जिंदगी की इस धारा में किस किसकी नाव पार लगाओगे। समंदर से गहरी है इसकी धारा लहरे इतनी ऊंची कि आकाश का भी तोड़ दे तारा अपनी सोच को इस किनारे से उस किनारे तक ले जाते हुए स्वयं ही ख्यालों में डूब जाओगे। दू… more →
दीपक भारतदीप की ई-पत्रिकाNidhi KM wrote 3 days ago: एक कमरा सपनो भरा, फर्श मखमली, छत सितारों भरीं, दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं, सपने कहीं … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 week ago: किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी ह … more →
Nidhi KM wrote 2 weeks ago: कदमों से कदमों को, मिलाने की बहुत कोशिश की, कभी मैं आगे बढ़ गयी, कभी तुम पीछे रह गये, बातों को बातों … more →
Nidhi KM wrote 3 weeks ago: सड़क के गढ्ढों मे, डोलता हुआ, आटो चला जा रहा था, एक स्टॉप मे, नवयुवती के चढ़ते ही, सारी नज़रे उस पर … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना दौलत के पहाड़ पर इंसानों की चाहतों का चढ़ना तरक्की का यह पैमाना नहीं … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: जिंदगी की इस धारा में किस किसकी नाव पार लगाओगे। समंदर से गहरी है इसकी धारा लहरे इतनी ऊंची कि आकाश का … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: बरसात में सड़क पर चलते हुए जब पानी से भरे छोटे छोटे समंदर और कीचड़ के पहाड़ों से गिरता टकराता हूं। तब य … more →
अफ़लातून wrote 2 months ago: आ मैं तुझे खुद में शामिल करता हूँ मेरी रातों में कही जा तू कविता फैलता हुआ तुझे थामने स्थिर होता लील … more →
Nidhi KM wrote 2 months ago: 1) पहले :- बिन दस्तक, बिन आहट के, तुम मेरे दिल तक आए, कुछ यूँ समाए की, दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटे … more →
Nidhi KM wrote 3 months ago: तुमसे ज़्यादा और ज़्यादा पाने की और तुम्हे देने ख़्वाहिश है तुम्हारी बाहों मे जीने और मरने की ख़्वाह … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: शोला कहो या शबनम मोहब्बत के जज्बातों के इजहार में हर लफ्ज़ है कम। मगर जिदंगी में सफर में खूबसूरत हमसफ … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: हर पल लोगों के सामने अपना कद बढाने की कोशिश हर बार समाज में सम्मान पाने की कोशिश आदमी को बांधे रहती … more →
Nidhi KM wrote 1 month ago: तुम बहुत मीठा बोलते हो, हर शब्द को, चाशनी मे घोलते हो, मिशरी की तरह, रस घोलते हो, न कड़वा बोलते हो, … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: पोते ने कहा दादा से ‘पापा ने उस कार्यक्रम में साथ ले जाने से मना कर दिया जिसमें हर वर्ष हिंदी दिवस प … more →
Nidhi KM wrote 3 months ago: मैने कयी बार, कभी अपनों के, कभी तुम्हारे कहने पर, नयी सुबह का इंतज़ार किया, नयी माला मे फूल गुथे, नय … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: स्वाईन फ्लू की बीमारी ने आते ही देश में प्रसिद्धि आई। इतने इंतजार के बाद, आखिर शिकार ढूंढते विदेश से … more →
Nidhi KM wrote 3 months ago: चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम, सरकी वही ज़मी नये कदम उठाने के पहले, आसमान से तो पानी बरसता … more →
Nidhi KM wrote 3 months ago: हम तेरे इंतज़ार के आदि है, ये जानकार तुम, ना जाने कब तक इंतज़ार कारवाओगे? इस इंतज़ार मे ही जीना है, … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: कभी शब्द नहीं बनता अकेला शब्द कभी भाषा नहीं बनता। कई मिलकर बनाते हैं एक भाव समूह जिससे उनका निज परिच … more →