अजीब लगता है धर्म विषयक उन बहसों से एक आम व्यक्ति के रूप में जुड़कर जो समय समय पर प्रचारतंत्र में सुनने और देखने को मिलती है। इन बहसों के निष्कर्ष हमेशा ही शून्य रहते हैं। धर्म का आधार ज्ञान होता है और… more →
दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 2 months ago: अजीब लगता है धर्म विषयक उन बहसों से एक आम व्यक्ति के रूप में जुड़कर जो समय समय पर प्रचारतंत्र में सुन … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः धर्म रहित प्राणी जीवित … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस्तथा पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः विवाह के समय अपने कल् … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: पर्वत तो बहुत हो सकते हैं किन्तु यह आवश्यक होना कदापि नहीं हो सकता कि प्रत्येक पर्वत पर माणिक्य उपलब … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक बार किसी महिला ने अपने पति को रोटी के स्वादिष्ट न होने का कारण बताते हुए कहा-”इस रोटी में अ … more →