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	<title>hindi-article &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
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	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "hindi-article"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 13:16:22 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[भृतहरि शतकःआजीविका कमाते हुए मनुष्य की जिंदगी चली जाती है]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=42</link>
<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 04:01:20 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं<br />
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः<br />
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां<br />
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ-परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनको बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>हर मनुष्य को अपने जीविकोपार्जन के लिये कार्य करना पड़ता है पर वह केवल इससे संतुष्ट नहीं होता। उसने अनेक तरह के सामाजिक व्यवहारों की परंपरा बना ली है जिसके निर्वहन के लिये अधिक धन की आवश्यकता होती है। मनुष्य समुदाय ने कथित संस्कारों के नाम पर एक दूसरे मुफ्त में भोजन कराने के लिये ऐसे रीति रिवाजों की स्थापाना की है जिनको हरेक के लिये करना अनिवार्य हो गया है और जो नहीं करता उसका उपहास उड़ाया जाता है। अपने परिवार के भरण-पोषण करने के अलावा पूरे कथित समाज में सम्मान की चिंता करता हुआ आदमी पूरी जिंदगी केवल इसी में ही बिता देता है और कभी उसके पास भजन के लिये समय नहीं रह पाता। वह न तो अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर पाता है और न इस प्रकृति के विभिन्न रूपों को देख सकता है। बस अपना जीवन ढोता रहता है। अपने अंदर बौद्धिक गुणों का वह कभी उपयोग नहीं कर पाता। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतक:स्त्री को अबला मानने वाले कवि विपरीत बुद्धि के]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=41</link>
<pubDate>Fri, 04 Jul 2008 01:32:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=41</guid>
<description><![CDATA[
नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो
ये नित्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो<br />
ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीनाम् ।<br />
याभिर्विलालतर तारकदृष्टिपातैः<br />
शक्रायिऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः</strong><br />
इस श्लोक का आशय यह है कि जो कवि सुंदर स्त्री को अबला मानते हैं उनको तो विपरीत बुद्धि का माना जाना चाहिए। जिन स्त्रियों ने अपने तीक्ष्ण दृष्टि से देवताओं तक को परास्त कर दिया उनको अबला कैसे माना जा सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>अधिकतर कवि और रचयिता स्त्री को अबला मानते हैं पर भर्तुहरि महाराज ने उसके विपरीत उन्हें सबला माना है। सुंदर स्त्री से आशय समूची स्त्री जाति से ही माना जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री का सौंदर्य उसके हृदय में स्थित लज्जा और ममता भाव में है जो कमोवेश हर स्त्री में होती है। माता चाहे किसी भी रंग या नस्ल की हो बच्चे पर अपनी ममता लुटा देती है। बच्चा भी अपनी मां को बड़े प्रेम से निहारता है। पूरे विश्व मेंे अनेक कवि और लेखक नारी को अबला मानकर उस पर अपनी विषय सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में बहुत अज्ञानी होते हैं। उन्हें अपनी रचना के समय यह आभास नहीं होता कि हर स्त्री का किसी न किसी पुरुष-जिसमें पिता, भाई, पति और रिश्ते-से संबंध होता है। वह सबके साथ निभाते हुए उनसे संरक्षण पाती है। जो लोग स्त्री को अबला मानकर अपनी रचना लिखते हैं वह वास्तव में अपने आसपास स्थित नारियों से अपने संबंधों पर दृष्टिपात किये बिना ही केवल नाम पाने के लिये लिखते हैं और इसी कारण आजकल पूरे विश्व में नारी को लेकर असत्य साहित्य की भरमार है। अनेक कहानियां और कवितायें नारियों को अबला और शोषित मानकर कर लिखीं जातीं हैं और उनमें सच कम कल्पना अधिक होती है। ऐसे लोग विपरीत बुद्धि के महत्वांकाक्षी लेखक लोगों की बुद्धि तरस योग्य है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:बिना पूछे दान देना अधर्म का कार्य]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=40</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 03:44:12 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=40</guid>
