेगा लड़ते हुए<br />
स्याही भी कोई मुफ्त नहीं मिल सकती<br />
शब्दों को सजाये कई लोग घूम रहे हैं<br />
पर खरीददार नहीं मिलता<br />
मिल जाए तो बिक जाना<br />
या फिर छोड़ दे ख्वाहिश<br />
शब्दों से पेट भरने का<br />
किसी से लड़ने का<br />
दिल को तसल्ली दे वाही लिख<br />
जैस मन चाहे वैसा दिख<br />
फेर ले शब्दों के सौदागरों से मुहँ<br />
वह तुझे देखते रहे<br />
तू भी नज़रें घुमा कर देखता रहना<br />
उनका   पुतले और पुतलियों की तरह<br />
दूसरों के इशारों नाचना भी<br />
तेरी कई रचनाओं को जन्म देगा<br />
पर ऐसा करता बिलकुल मत दिख<br />
बस अपना लिख<br />
------------------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://teradipak.blogspot.com"><br />
<blockquote>‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</p></blockquote>
<p></a> पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[सुविधाओं के गुलाम-व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=92</link>
<pubDate>Fri, 19 Sep 2008 17:35:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.hi.wordpress.com/2008/09/19/suvidhaon-ke-gulam-hasya-vyangya-in-hindi/</guid>
<description><![CDATA[15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। परंतत्र देश स्वतंत्र हुआ  पर क्या परतंत्र का मतलब गुलामी होता है। कुछ प्रश्न है जिन पर विचार किया जाना चाहिये। विचार होगा इसकी संभावना बहुत कम लगती है क्योंकि वाद ओर नारों पर चलने वाले भारतीय बुद्धिजीवी समाज की चिंतन करने की अपनी सीमायें हैं और अधिकतर इतिहास में लिखे गये तथ्यों-जिनकी विश्वसनीयता वैसे ही संदिग्ध हेाती है- के आधार पर भविष्य की योजनायें बनाते है। </p>
<p>कई ऐसे नारे गढ़े गये हैं जिनको भुलाना आसान नहीं लगता।  कोई कहता है कि चार हजार वर्ष तक भारत गुलाम रहा तो कोई दो हजार वर्ष बताकर मन का बोझ हल्का करता है।  अगर मन लें वह गुलामी थी तो फिर क्या आज आजादी हैं? अगर यह आजादी है तो यह पहले भी थी। परंतत्रता और गुलामी में अंतर हैं। तंत्र से आशय  कि आपके कार्य करने के साधनों से हैं।  शासन, परिवार और संस्थाओं का आधार उनके कार्य करने का तंत्र होता है जिसमें मनुष्य और साधन संलिप्त रहकर काम करते हैं। परतंत्रता से आशय यह है कि इन कार्य करने वालों साधनों और लोगों का दूसरे के आदेश पर काम करना। सीधी बात करें तो देश का शासन करने का तंत्र ही आजाद हुआ था पर लोग अपनी मानसिकता को अभी भी गुलामी में रखे हुए हैे।  अधिकतर लोगों का मौलिक चिंतन नहीं है और वह इतिहास की बातें कर बताते हैं कि वह ऐसा था और वहां यह था पर भविष्य की कोई योजना किसी के पास नहीं है।<br />
जैसे जैसे प्रचार माध्यमों की शक्ति बढ़ रही है लोग सच से रू-ब-रू हो रहे हैं और वह इस आजादी को ही भ्रम बता रहे हैं। वह अपने विचार आक्रामक ढंग से व्यक्त करते हैं पर फिर गुलामों जैसे ही निष्कर्ष निकालते हैं। बहुत विचार करना और उससे आक्रामक ढंग से व्यक्त करने के बाद  अंत में ‘हम क्या कर सकते हैं’ पर उनकी बात समाप्त हो जाती है।<br />
शायद कुछ लोगों को यह लगे कि यह तो विषय से भटकाव है पर अपने समाज के बारे में विचार किये  बिना किसी भी प्रकार की आजादी को मतलब समझना  कठिन है।  आज भी  विश्व के पिछड़े समाजों में हमारा समाज माना जाता है। बीजिंग में चल रहे ओलंपिक में एक ही स्वर्ण पदक पर पूरा देश नाच उठा पर 110 करोड़ के इस देश में कम से कम  25 स्वर्ण पदक होता तो मानते कि हमारा तंत्र मजबूत है।  जब भी इन खेलों में भारतीय दलों की नाकाम की बात होती है तो तंत्र को ही कोसा जाता है। यानि हमारा तंत्र कहीं से भी इतना प्रभावशाली नहीं है कि वह 25 स्वर्ण पदक जुटा सके।  इक्का-दुक्का स्वर्ण पदक आने पर नाचना भी हैरानी की बात है। भारत ने व्यक्तिगत स्पर्धा में पहली बार अब यह स्वर्ण पदक जीता जबकि पाकिस्तान का एक मुक्केबाज इस कारनामे को पहले ही अंजाम दे चुका है पर वहां भी एसी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। हमारे देश  एक स्वर्ण पदक पर इतना उछलना ही इस बात का प्रमाण है कि लोगों के दिल को यह तसल्ली हो गयी कि ‘चलो एक तो स्वर्ण पदक आ गया वरना तो बुरे हाल होते’।</p>
<p>तंत्र की नाकामी को सभी जानते हैं। इस पर बहसें भी होती हैं पर निष्कर्ष के रूप में कदम कोई नहीं उठाता। वर्तमान हालतों से सब अंसतुष्ट हैं पर बदलाव की बात कोई सोचता नहीं है। अग्रेज अपनी ऐसाी शैक्षणिक प्रणाली यहां छोड़ गये जिसमें गुलाम पैदा होते हैंं।  यह अलग बात है कि बड़ा गुलाम छोटे गुलाम का साहब होता है। </p>
