दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने दर्द को लेकर सब हैं परेशान जिसके सामने बयान करें वही अपनी हालातों से है हैरान अपनी कहानी सबको स … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मन के समंदर में उठती लहरें कई नाम है जो नाव की तरह लहराते निकल जाते हैं जिसका किनारा आ गया वह साथ छो … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने जिस्म पर इतराते हैं लोग जिसमें रहते हैं बहुत सारे रोग जीवन की नाव वक्त की लहरों में बहती जाती ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आज आजश्री जयप्रकाश मानस का एक आलेख पढ़कर यह विचार मेरे हृदय में आया कि आजकल हमारे समाज में परिश्रम म … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आया फंदेबाज और बोला ‘दीपक बापू मैं हीरो का ब्लाग पढ़कर आया हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती पर उसका अं … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: कमेंट लिखने वाले ने पूछा ‘‘ मेरी प्रेमिका और मेरा गौत्र आधा मिलता है आधा नहीं परिवार वाले शादी के ल … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मेरे शब्दों को ही अपना तुम दोस्त समझ लेना मेरी कविताओं में ही ढूंढ सको अपने लिये हमदर्दी तो ठीक रहेग … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: इधर जाऊं तो लोगों के चीखने चिल्लाने की आवाजों का शोर लोग बिना मुद्दे के हो गए बोर इसलिए सजाये बैठे ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: घर आकर बोला फंदेबाज बोला ”बापू, अपना पुराना बैट मुझे दो मंडी मैदान में जाकर अपना भी कोई जुगाड़ … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: चिल्ला-चिल्लाकर करते हैं प्रेम मजे के लिए चाहिए जैसे गेम आखों में बसाए रहते हैं पाश्चात्य सभ्यता वाल … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: जगह-जगह नारे लगेंगे आज प्यार के नारे बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे प्यार का दिवस वही मनाते जो प्य … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने लिए नहीं मांगते सिंहासन दो पल की रोटी की खातिर मजदूर इधर से उधर जाते अपने पसीने की धारा में अपन … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मेरा लिखा शब्द तेरे लिखे शब्द से भारी मैंने जो पढा व्याकरण तेरी भाषा भी उसमें सिमट जायेगी सारी मेरी … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आओ बसंत तुम हो चिर जीवंत शीत से ठिठुरते तन और मन को सहज ऋतू से नहलाओ आनंद का नहीं होता अंत कोई सानी … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मनोरंजन के लिए किसी दृश्य, वस्तु या आदमी की चाहत इन्सान को मजबूर करती है इधर-उधर जाने के लिए बाजार म … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: गाँव बढ़ते हुए शहर हो जाते हादसे उनका एक हिस्सा बन जाते गाँव से ऊबे लोग चलें शहर की ओर हरियाली और शा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: गुस्से में लिखे और बोले शब्दों को जो देखा अंजाम जिनके मुहँ से निकले थे जिनके हाथ से लिखे थे याद नहीं … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: लोगों का समूह एकत्रिक कर उसमें फूँकने के लिए जजबात उनका सन्देश है ”तू उधर से इधर आया है तो इधर … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: उनकी गली से निकलते हुए यूं भी हमें डर लगता है कि कहीं हमें देखकर उन्हें वह वादे याद न आयें जो कर वह … more →