<description><![CDATA[
१.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत श]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
१.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।<br />
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।<br />
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।<br />
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ के सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है। 1</p>
<p>  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःकामदेव का शिकार हुए बिना युवावस्था निकल जाये तो धन्य समझें]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=38</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:26:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=38</guid>
<description><![CDATA[
श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्त्रोतसि<br />
प्रद्युम्नप्रियन्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति।<br />
तन्वीनेत्रयचकोरवनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ<br />
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ’- जैसे श्रृंगार रस के पौधे को मेघ सींचकर उसको वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं वैसे ही युवावस्था में अपने कदम रख रहे युवकों के हृदय में कामदेव उत्तेजना और काम भावना उत्पन्न करते हैं। उनका इष्ट तो कामदेव ही होता हे। वह अपनी वाणी से ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं जिससे कि नवयुवतियां का हृदय जीतकर उसमें अपना स्थान बनायें। नवयुवतियां भी पूनम के चंद्रमा की तरह दृष्टिगोचर होती हैं और वह उन युवकों को एकटक देखकर आनंद विभोर होती हैं। इस युवावस्था में जो नहीं बहके उस तो धन्य ही समझना चाहिए।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>प्राचीन काल में जब समाज इतना खुला नहीं था तब संभवतः भृतहरि के इस श्लोक को इतना महत्व नहीं मिला होगा जितना अब खुलेपन की राह पर चलते हुए समाज को देखते हुए लग रहा है। भारत के उष्ण जलवायु के चलते वैसे भी लोगों में काम भावना अधिक होती है। हम लोग अक्सर ऐसे समाचार सुंनते हैं जिसमें अनैतिक अथवा विवाहेत्तर संबंधों का दुष्परिणाम सामने आता है। कहा जाता है कि बुराई का अंत भी बुरा ही होता है। कामदेव के क्षणिक प्रभाव में आकर कई लोग अनेक गल्तियां कर जाते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम उनको जीवन भर भोगना पड़ता है। आजकल जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा है वह अनैतिक या विवाहेत्तर संबंध बनाने में कोई संकोच नहीं करते। एक नहीं ऐसे हजारांे उदाहरण है जब ऐसे गलत संबंधों के कारण लोग अपराध में लिप्त हो जाते हैं। जो युवक-युवतियां अपने परिवार से मिली छूट का लाभ उठाकर खुलेपन से यौन संबंध तो बना लेते हैं पर बाद में जब जीवन संजीदगी से गुजारने का विचार आता है तो स्वयं को उसके लिये तैयार नहीं कर पाते। कहीं युवतियां तो कहीं युवक इस कामदेव के शिकार होकर अपनी देहलीला तक समाप्त कर लेते हैं। कुछ युवतियां को युवकों की हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। हालांकि आजकल प्रचार माध्यमों में इसे कथित रूप से प्यार कहा जाता है पर यह एक भ्रम है। आजकल के नवयुवक नवयुवतियों को आकर्षित करने के लिए उनको शायरी और गीत सुनाने प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने कहीं से उठा ली होती हैं। वह इस तरह का प्रयास करते हैं कि उनको एक कवि या शायर समझकर नवयुवतियां प्रभावित हो जायें। </p>
<p>यह तो कामदेव की माया है। हमारे देश में प्यार या प्रेम के अर्थ बहुत व्यापक होते हैं पर पश्चिम की संस्कृति को अपनाने के कारण यह केवल युवक-युवतियों के संबंधों तक ही सीमित रह गया हैं। ऐसे में जो नवयुवक और नवयुवतियां इस अवस्था से सुरक्षित निकल जाते हैं वह स्वयं अपने को धन्य ही समझें कि उन्होंने कोई ऐसी गलती नहीं की जिससे उनको जीवन भर पछताना पड़े।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच न करें]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=36</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 03:12:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=36</guid>