<p>समाज और लोगों की आदतों को ही देख लें वह किस कदर सुविधाओं के गुलाम हो गये है। देश में आयात अधिक है और निर्यात कम। विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता क्या गुलामी नहीं है।  जिसे पैट्रोल पर पूरा देश दौड़ रहा है उसका अधिकांश भाग विदेश से आता है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का प्रयास उसका अंग था पर क्या वह आज कोई कर रहा है।  पूरा देश गैस, पैट्रोल का गुलाम हो गया है। अगर इनका उत्पादन  पूरी तरह देश में होता तो कोई बात नहीं पर अगर किसी कारण वश कोई देश भारत को तेल का निर्यात बंद कर दे या िकसी अन्य कारण से बाधित हो जाये तो फिर इस देश का क्या होगा? पूरा का पूरा समाज अपंग हो जायेगा। अपने शारीरिक तंत्र से लाचार होकर सब देखता रहेगा।</p>
<p>फिर जिन अंग्रेजों को खलनायक मानते थे आज उसकी प्रशंसा करते हैं। उसकी हर बात को बिना किसी प्रतिवाद के मान लेते हैं।  हमारे देश के अनेक लोग वहां अपने लिये रोजगार पाने का सपना देखते हैं। वैसी भी अंग्रेजों का रवैया अभी साहबों से कम नहीं है। वैसे पहले तो अपने भाषणों में सभी वक्ता अंग्रेजों को कोसते थे पर अब यह काम किसी के बूते का नहीं है। अमेरिका के मातहत अंग्रेजों से कोई टकरा पाये इसका साहस किसी में नहीं है। फिर उनके द्वारा छोड़ी गयी साहब और गुलाम की व्यवस्था में हम कौनसा बदलाव ला पाये। </p>
<p>फिर अंग्रेजों ने कोई भारत को गुलाम नहीं बनाया था। उन्होंने यहां रियासतों के राजा और महाराजाओं को हटाकर अपना शासन कायम  किया था। यही कारण है कि आज भी कई लोग उनको वर्तमान भारत के स्वरूप का निर्माता मानते हैं।  अगर देखा जाये तो जिस आम आदमी के आजादी से सांस लेकर जीने का सपना देखा गया वह कभी पूरा नहीं हो सका क्योंकि तंत्र के संचालक बदले पर तंत्र नहीं। जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं तो अंग्रेजों की बात करनी पड़ती है पर अगर स्थापना दिवस की बात की जाये तो इस बात को भुलाया जा सकता है कि उनके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था। पिछले दिनों अखबारों में छपा था कि ब्रिटेन में भी सरकारी दफ्तर लालफीताशाही और कागजबाजी के शिकार हैं। वहां भी काम कम होता है।  यानि हमारे यहां उनके द्वारा यहां स्थापित तंत्र ही काम रहा है जिसमें कागजों में लिखा पढ़कर फैसला किया जाता है या छोटे से छोटे काम पर चार लोग बैठकार लंबे समय तक विचार कर उसे करने का निर्णय करते हैं। वैसे तो लगता था कि अंग्रेजों ने केवल यहां ही साहब और गुलाम की व्यवस्था रखी पर दरअसल यह तो उनके यहां भी यही तंत्र काम कर रहा है।  वहां भी कोई सभी साहब थोड़े ही हैं। वहां भी आम आदमी है और सभी लार्ड नहीं है।  भारत से गये कुछ लोग भी वहां लार्ड की उपाधि से नवाजे गये हैं। मतलब यह कि भारतीय भी लार्ड हो सकते हैं यह अब पता चला है। ऐसे में ख्वामख्वाह में अंग्रेजों को महत्व देना। इससे तो अच्छा है कि इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता तो अच्छा था।<br />
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<blockquote><p><strong>यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://teradipak.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</a> पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://anantraj.blogspot.com/">3.अनंत शब्दयोग</a><br />
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जिंदा रहने के बहाने तलाशता आदमी-हिंदी शायरी  ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=99</link>
<pubDate>Fri, 19 Sep 2008 17:18:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.hi.wordpress.com/2008/09/19/admi-aur-bahane-hindi-poem-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[एक बच्चे के पैदा होने पर
घर में खुशी का ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक बच्चे के पैदा होने पर<br />
घर में खुशी का माहौल छा जाता है<br />
भागते हैं घर के सदस्य इधर-उधर<br />
जैसी कोई आसमान से उतरा हो<br />
ढूढे जाते हैं कई काम जश्ने मनाने के लिए<br />
आदमी व्यस्त नजर आता है</p>
<p>एक देह से निकल गयी आत्मा<br />
शव  पडा हुआ है<br />
इन्तजार है किसी का,  आ जाये तो<br />
ले जाएं और कर  दें  आग के सुपुर्द<br />
तमाम तरह के तामझाम<br />
रोने की चारों तरह आवाजें<br />
