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मंदी का दौर:नया उपभोक्ता वर्ग कहां से आयेगा-आलेख

दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: अमेरिका के उद्योगपति बिल गेट्स ने कहा है कि वर्तमान मंदी अगले चार साल तक चल सकती है। बिल गेट्स विश्व … more →

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मानव सभ्यता पर वाद-विवाद-आलेख

दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: आज एक समाचार में एक इतिहासकार द्वारा इतिहास में अयथार्थ से भरे तथ्यों को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से हटा … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, चिंतन, दीपक भारतदीप, मस्तराम, शब्द, संपादकीय, सन्देश

सुविधाओं के गुलाम-व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। परंतत्र देश स्वतंत्र हुआ … more →

Tags: हिन्दी, आलेख, अभिव्यक्ति, jagran, alekh, Internet, Friends, India, अनुभूति

कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक सपना लेकर सभी लोग आते हैं सामने दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन कहते हैं ‘तुम उस पर … more →

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श्रमिक पुत्र कभी अभिनेता नहीं बनता-हास्य कविता-व्यंग्य कविता

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आज मजदूर दिवस है आओ सब मिलकर नारे लगायें जो गरीबों और मजदूरों को भायें जन कल्याण और न्याय के लिये जो … more →

Tags: हिन्दी, चिंतन, hindi, jagran, abhivyakti, Internet, Kavita, Friends, Anubhuti

भृतहरि शतकःसज्जन की मित्रता पूर्वाद्ध की छाया के समान

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन् मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर इसका आशय यह है कि कोई दु … more →

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संगीत का लेते नाम, मचाते कोहराम-हास्य कविता1 comment

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: गीत और संगीत से दिल मिल जाते हैं पर अब तो उसकी परख के लिये प्रतियोगितायें को अब वह महायुद्ध कहकर जमक … more →

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संत कबीर वाणी:विषयी लोग दीप और संत हीरे समान होते हैं

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग बड़ी लहर जो विषय की, जरत न मोरे अंग संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत … more →

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भृतहरि शतकःसंतोष से अमीर-गरीब समान हो जाते हैं

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः। स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला म … more →

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रहीम के दोहे:शरीर रुपी बाजार में मन बिक गया

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नांव कविवर रहीम कहते हैं की शरी … more →

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रहीम के दोहे:अपने मन की वेदना सबके सामने मत प्रगट करो

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट करेइ जाहिं निकारो गेह तें, कस न भेद कहिं देइ कविवर रहीम कहते हैं … more →

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संत कबीर वाणी:प्रपंची गुरूओं से कोई लाभ नहीं

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं … more →

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चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: 1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां … more →

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समाज के साथ होने का भ्रम पालना व्यर्थ-चिंतन

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत मुझे कभी नहीं सुहाता। मुझे उकताहट होती है जब कोई आदमी अपनी जात … more →

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अपना ज्ञान बघारते हुए-हिन्दी कहानी

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे … more →

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कठपुतली का खेल तो अब भी चल रहा है (हास्य-व्यंग्य)1 comment

दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़क पर आये तो  एक सज्जन मिल गये और  हमसे बोले-‘कहां जा रहे हो।’ … more →

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