<description><![CDATA[1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दूसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,हजारों गायों के बीच बछ्दा केवल अपने माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।</p>
<p>2.ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।</p>
<p>3.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।<br />
*इसका आशय यह है हमें अगर ज्ञान अपने लघु व्यक्ति से मिलता हो तो उसे ग्रहण करना चाहिऐ। सज्जन व्यक्ति से अगर वह गरीब भी है तो संपर्क करना चाहिए। आगे व्यक्ति गुणी है पर निम्न जति या वर्ग है तो भी उसकी प्रशंसा करना चाहिए।<br />
युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।<br />
4.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।</p>
<p>*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:मांस खाने वाले राम को नहीं जानते]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=35</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 02:59:06 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=35</guid>
<description><![CDATA[काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष
निश्च]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष<br />
निश्चय राम न जानहीं, कहैं कबीर संदेस</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो पशु को मारकर उसकी देह काटा करते हैं वह सब पाखंडी हैं और भगवान श्री राम को नहीं जानते-यही मेरा संदेश है।</p>
<p><strong>बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल<br />
जो बकरी को खात है, तिनका कौन हवाल</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो बकरी केवल घासी खाती है उसकी खाल खींच ली जाती है तो उन मनुष्यों का क्या हाल होता होगा जो बकरी का मांस खाते हैं।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल समाज में मांस खाने का प्रचलन बढ़ रहा है और अंग्रेजी के आकर्षक नाम रखकर उसके खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं। सच तो यह है कि मांस भक्षण करने के लिये मनुष्य की देह उपयुक्त नहीं है और वर्तमान समय में हम देखें तो अनेक रोग इसी कारण फेल रहे हैं क्योंकि लोग गरिष्ठ भोजन कर रहे है।<br />
मांस खाने से शरीर में मांस बढ़ता है और इससे हमारी नसों में रक्त प्रवाह बाधित होता हैं। एक बात यह याद रखने योग्य है कि हम वैसा ही सोचते और बोलते है जैसे तत्व हमारे रक्त में हेाते हैं। इतना ही नहीं हमारी देह से वैसे ही गंध भी निकलती है जिसके अनुरूप दूसरे लोगों पर हमारा अच्छा प्रभाव पढ़ता है। यह बहुत सूक्ष्म ज्ञान है पर इसकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता। </p>
<p>अतः हमें अपना खान-पान में अधिक से अधिक सात्विकता रखनी चाहिए ताकि हमारे तन, मन और विचारों में पवित्रता रहे और लोगों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़े।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतक:आजीविका की खोज में आदमी के गुण व्यर्थ हो जाते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=34</link>
<pubDate>Sat, 28 Jun 2008 03:56:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं<br />
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः<br />
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां<br />
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनको बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःसंसार में आ रहे परिवर्तन से विचलित न हों]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=32</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:35:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=32</guid>
<description><![CDATA[
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते<br />
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्</strong></p>
<p>हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।</p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के भय से। कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उनके मुखिया उपयोग करते हैं।कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहंा जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा। </p>
