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	<title>indra-devta &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/indra-devta/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "indra-devta"</description>
	<pubDate>Mon, 07 Jul 2008 13:15:50 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के   काम आये ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=133</link>
<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 03:39:15 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला<br />
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते</strong></p>
<p>उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।</p>
<p>लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[मनुस्मृतिःसदाचारी को अतिथि सत्कार में भेदभाव नहीं करना चाहिए]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/?p=128</link>
<pubDate>Sun, 20 Apr 2008 07:15:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधि]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color:#003366;">शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना<br />
संविभागश्च भूतेभ्यःकर्तव्योऽनुपरोधतः</span></strong></p>
<p><span style="color:#003366;">सदाचार गृहस्थ को अपनी सामथ्र्यानुसार ब्रह्मचारी और सन्यासी को भिक्षा देनी चाहिए तथा बिना किसी भेदभाव से अतिथि बनकर आये सभी जीवों को उनके भाग का भोजन और पानी देना चाहिए। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान्<br />
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्</strong><br />
जो व्यक्ति पाखंडी, दुष्ट कर्म करने वाला दूसरो को मूर्ख बनाकर पैसे एंठने वाला वेदों में श्रद्धा रहित पर ऊपर से सहृदय दिखने वाला है उसको गृहस्थ कभी भी अपना अतिथि नहीं बनाये। </span></p>
<p><span style="color:#003366;"><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong> हमारे अध्यात्मिक दर्शन में दान और अतिथि सत्कार की बड़ी महिमा है पर उसके लिये मनु ने कई बंधन रखे हैं। अक्सर लोग मनु स्मृति पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाते है पर वास्तविकता यह है कि तत्कालीन समय में बने हुए समाजों के दृष्टिगत ही उनका उल्लेख उन्होंने किया है और अगर थोड़ा गौर से देखें तो स्पष्टतः भेदभाव को अधिक प्रधानता नहीं दी बल्कि चरित्र को दी है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">वह स्पष्टतः कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को दें और आपके घर जो अतिथि आता है उसका बिना किसी भेदभाव के स्वागत करें। जिन लोगों का आतिथ्य सत्कार वर्जित किया है उनमें किसी भी जाति का आदमी हो सकता है और जिनके सत्कार की बात कही है उसमें भी कोई बंधन नही लगाया।<br />
एक सहृदय सज्जन ने मेरे से पूछा था कि आपको नहीं लगता कि दान के कुपात्र के नाम पर लोग  समाज में वैमनस्य फैलाते हैं तो मेरा उत्तर यह है कि इसमें मनु का क्या दोष? </span></p>
<p><span style="color:#003366;">आजकल दान के नाम पर कथित संत अपना घर भर रहे है तो इसमें मनु के संदेश नहीं बल्कि लोगो का अज्ञान जिम्मदार है। मैं तो कहता हूं कि लोगों को अपने दान के लिये सुपात्र ढूंढने की आवश्यकता ही नहीं है। </span></p>
<p><span style="color:#003366;">अरे हमारे आसपास अनेक गरीब मजदूरों के बच्चे रहते हैं, चुपचाप जाकर उनको कपड़े, किताबें दे आओ। बीमार पड़ने पर उनका इलाज कराओ।<br />
हमारे घरों और व्यापारिक संस्थानों में अनेक युवक-युवतियां काम करते हैं। उनकी ऐसे ही पगार बढ़ा दो। उनको बोनस दे दो। यह क्यों उनसे कहते हो कि हम दान दे रहे हैं। यह तो अपने मन में रखना चाहिए। हमने अनेक विचाराधाराओं के नाम पर वाद और नारे लगाकर समाज को भ्रमित किया है जो वैसे ही अपने ज्ञान से दूर रहता आया है। हमारे मनीषी इस समाज की वास्तविकताओं से परिचित थे इसीलिये लोगों को दान करने के लिये उकसाते थे। यह कहना गलत है कि वह किसी जाति विशेष को दान करने के लिये कहते थे। ब्राह्मणों को कर्मकांड करने के बाद दान-दक्षिणा देने का प्रावधान किया गया है पर यह तो उनके लिए एक तरह से मेहनताना हुआ।<br />
