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शुक्रे-खुदा कहे "मीत"

जो देखे वो कहे तुझको कि सूरत हो तो ऐसी हो,
नज़र में फिर न आये और, मूरत हो तो ऐसी हो।

गए कूंचे में तेरे जब, अचानक मिल गए थे तुम,
हुए हैरां लगे कहने वाह! हिम्मत हो तो ऐसी हो।

देके दस्तक तेरे दर पे बा-उम्मीद करें इन्तजार,
न बोलें ना सूनें कुछ, बस हालत हो तो ऐसी हो।

बिछा दें बस उसी जानिब अपनी खुदी को हम,
हो दौलते-दीदार मयस्सर, ग़ुरबत हो तो ऐसी हो।

मुहब्बत की नज़र से देखकर तुम भी कहो हमको,
खुदया रहम कर, उनकी इनायत हो तो ऐसी हो।

कहे आशिक तेरा हमको जमाना, फक्र करें हम,
करे शुक्रे-खुदा कहे “मीत”किस्मत हो तो ऐसी हो।

"कोरी प्यास"

कोरी प्यास को तश्नलबी मत कहिये ।
हमारे हालात को ज़िन्दगी मत कहिये ।
समन्दर के किनारे डूब जाये सफ़ीना ।
इसको मौजों से आशिकी मत कहिये ।
जो दर्द कह न सकें हाले बयाँ न करें ।
उनको क़लम की रफ़्तनी मत कहिये ।
मत रखिये ऐसों पर कोई गुमां अंजुम ।
वक्त पर साथ न दे दोस्ती मत कहिये ।
गजानन्द सुथार’मीत”