<p>ऐसे भाव लाने का कोई औचित्य नहीं है। यह मान लेना चाहिए कि परिवर्तन आयेगा। आज हम जहां हैं वहां कल कोई अन्य व्यक्ति आयेगा। जहां हम आज हैं वह पहले कोई अन्य था। कई परिवर्तनों की अनुभूति तो हमें हो ही नहीं पाती। बचपन के मित्र युवावस्था में नहीं होते। युवावस्था के मित्र नौकरी में साथ नहीं होते। इस संसार में समय का चक्र घूमता है और उसमें परिवर्तन तो होते ही रहना है और हमें उनको दृष्टा होकर देखना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रेम अपने समान व्यक्ति से करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=31</link>
<pubDate>Fri, 20 Jun 2008 14:22:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=31</guid>
<description><![CDATA[
यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात<br />
अपने जिये से जानिये, मेरे जिय की बात </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी लोगों की देह में जीव तत्व एक ही है। आपस में प्रेम करने वालों में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनो के प्राण एक ही होता है। इस गूढ रहस्य को वे ही जानते हैं जो वास्तव में प्रेमी होते हैं</p>
<p><strong>प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय<br />
कबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे प्रेमी क्षमा कर भूल जायें। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>प्रेम किया नहीं हो जाता है यह फिल्मों द्वारा संदेश इस देश में प्रचारित किया जाता है। सच तो यह है कि ऐसा प्रेम केवल देह में स्थित काम भावना की वजह से किया जाता है। प्रेम हमेशा उस व्यक्ति के साथ किया जाना चाहिए जो वैचारिक सांस्कारिक स्तर पर अपने समान हो। जिनका हृदय भगवान भक्ति में रहता है उनको सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले लोग विष के समान प्रतीत होते हैं। यहां दिन में अनेक लोग मिलते है पर सभी प्रेमी नहीं हो जाते। कुछ लोग छल कपट के भाव से मिलते हैं तो कुछ लोग स्वार्थ के भाव से अपना संपर्क बढ़ाते हैं। भवावेश में आकर किसी को अपना सहृदय मानना ठीक नहीं है। जो भक्ति भाव में रहकर निष्काम से जीवन व्यतीत करता है उनसे संपर्क रखने से अपने आपको सुख की अनुभूति मिलती है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मिलन के साथ वियोग भी आसान होना चाहिए-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=30</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 08:07:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=30</guid>
<description><![CDATA[
कुछ ऐसी घटनाएँ अक्सर समाचारों में सुर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i20.tinypic.com/ouv79t.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' /><br />
कुछ ऐसी घटनाएँ अक्सर समाचारों में सुर्खियाँ बनतीं है जिसमें पति अपनी पत्नी की हत्या कर देता है<br />
१. क्योंकि उसे संदेह होता है की उसके किसी दूसरे आदमी से उसके अवैध संबंध हैं।<br />
२.या पत्नी उसके अवैध संबंधों में बाधक होती है।<br />
इसके उलट भी होता है। ऐसी घटनाएँ जो अभी तक पाश्चात्य देशों में होतीं थीं अब यहाँ भी होने लगीं है और कहा जाये कि यह सब अपनी सभ्यता छोड़कर विदेशी सभ्यता अपनाने का परिणाम है तो उसका कोई मतलब नहीं है। यह केवल असलियत से मुहँ फेरना होगा और किसी निष्कर्ष से बचने के लिए दिमागी कसरत से बचना होगा।<br />
हम कहीं न कहीं सभी लोग पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर ही रहे हैं। फिर भी समाज में बदनामी का डर रहता है इसलिए पुराने आदर्शों की बात करते हैं पर विवाह और जन्म दिन के अवसर पर हम सब भूलकर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं जिस पर पश्चिम चल रहा है।<br />
मैं एक दार्शनिक की तरह समाज को जब देखता हूँ तो कई लोगों को ऐसे तनावों में फंसा पाता हूँ जिसमें आदमी का धन और समय अधिक नष्ट होता देखता हूँ। कई माँ-बाप अपने बच्चों की शादी कराकर अपने को मुक्त समझते हैं पर ऐसा होता नहीं है। लड़कियों की कमी है पर लड़के वालों के अंहकार में कमी नहीं है। हम इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि लडकी के बाप के रूप में आदमी झुकता है लड़के के बाप के रूप में अकड़ता है। अपने आसपास जब कुछ लोगों को बच्चों के विवाह के बाद भी उनके तनाव झेलते हुए पाता हूँ तो हैरानी होती है। </p>