स्पष्टतः दान का आशय यही है कि आपके आसपास जो उसके पाने के  पात्र है उसे ही दिया जाना चाहिए और आतिथ्य सत्कार में भी कोई भेद नहंी करना चाहिए।<br />
</span></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%a8/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 12:46:25 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[                     महाभारत ग्रंथ की रचना ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">                     महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।</p>
<p align="justify">                 श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-' मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।'<br />
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-'आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।'</p>
<p align="justify">
              आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
</p>
<p align="justify">श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।</p>
<p align="justify">         महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है<br />
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।</p>
<p align="justify">
                गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
</p>
<p align="justify">                      भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप 'ॐ' है। प्रणवस्वरूप 'ॐ' में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: 'ॐ' गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये 'ॐ' को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले 'ॐ' का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रात:काल का आनंद ]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/16/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a8%e0%a4%82%e0%a4%a6/</link>
<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 10:39:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के लिए अपने सामान के साथ पक्षियों के लिए दाना भी ला जाता हूँ। मुंडेर पर उन दानों को बिखेरने और पानी भर कर रखने के बाद अपनी योग साधना में तल्लीन हो जाता हूँ। उस समय अँधेरा होता है और जैसे ही थोडी रोशनी होनी शुरू होती हैं सबसे पहले गिलहरी का आगमन होता है। मेरे पास से निकलती गिलहरी दाने की तरफ जाती है तो मेरी तरफ देखती जाती है, पता नहीं क्या सोचती है और जैसे-जैसे मेरी तल्लीनता बढती है वैसे वैसे ही चिड़ियाओं के झुंड की आवाजें मेरे कानों में गूंजती है।</p>
<p>वह मुंडेर मेरे से दस फूट की दूरी पर है और वैसे कहते है कि योग साधना में कहीं ध्यान भटकना नहीं चाहिए पर मेरा मानना है कि इन पक्षियों का मेरे सामाजिक जीवन से कोई सरोकार नही है और उनकी तरफ ध्यान लगाना लगभग वैसा ही है जैसे दुनियादारी से ध्यान हटाना। कई बार तो मैं वहाँ पांच-छः प्रकार के पक्षी देखता हूँ, जिसमें तोता और कबूतर भी शामिल हैं। उनको देखकर जो मुझे अनुभूति होती है उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। अगर मैं यह कहूं कि मेरा वह हर दिन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिऐ।</p>
