दीपक भारतदीप wrote 1 day ago: कुछ दिन पहले तक शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि ‘सविता भाभी’ नाम की कोई वेबसाइट होगी जिस पर ‘लोकप्रि … more →
दीपक भारतदीप wrote 4 days ago: द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा। गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।। हिंदी में भावार्थ-न … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: मनु महाराज कहते हैं कि —————– अधितिष्ठेन केशांस्तु न भस्मास्थिक … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: कुर्सी पर चाहे लिपिक लिखा हो या महाप्रबंधक बस वह मिलना चाहिए। अपने घर में जिस पर स्वयं बैठ सकें वह ल … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: कहीं न्यूजीलैंड में इस बात को लेकर लोग नाराज है कि ‘हनुमान जी पर कंप्यूटर गेम बना दिया गया है और बच् … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: अब यह भला क्या बात हुई कि बंदर तथा चिंपौजी में भी नैतिकता होती है। कुछ पश्चिमी विशेषज्ञों ने अपने प् … more →
दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: हम कपड़े क्यों पहनते हैं? इसके चार जवाब हो सकते हैं 1.सभी कपड़े पहनकर घूमते हैं। 2.हम बिना कपड़े पहन … more →
दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: चेहरे हैं उनके सजे हुए अपने घर पर उन्होंने पत्थर और प्लास्टिक के फूल सजाये हैं अपनी जुबान से बात करत … more →
दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: हमारे देश के लोगों का सबसे बड़ा दोष है-परनिंदा करना। बहुत कम लोग हैं जो इसके कीटाणुओं से मुक्त रह पा … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: अंतर्जाल वाकई एक बहुत बड़ा मायाजाल है। हिंदी के समस्त ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर आपस मे … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: लुट जाने का खतरा अब गैरो से नहीं सताता अपनों को ही यह काम अच्छी तरह अब करना आता पहरेदारी अपने घर की … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल ति … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मन का समंदर है गहरा जहां ख्याल तैरते हैं जलचर की तरह कुछ मछलियां सुंदर लगती हैं कुछ लगते हैं खौफनाक … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: वर्षा ऋतु का की पहली फुहार प्रेमी को मिली मोबाइल पर प्रेमिका की पुकार ‘चले आओ, घर पर अकेली हूं चंद ल … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: लिखे उन्होंने चंद शब्द और दूसरों को लिखना सिखाने लगे मुश्किल है कि बिना समझे लिखा था पर दूसरों में … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मन में प्यास थी प्यार की एक बूंद भी मिल जाती तो अमृत पीने जैसा आनंद आता पर लोग खुद ही तरसे हैं तो हम … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: किसी को खुश देखकर ही जब मजा आता हो तब कही तारीफें झूठ में भी लोग कर जाते हैं सच से फरेब करने में नह … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आदमी से ही डरा आदमी अपने लिये एक झुंड बना लेता है जिसे समाज कहते हैं अकेले होने की सोच से घबड़ाया आद … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: कुछ नहीं कह सकते तो कविता ही कह दो कुछ नहीं लिख सकते तो कविता ही लिख दो कुछ पढ़ नहीं सकते तो कविता ह … more →