<p>रिश्ते करना सरल है और निभाना और मुश्किल है और उससे अधिक मुश्किल है उनको तोड़ना। कई जगह लडकी भी लड़के के साथ रहना नहीं चाहती पर लड़के वाले दहेज़ और अन्य खर्च की वापसी न करनी पड़े इसलिए मामले को खींचते हैं। कई जगह कामकाजी लडकियां घरेलू तनाव से बहुत परेशान होती हैं और वह अपने पति से अलग होना चाहतीं है पर यह काम उनको कठिन लगता है। लंबे समय तक मामला चलता है। कुछ घर तो ऐसे भी देखे हैं कि जिनका टूटना तय हो जाता है पर उनका मामला बहुत लंबा चला जाता है। दरअसल अधिकतर सामाजिक और कानूनी कोशिशे परिवारों को टूटने से अधिक उसे बचाने पर केन्द्रित होतीं है। कुछ मामलों में मुझे लगा कि व्यर्थ की देरी से लडकी वालों को बहुत हानि होती है। अधिकतर मामलों में लडकियां तलाक नहीं चाहतीं पर कुछ मामलों में वह रहना भी नहीं चाहतीं और छोड़ने के लिए तमाम तरह की मांगें भी रखतीं है। कुछ जगह लड़किया कामकाजी हैं और पति से नहीं बनतीं तो उसे छोड़ कर दूसरा विवाह करना चाहतीं है पर उनको रास्ता नहीं मिल पाता और बहुत मानसिक तनाव झेलतीं हैं। ऐसे मामले देखकर लगता है कि संबंध विच्छेद की प्रक्रिया बहुत आसान कर देना चाहिए। इस मामले में महिलाओं को अधिक छूट देना चाहिऐ। जहाँ वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहतीं वह उन्हें तुरंत तलाक लेने की छूट होना चाहिए। जिस तरह विवाहों का पंजीयन होता है वैसे ही विवाह-विच्छेद को भी पंजीयन कराना चाहिए। जब विवाह का काम आसानी से पंजीयन हो सकता है तो उनका विच्छेद का क्यों नहीं हो सकता। </p>
<p>कहीं अगर पति नहीं छोड़ना चाहता और पत्नी छोड़ना चाहती है उसको एकतरफा संबंध विच्छेद करने की छूट होना चाहिए। कुछ लोग कहेंगे कि समाज में इसे अफरातफरी फ़ैल जायेगी। ऐसा कहने वाले आँखें बंद किये बैठे हैं समाज की हालत वैसे भी कौन कम खराब है। अमेरिका में तलाक देना आसान है पर क्या सभी तलाक ले लेते हैं। देश में तलाक की संख्या बढ रही हैं और दहेज़ विरोधी एक्ट में रोज मामले दर्ज हो रहे हैं। इसका यह कारान यह है कि संबंध विच्छेद होना आसान न होने से लोग अपना तनाव इधर का उधर निकालते हैं। वैसे भी मैं अपने देश में पारिवारिक संस्था को बहुत मजबूत मानता हूँ और अधिकतर औरतें अपना परिवार बचाने के लिए आखिर तक लड़ती है यह भी पता है पर कुछ अपवाद होतीं है जो संबध विच्छेद आसानी से न होने से-क्योंकि इससे लड़के वालों से कुछ नहीं मिल पाता और लड़के वाले भी इसलिए नहीं देते कि उसे किसी के सामने देंगे ताकि गवाह हों-तमाम तरह की नाटकबाजी करने को बाध्य होतीं हैं। कुछ लड़कियों दूसरों के प्रति आकर्षित हो जातीं हैं पर किसी को बताने से डरती हैं अगर विवाह विच्छेद के प्रक्रिया आसान हो उन्हें भी कोई परेशानी नहीं होगी। </p>
<p>कुल मिलकर विवाह नाम की संस्था में रहकर जो तनाव झेलते हैं उनके लिए विवाह विच्छेद की आसान प्रक्रिया बनानी चाहिऐ। हालांकि देश के कुछ धर्म भीरू लोग जो मेरे आलेख को पसंद करते है वह इससे असहमत होंगें पर जैसा मैं वाद और नारों से समाज नहीं चला करते और उनकी वास्तविकताओं को समझना चाहिऐ। अगर हम इस बात से भयभीत होते हैं तो इसका मतलब हमें अपने मजबूत समाज पर भरोसा नहीं है और उसे ताकत से नियंत्रित करना ज़रूरी है तो फिर मुझे कुछ कहना नहीं है-आखिर साथ साल से इस पर कौन नियंत्रित कर सका।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:काटने पर भी लकडी जहाज बनकर पार लगाती है]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=29</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 08:12:59 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[तरुवर जड़ से काटिया, जबै तम्हारो जहाज
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>तरुवर जड़ से काटिया, जबै तम्हारो जहाज<br />
तारे पर बोरे नहीं, बांह गाहे की लाज</p>
<p>संत कबीर दास जी कहते हैं कि लोग वृक्ष को जड़ से काट डालते हैं, परन्तु उस वृक्ष की लकडी का जब जहाज बन जाता है, तब भी वह काटने वाले को नदी-समुद्र से पार लगाता है शत्रु मानकर डुबाता नहीं है। सच है, बडे लोग बांह पकड़ने में लज्जा करते हैं। </p>
<p>आशय- संत कबीर दास जी कहते वृक्ष से बड़प्पन का गुण लेने की सलाह देते हैं। आदमी लकडी को बेरहमी से काट कर नाव बनाता है इसके बावजूद वह बदला लेने के लिए उसे सागर में नहीं डुबाती। इसी तरह सज्जन लोग किसी पर क्रोध प्रदर्शन न कर परहित के कार्य में लगे रहते हैं ।</p>
