श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। हिंदी में भावार्थ-श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श… more →
दीपक भारतदीप की ई-पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 10 hours ago: श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। हिंदी में भाव … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 days ago: अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आ … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 days ago: द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा। गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।। हिंदी में भावार्थ-न … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार पार करने वाला ईपत्रिका इस लेखक का तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इसने हाल ही … more →
दीपक भारतदीप wrote 3 weeks ago: क्वीसलैंड यूनिवर्सटी आफ टैक्लनालाजी के प्रोफेसर कि अनुसार इस मंदी के दौर में लोगों के दाम्पत्य जीवन … more →
दीपक भारतदीप wrote 4 months ago: स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो … more →
दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: कंपनियों का सच यही है कि वह आम निवेशक और उपभोक्ता और अपने कर्मचारी का शोषण करने के लिये बनायी जाती ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: उसकी मां आई.सी.यू में भर्ती थी। वह और उसका चाचा बाहर टहल रहे थे। उसने चाचा से पूछा-‘चाचाजी, आपको क्य … more →
दीपक भारतदीप wrote 5 months ago: धर्म यानि क्या? आप भारतीय पौराणिक ग्रंथों को अगर पढ़ते हैं तो उसका सीधा आशय आचरण से है पर उनमें किसी … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: हम अक्सर अपने संस्कार और संस्कृति के संपन्न होने की बात करते हैं। कई बार आधुनिकता से अपने संस्कार औ … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: शैतान कभी इस जहां में मर ही नहीं सकता। वजह! उसके मरने से फरिश्तों की कदर कम हो जायेगी। इसलिये जिसे … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: अपने शहर पर इतना नहीं इतराओ कि फिर पराये लगने लगें लोग सभी कभी यह गांव जितना छोटा था तब न तुम थे यहा … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: एक तलाश पूरी होते ही आदमी दूसरी में जुट जाता अंतहीन सिलसिला है अपने मकसद रोज नये बनाता पूरे होते ही … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: डाइन भी सात घर छोड़कर कहर बरपाती अपने पडौस से निभाओ यह तो वह भी सिखाती उसकी राह पर चलने वाले असली … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: अब फ़िर क्रिकट प्रतियोगिता शुरू होने की तैयारी हो रही है। अखबारों और टीवी पर उसका धूंआधार प्रचार हो … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: नकली घी,खोवा और दूध से हो रहा है बाज़ार गर्म दीपावली का जश्न मनाने से पहले अमृत के नाम पर विष पी जा … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: अतीत के गुजरे पल ही दिमाग को इस तरह सताते कि भविष्य के सपने सामने चले आते साथ चलता तो है बस आज का सच … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: वैसे तो अपने देख के लोगों की यह पूरानी आदत है कि वह हर तरफ अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं और अ … more →
दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: अक्लमंदों की महफिल से इसलिये ही जल्दी बाहर निकल आये सभी के पास था अपनी शिकायतों का पुलिंदा किसी के … more →