दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: भीड़ में अपनी पहचान ढूंढते हुए क्यों अपना वक्त बर्बाद करते हो. भीड़ जुटाने वाले सौदागरों के लिए हर श … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: हिंदी की सेवा करने का दावा करने वाले बहुत हैं। इनके नाम भी आपने देखे होंगे। यह लोग हिंदी के नाम पर क … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि ————————- सत्यत्वे न शशा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: मनु महाराज कहते हैं कि —————— यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्र … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: अजीब लगता है धर्म विषयक उन बहसों से एक आम व्यक्ति के रूप में जुड़कर जो समय समय पर प्रचारतंत्र में सुन … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि संत शिरोमणि कबीर … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः। छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।। हिंदी में भाव … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था। उसने बताया कि राजस्थान क … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: जहां तक नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव का प्रश्न है तो यह एक विश्वव्यापी समस्या है। इसे … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा। गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।। हिंदी में भावार्थ-न … more →
दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: यह एलेक्सा की चूक भी हो सकती है और सच भी कि इस लेखक के ‘अनंत शब्दयोग’ ब्लाग को विश्व में … more →
दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: प्रीति कर सुख लेने को सुख गया हिराय जैसे पाइ छछुंदरी, पकडि सींप पछिताय संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्। खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।। हिंदी मे … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: मनु महाराज कहते है कि ————— न हायनैर्न पालितैर्न वित्तेन न बंधुभिः । ऋ … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात अपने जिय से जानिये, मेरे जिय की बात संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: अहौ वा हारे बलवति रिपौ वा सुहृदि वा मणौ वा लोष्ठे वा कुसुमशयने वा दृषदि वा। तृणे वा स्त्रैणे वा मम स … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः। स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।। नीति विशारद चाणक्य कहते ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक कविवर रहीम कहते हैं कि समय ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: नीति विशारद चाणक्य कहते हैं आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः। स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः … more →