<p>कबीर विषधर बहु मिलै, मणिधर मिला न कोय<br />
विषधर को मणिधर मिलै, विष तजि अमृत होय</p>
<p>संत कबीर दास जी कहते हैं कि विषधर सर्प तो बहुत मिलते हैं पर मणि वाल सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाय तो विष मिटकर अमृत हो जाता है। </p>
<p>भावार्थ-कहते हैं कि जहाँ सांप ने काट लिया हो वहाँ मणि लगाने से विष निकल जाता है। वही मणि दूध में डाल कर पीया जाये उसका कोड भी दूर हो जाता है (हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है)। आशय यह है कि यहाँ बुर लोगों की संगत के कारण बुरी आदतें तो बहुत जल्दी आ जाती हैं पर अच्छे की संगत बहुत जल्दी नहीं मिल पाती है और अगर मिल जाये तो अपने आप ही अच्छे संस्कार विचार मन में आ जाते हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतक:स्त्री को अबला मानना विपरीत बुद्धि का प्रमाण ]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=28</link>
<pubDate>Sun, 01 Jun 2008 07:23:32 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो
ये नित्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो<br />
ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीनाम् ।<br />
याभिर्विलालतर तारकदृष्टिपातैः<br />
शक्रायिऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः</strong></p>
<p>इस श्लोक का आशय यह है कि जो कवि सुंदर स्त्री को अबला मानते हैं उनको तो विपरीत बुद्धि का माना जाना चाहिए। जिन स्त्रियों ने अपने तीक्ष्ण दृष्टि से देवताओं तक को परास्त कर दिया उनको अबला कैसे माना जा सकता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>अधिकतर कवि और रचयिता स्त्री को अबला मानते हैं पर भर्तुहरि महाराज ने उसके विपरीत उन्हें सबला माना है। सुंदर स्त्री से आशय समूची स्त्री जाति से ही माना जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री का सौंदर्य उसके हृदय में स्थित लज्जा और ममता भाव में है जो कमोवेश हर स्त्री में होती है। माता चाहे किसी भी रंग या नस्ल की हो बच्चे पर अपनी ममता लुटा देती है। बच्चा भी अपनी मां को बड़े प्रेम से निहारता है। पूरे विश्व में  अनेक कवि और लेखक नारी को अबला मानकर उस पर अपनी विषय सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में बहुत अज्ञानी होते हैं। उन्हें अपनी रचना के समय यह आभास नहीं होता कि हर स्त्री का किसी न किसी पुरुष-जिसमें पिता, भाई, पति और रिश्ते-से संबंध होता है। वह सबके साथ निभाते हुए उनसे संरक्षण पाती है। जो लोग स्त्री को अबला मानकर अपनी रचना लिखते हैं वह वास्तव में अपने आसपास स्थित नारियों से अपने संबंधों पर दृष्टिपात किये बिना ही केवल नाम पाने के लिये लिखते हैं और इसी कारण आजकल पूरे विश्व में नारी को लेकर असत्य साहित्य की भरमार है। अनेक कहानियां और कवितायें नारियों को अबला और शोषित मानकर कर लिखीं जातीं हैं और उनमें सच कम कल्पना अधिक होती है। ऐसे लोग विपरीत बुद्धि के महत्वांकाक्षी लेखक लोगों की बुद्धि तरस योग्य है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[अपना अपना ज्ञान-लघु कथा]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=26</link>
<pubDate>Sat, 31 May 2008 10:02:26 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था। </p>
<p>मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’</p>
<p>वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’</p>
<p>मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’</p>
<p>इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।</p>
<p>मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था। </p>
<p>वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’</p>
<p>मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहं से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’</p>
<p>मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पांच  वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’</p>
<p>तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’</p>
<p>उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहां से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’</p>
<p>वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।तुम्हें कैसे लगे?’<br />
मैंने कहा-^मैं क्या कह सकता हूँ. अगर तुम कहते हो तो ज्ञानी ही होंगें. बाकी मैं ऐसे सामान्य लोगों पर अपनी टिप्पणी नहीं करता.''<br />
मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’</p>
<p>वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’</p>
<p>मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देखा  और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।</p>
<p>  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःविद्यार्थियों को ‘अतिसेवा’ से दूर रहना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=24</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 06:53:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=24</guid>
<description><![CDATA[1.जिन व्यक्तियों के पास विद्या, दान, शील]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>1.जिन व्यक्तियों के पास विद्या, दान, शील तप के गुण नहीं हैं वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर बोझ है और वह पशु के समान ही जीवन व्यतीत करता है।<br />
2.विद्याध्यन कर रहे व्यक्ति के लिये आवश्यक है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम, क्रोध, लोभ, स्वाद,श्रृंगार, कौतुक, अतिनिद्रा और अतिसेवा से का त्याग कर दे।<br />
3.धन संपत्ति अपनी होकर भी अगर वह दूसरे के पास पड़ी रहे और ऐन वक्त काम न आये तो ऐसे धनवान होने का क्या लाभ? उसी प्रकार पुस्तक में लिखी विद्या भी किस काम की जब तक पढ़कर उसका सदुपयोग न किया जाये।<br />
4.जिस प्रकार पानी की बूंद से घड़ा भर जाता है उसी प्रकार नियमित रूप से अभ्यास करने से विद्या की प्राप्ति भी हो जाती है।</p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-शिक्षा के दौरान छात्रों को जीवन का आनंद उठाने के लिये आजकल अनेक अवसर प्रदान किये जाते हैं। कहीं पिकनिक तो कहीं पिक्चर दिखाने के लिए विद्यालयों की तरफ से कार्यक्रम बनाये जाते हैं। कठ विद्यालयों के विज्ञापन में छात्रों के शिक्षा और खेलकूद के अलावा अन्य सुविधाओं की जानकारी भी दी जाती है। अनेक बार ऐसे समाचार भी आते हैं कि अपने विद्यालय के साथी छात्रों और शिक्षकों के साथ बाहर घूमने गये छात्र-छात्राऐं हादसे के शिकार हो जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि घूमने-फिरने और युवावस्था के आनंद उठाने के लिये भी वही आयु है जो छात्र जीवन की है। यह विचार गलत है। देखा जाये तो जीवन में आनंद के अवसर तो नितांत आते हैं नहीं तो छात्रों के साथ शिक्षक क्यों ऐसे कार्यक्रमों में जाते हैं? क्या वह आनंद नहीं उठाते। आज के बाजार युग में तो अनेक विज्ञापन ही छात्र-छात्राओं को उपभोक्ता मानकर फिल्माये जाते हैं जिसमें यह बताया जाता है कि किस तरह वह वस्तुओं उपभोग कर एश कर सकते हैं। इससे लोगों में यह भ्रम हो जाता है कि यह उम्र मजे करने के लिऐ हैं। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[The diet of the poor oppressed? Comic satire]]></title>
<link>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=21</link>
<pubDate>Sat, 03 May 2008 16:33:00 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk2.wordpress.com/?p=21</guid>
<description><![CDATA[
U.S. president has said that  food crisis in the world for the people of India are responsible for ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[
<p>U.S. president has said that  food crisis in the world for the people of India are responsible for it more accounts. His statement, it is a matter left over here and that the U.S. is now living in the Indian point of view, doubt there will see. If the flood due to famine elsewhere in the U.S. food crisis ever came to him, the Indians will be on the simple target. Although there are also the people of Pakistan and Bangladesh are now and always will be an opportunity he escaped, he also came to the Indians on the run up to people everywhere that this crisis to eat more. </p>
<p><strong></p>
<blockquote><p>it orignal hindi comic satire translet by googl tool in inglish, so any mistek writer is not resoposible-Deepak Bharatdeep</p></blockquote>
<p></strong></p>