कई दिन तक गम मनाना<br />
दिल में न हो पर शोक जताना<br />
आदमी व्यस्त नजर आता है<br />
<span class=""></span><br />
<span class="">निभा रहे हैं परंपराएं </span><br />
<span class="">अपने अस्तित्व का अहसास कराएं </span><br />
<span class="">चलता है आदमी ठहरा हैं मन </span><br />
<span class="">बंद हैं जमाने के बंदिशों में </span><br />
लगता है आदमी काम कर रहा है<br />
पर सच यह है कि वह भाग रहा है<br />
अपने आपसे बहुत दूर<br />
जिंदा रहने के बहाने तलाशता<br />
आदमी व्यस्त नजर आता है<br />
--------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://teradipak.blogspot.com"><br />
<blockquote>‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</p></blockquote>
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</item>
<item>
<title><![CDATA[रोटी का इंसान से बहुत गहरा है रिश्ता-हिंदी शायरी ]]></title>
<link>http://dpkraj.wordpress.com/?p=295</link>
<pubDate>Fri, 19 Sep 2008 16:26:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://dpkraj.hi.wordpress.com/2008/09/19/roti-aur-insan-ka-rishta-hindi-shayri/</guid>
<description><![CDATA[पापी पेट का है सवाल
इसलिये रोटी पर मचा ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong>पापी पेट का है सवाल<br />
इसलिये रोटी पर मचा रहता है<br />
इस दुनियां में हमेशा बवाल<br />
थाली में  रोटी सजती हैं<br />
तो फिर चाहिये मक्खनी दाल<br />
नाक तक रोटी भर जाये<br />
फिर उठता है अगले वक्त की रोटी का सवाल<br />
पेट भरकर फिर खाली हो जाता है<br />
रोटी का थाल फिर सजकर आता है<br />
पर  रोटी से इंसान का दिल कभी नहीं भरा<br />
यही है एक कमाल<br />
...........................<br />
रोटी का इंसान से<br />
बहुत गहरा है रिश्ता<br />
जीवन भर रोटी की जुगाड़ में<br />
घर से काम<br />
और काम से घर की<br />
दौड़ में हमेशा  पिसता<br />
हर सांस में बसी है उसके ख्वाहिशों<br />
से जकड़ जाता है<br />
जैसे  चुंबक की तरफ<br />
लोहा खिंचता </strong></strong><br />
.........................................</p>
<blockquote><p><strong>यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग  <a href="http://teradipak.blogspot.com"><br />
<blockquote>‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’</p></blockquote>
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अन्य ब्लाग<br />
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</item>
<item>
<title><![CDATA[A Letter of Thanks from SIMI (A hard core satire)]]></title>
<link>http://kmmishra.wordpress.com/?p=225</link>
<pubDate>Thu, 18 Sep 2008 17:48:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>Krishna Mohan</dc:creator>
<guid>http://kmmishra.hi.wordpress.com/2008/09/18/a-letter-of-thanks-from-simi-a-hard-core-satire/</guid>
<description><![CDATA[         Letter from A SIMI Member
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>        <a href="http://kmmishra.files.wordpress.com/2008/10/head_2.gif"><img class="alignnone size-full wp-image-376" src="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/10/head_2.gif" alt="" width="59" height="97" /></a> <a href="http://kmmishra.wordpress.com/files/2008/09/simi-letter5.pdf">Letter from A SIMI Member</a></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[असली दानवों को नकली  देवता नहीं पराजित कर सकते-हास्य व्यंग्य शायरी ]]></title>
<link>http://rajlekh.wordpress.com/?p=500</link>
<pubDate>Thu, 18 Sep 2008 16:10:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajlekh.hi.wordpress.com/2008/09/18/aslee-shetannakli-devta-hasya-vyangya-poem-and-shayri/</guid>
<description><![CDATA[प्रचार माध्यमों में अपराधियों की
चर्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रचार माध्यमों में अपराधियों की<br />
चर्चा कुछ इस तरह ऐसे आती है<br />
कि उनके चेहरे पर चमक छा जाती है<br />
कौन कहां गया<br />
और क्या किया<br />
इसका जिक्र होता है इस तरह कि<br />
असली शैतान का दर्जा पाकर भी<br />
अपराधी खुश हो जाता है</p>
<p>पर्दे के नकली हीरो का नाम<br />
देवताओं की तरह सुनाया जाता है<br />
