Blogs about: Hindi Kavita

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समाज और खानदान की छबि -दो व्यंग्य क्षणिकायें

दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: जिन कहानियों में हर पल क्लेशी पात्र सजाये जाते उसी पर बने नाटक सामाजिक श्रेणी के कहलाते सच है समाज … more →

Tags: अभिव्यक्ति, क्षणिका, दीपक भारतदीप, दीपकबापू, मस्तराम, व्यंग्य, व्यंग्य कविता, हास्य व्यंग्य, हिन्दी

चेहरे कब तक बनावटी सामान से सजाओगे-हिन्दी शायरी

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: शोला कहो या शबनम मोहब्बत के जज्बातों के इजहार में हर लफ्ज़ है कम। मगर जिदंगी में सफर में खूबसूरत हमसफ … more →

Tags: hasya -vyangya, Kavita, Shayri, writer, Hindi writing, vyangya kavita, India, Deepak bharatdeep, दीपक भारतदीप

झूठ भी सच की तरह सजाते-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: हर पल लोगों के सामने अपना कद बढाने की कोशिश हर बार समाज में सम्मान पाने की कोशिश आदमी को बांधे रहती … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, चिन्तन, दीपक भारतदीप, व्यंग्य, शायरी, शेर, हिंदी पत्रिका, हिन्दी

कागज़ पर कलम से जूते न सजाओ-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: अपनी कलम से कागज पर काली स्याही से जूता शब्द बार बार इस तरह न सजाओ कि आकाश से झुंड के झुंड बरसने लग … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, इंटरनेट, चिंतन, दीपक भारतदीप, मस्त राम, रचना, हास्य, हिन्दी

यह जिंदगी शब्दों का खेल है-हिंदी शायरी1 comment

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: महलों में रहने वाले भी ज्यादा पेट नहीं भर पाते-हिन्दी शायरी आकाश से टपकेगी उम्मीद ताकते हुए क्यों अप … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, मस्तराम, हिन्दी, हिन्दी पत्रिका, हिन्दी शेर, Blogging, Deepak bharatdeep, Friends

अंधेरे से रौशनी पैदा नहीं हो सकती-व्यंग्य कविता1 comment

दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: धरती की रौशनी बचाने के लिये उन्होंने अपने घर और शहर में अंधेरा कर लिया फिर उजाले में कहीं वह लोग खो … more →

Tags: inglish, हिन्दी, अभिव्यक्ति, व्यंग्य, व्यंग्य कविता, Internet, Bloging, Urdu, Education

इन्सान अब बुत बनने लगे हैं - हास्य व्यंग्य कविताएँ

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: असली इंसानों के चेहरे अब बुत की तरह नजर आते। लिखता कोई और संवाद, वह बोलते हुए दिख जाते।। बहुत पढ़ लि … more →

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थप्पड़ मारकर सलाम तो किया-तीन क्षणिकायें

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: कुत्ता कहा तो क्या इनाम तो दिया आखिर गोरों ने दिया गुलाम की तरह व्यवहार किया तो क्या थप्पड़ मारकर सल … more →

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बेरंग हो गया मन, कैसे खेलते होली-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: पृथ्वी के भ्रुण में पानी की जगह हो गयी पोली । पिचकारी में रंग नहीं भरता, कैसे मनायें प्रियतम होली।। … more →

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आदमी ख़ुद ही खिलौना बन जाता -हिंदी व्यंग्य शायरी

दीपक भारतदीप wrote 3 months ago: जब तक लगे न कहीं आग उनको चैन नहीं आता बुझाने के ठेकेदारों को ज्यादा देर इंतजार नहीं करना होता आदमी अ … more →

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तुम्हारी राहें...5 comments

Rohit Shrivastava wrote 4 months ago: मैंने रोशनी बाँटी है अंधेरों को, तुम्हारी राहें जगमगाने के लिये! मैं खिला बैठा हूँ राह के हर पत्थर प … more →

Tags: ह्रदय-वाणी

रात के टीले पर चढ़कर11 comments

mehhekk wrote 4 months ago: रात के टीले पर  चढ़कर चाँदनी की रेत पर चलकर आसमानी सागर पार करने के बाद रौशनाई  नज़र आएगी चंदेरी पा … more →

Tags: Uncategorized

तो स्वीकार मुझको नमन है तुम्हारा!!1 comment

Rohit Shrivastava wrote 5 months ago: चारों तरफ़ घोर विपदा प्रलय हो, भले ज्वार – भाटे सा निष्ठुर समय हो! हे भागीरथी! तुच्छ सागर में ल … more →

Tags: ह्रदय-वाणी

एक एहसान...1 comment

Rohit Shrivastava wrote 5 months ago: बस इतना सा एक आपका एहसान है लेना, इस सफ़र में ऐ हमसफ़र तू छोड़ ना देना! यूँ तो मुसाफ़िरों की भीड़ आती-जात … more →

Tags: ह्रदय-वाणी

सभी पियक्कड़ हो जाते, जो पहुंचे मधुशाला-व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: हिंदी भाषा के महान कवि हरिबंशराय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी। अनेक लोगों ने उसे नहीं पढ़ा। कई लोग ऐसे ह … more →

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कल मैंने एक सर्कस देखा...10 comments

Rohit Shrivastava wrote 5 months ago: नहीं समझ आया है आज भी, कोमल था या कर्कश देखा! कल मैंने एक सर्कस देखा !! जिस आयु में हमें दुलारा मात- … more →

Tags: ह्रदय-वाणी

एक मुक्तक

Rohit Shrivastava wrote 5 months ago: प्रेम के हर भाव को सराहता हूँ मैं, प्रेम के अभाव में कराहता हूँ मैं! एक याद भर से उसकी, छलक जाते हैं … more →

Tags: ह्रदय-वाणी

पूज्य पिताजी के जन्मदिवस पर...

Rohit Shrivastava wrote 5 months ago: इस पावन अवसर पर मैं कुछ मांग रहा हूँ आपसे, अपनी अनुकम्पा वृष्टि कर शुभ आषीश सदा देना! हो जाऊँ जब मैं … more →

Tags: ह्रदय-वाणी

इस दुनियां में होते हैं नाटक अपार-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: क्यों अपना दिल जलाते हो अपना यार इस दुनियां में होते हैं नाटक अपार कभी कहीं कत्ल होगा कहीं कातिल का … more →

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