<p>It seems that democracy is restored after the United States on meharbaan is happening now in Pakistan and their camps in any way it wants to because it is now the world's trouble there is terrorism, not the Indians up by the food crisis due to over-eating is showing . It may be that the people of India and Pakistan come closer to the U.S. is not tolerated and indirectly from the people of Pakistan to the message being that the Indian people try to escape and account for more You will eat the grain. </p>
<p>America's position now is wobbly because the Iraq and Afghanistan proved to be a big headache. India, like the U.S. is expected to be completed were not here because of the internal situation is no less challenging. mr. bush's statement as a result of stress because they seem to have their presidential elections before it was also aware that India is not in what direction. His Foreign Minister Rice कोंडला and then she comes to India are moved. India's diversity and the characteristics of the doubt to address them. His statement only after his statement in support of the mr. bush come. </p>
<p>The statement of the mr. bush  We do not blame anyone involved must be viewed as a rich nation, the head. This mentality is that the rich of the poor they eat, drink and sleep like the rest is not - because they are  naseeb from the things they do when the money is coming. If not my thing, you know wellknown poet Rahim, who have been saying that the rich concoction of low power. Now it is known that the whole body of the sport depends on the strength of digestion of food. If he is not and will not sleep well because of the stress will continue. American Indian spiritual people, why are so many giggles? India's why there has been promoting yoga? For pleasure in the U.S. - facilities because of physical labor practice is becoming less. This condition is the hypocrisy and sanctimonious Baba there running his disciples by making their work is. This means that the Indians have been eating on his comments a similar result seems to stress that at this time in their minds.<br />
There were several times in this country view that the road to get on their trucks and tralee summer afternoon in the bottom of the workers are afraid to eat the rich to take a sleep in the AC, it does not naseeb. </p>
<p>The rich do not get to the point that he has the pleasure of property, prosperity and reputation is that they are faced with the suffering of the poor how to live without him? So how do the rest, while they sleep for it to take pills. We ask what George Bush his country's rich people think and what the different state now, such a statement came here to be very rich class and now here is the perception of poor eating on the convulsions. Which is good that it is now working hard to influence appetite seems to be the best man will eat and eat it too hard. Hunger and honestly feel good to income earned in each person's fate is not. </p>
<p>U.S. economic course were recommended by the country goes on is still working hard on the farmers of the country's economy alive. The industry seems to glow in the cities, is the only artificial, it is the truth, then one can see. Raj, the rich have the disease and its treatment is also money for the poor to have his body except for what it is and if she did not save where it will be. The industrial and technological development are talking about it non-technical workers and employees do not look for a place in the struggle and a man who can earn their bread if it has been run so long that not even the pain in his heart One has to be heard - it's his sweat drops out of the country. Such convulsions are also rich in many of the poor are poor because there are more account of the Bush Sahib also say if he has no need to be more troubling.</p>
]]></content:encoded>
</item>

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