कमरों में बंद दौलत लूटकर लुटेरे जा सके यहां से कितनी दूर। उसकी चकाचैंध में रौशनी खो बैठे उनके नूर। अल्मारी में बंद किताबों को जलाकर कर रख कर दिया तलवारों से बहाकर खून की नदियां राहगीरों को दर-ब-दर कर … more →
**दीपक भारतदीप की हिंदी साहित्य-पत्रिका** ***Deepak Bharatdeep ki Hindi Patrika***दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: हमने देखा था उगता सूरज उन्होने देखा डूबता हुआ वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में जश्न मनाने की तैयारी … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: एक पुराने कवि ने अपनी पहली कविता लिखने के दिवस को साहित्यक पदार्पण दिवस के रूप में मनाया। ढेर सारे ह … more →
दीपक भारतदीप wrote 6 months ago: कमरों में बंद दौलत लूटकर लुटेरे जा सके यहां से कितनी दूर। उसकी चकाचैंध में रौशनी खो बैठे उनके नूर। अ … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: उसने कहा कवि से ‘तू क्यों कविता लिखता है सारे जमाने का दर्द समेट कर अपने शब्दों में अपनी ही पीड़ाओं … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: बना लिया है पूरी दुनिया को उन्होंने अपना एक बड़ा बाजार चला रहे सभी जगह अपना व्यापार पर टुकड़ों में ब … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक नया कवि मंच पर कविता सुनाने के लिये बुलाया गया तो उसने आते ही कहा‘,आज मैं अपनी एक कविता सुनाने जा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: बम के धमाके से कांप गये शहर इमारते कांपने लगी वाहन उड़ गये हवा में बिछ गयी लाशें सड़कों पर पसर गया च … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: उस दिन ब्लागर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था तभी उसे बाहर से आवाज सुनाई दी जो निश्चित रूप से दूसरे ब् … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: जब जज्बातों में आता ठहराव तब शब्द खामोश हो जाते स्तब्ध मन सन्नाटे में ताकता है उस समय न सोचना अच्छा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने दिल में ही बने रहें राज बस वही राज रहते हैं दूसरे के सिर पर सजे किसे अच्छे लगते हैं खुद पहनकर स … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: इंसानों की भीड़ में कभी दर्द. कभी प्रेम और हास्य से सुसज्जित शब्दों से रचनाएं बरसाने वाले कवि अकेले … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: पढ़ते हैं कोई भाषा की बड़ी किताब लगाते फिर अपने पढे पाठों का हिसाब साहित्य के शब्दों से परहेज गणित मे … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: इधर जाएँ कि उधर यह कभी तय नहीं कर पाए जिस माया को पाने की चाहत है उसके आदि और अंत को समझ नहीं पाए चा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: क्रिकेट क्या अब फिल्म की तरह चलेगी कभी खिलाड़ी होंगे प्रेम में सराबोर कभी उनके बीच जंग छिडेगी लगता है … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: सब जगह विकास के नारे लग रहे हैं कहीं विनाश के बदल घुमड़ रहे हैं आंखों के सामने हैं सब दृश्य पर सच क् … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: ब्लोगश्री के सम्मान के लिए मांगे थे उन्होने आवेदन आध्यात्म और साहित्य वर्ग के ब्लोगर संपर्क न करें क … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक झूठ सौ बार बोला जाये तो वह सच हो जाता है और एक सच सौ बार दुहराया जाये तो मजाक हो जाता है सच होता … more →