<p>पता नहीं उनके मन में भी कुछ चलता है। जब मैं सर्वांगासन के लिए टांगें ऊपर किये होता हूँ तब चिड़ियायेँ बिल्कुल मेरी टांगों की पास से निकल जातीं हैं। उस समय मैं आंखें बंद किये होता हूँ तो डर जाता हूँ। मजे की बात यह है इतने सारे आसनों के बीच नही निकलतीं। उसके तत्काल बाद मैं शवासन करता हूँ , और उस समय भी वह ऐसा ही करतीं है । शवासन के समय कभी कभी गिलहरी भी छूकर भाग जाती है। मुझे उस समय हंसी आती है क्योंकि उनका इस तरह खेलना अच्छा लगता है। वैसे कई वर्ष से ऐसा हो रहा है पर मैं ध्यान नहीं देता था पर पांच-छः महिने पहले ऐक चिड़िया सर्वांगासन के समय मेरी टांग से टकराकर मेरे मुहँ पर गिरी और फिर भाग गयी। उसके बाद से मैंने उनकी गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। पहले तो दाना डालकर अपनी आँखें बंद कर योग साधना किया करता था। इन पक्षियों की चहचहाने की आवाज में जो माधुर्य है वह किसी संगीत में नहीं मिलता। और यह ऐक एसी फिल्म है जो कभी भी पुरानी होती नजर नहीं आती। ऐक एसा आनंद आता है जो अवर्णनीय है। शेष फिर कभी</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कवितायेँ और क्षनिकाएं]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/04/%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%81-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82/</link>
<pubDate>Tue, 04 Sep 2007 11:08:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
आदमी और कुत्ते पर कविता सुनाकर
वह लोग]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 class="post-title entry-title"><a href="http://deepakbapu.blogspot.com/2007/07/blog-post_11.html"></a></h3>
<p class="post-body entry-content">आदमी और कुत्ते पर कविता सुनाकर<br />
वह लोगों को हंसाते हैं<br />
अपने नाम के आगे<br />
हंसी के बादशाह की<br />
पदवी लगाते हैं<br />
मुझे नहीं आती हँसी<br />
हंसने के लिए हम चाहे<br />
जब हंस लेते हैं<br />
जो नही जानते हँसना<br />
वही उनकी महफ़िल सजाते हैं<br />
————————–<br />
क्रिकेट टीम जब से हारी है<br />
हमें चैन आ गया है<br />
अब कोई क्रिकेट की न चर्चा करता<br />
न कोइ स्कोर पूछता<br />
न कोई अपना ज्ञान बघारता<br />
न कोइ चैपल कथा सुनाता<br />
ऐसा लगता है जैसे<br />
चमन में अमन आ गया है<br />
-------------------------<br />
रात के अँधेरे से वही घबरातें हैं<br />
जिनके दिन पाप के साथ कट जाते हैं<br />
जो जीते हैं अपने विश्वासों के साथ<br />
उनके चेहरे अँधेरे में भी<br />
चमकते नज़र आते हैं<br />
—————————-<br />
उसने अपने घर के बाहर लगा<br />
एक वृक्ष काटा और बना ली दुकान<br />
अब तम्बाकू के पौच और सिगरेट<br />
बेचकर घर चलाता है<br />
वह और उसके ग्राहक<br />
धुआं उड़ाते और हुए<br />
पर्यावरण में प्रदूषण<br />
पर चिन्ता जताते हैं<br />
————</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चीन ने आख़िर अपनी जनसँख्या नीति बदली]]></title>
<link>http://rajdpk.wordpress.com/2007/09/04/%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af/</link>
<pubDate>Tue, 04 Sep 2007 11:03:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
चीन सरकार ने अपने जनसँख्या नीति में ब]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<h3 class="post-title entry-title"></h3>
<p class="post-body entry-content">चीन सरकार ने अपने जनसँख्या नीति में बदलाव करते हुए अब शहरी क्षेत्रो में लोगों के ले लिए बच्चों के जन्म की सीमा एक से बढ़ाकर दो करने का निर्णय लिया है-पहले शहरी क्षेत्रों में एक तथा ग्रामीण क्षेत्रों में दो बच्चे पैदा करने की छूट थी। चीन की तथाकथित विकसित तथा शक्तिशाली राष्ट्र की छबि से प्रभावित लोग उसकी जनसँख्या नीति के प्रशंसक रहे हैं, उनके लिए इसमें संदेश है पर वह शायद ही कोई इसे समझ पाए -क्योंकि तानाशाही के तले दबी वहाँ की जनता की आवाज विदेशों कें कभी नहीं पहुंची और वहां की सरकार ने जो प्रचार विश्व भर में कर रखा है उसके प्रतिवाद में कोई तथ्य बाहर निकलना मुश्किल है।</p>
<p>भारत में तो स्थिति और भी ज्यादा विचित्र है। चीन के समर्थक तो ठीक उसके विरोधी भी उसकी प्रगति का लोहा मानते हैं। हालंकि चीन के तथाकथित विकास और शक्तिशाली होने के दावे को कई विशेषज्ञ उंगली उठाते हैं पर उनके पास तथ्य कम अनुमान ज्यादा होते हैं। एक दिलचस्प बात यह है अपने विकास के दावे चीनी खुद कभी नहीं करते नजर आते जितने अन्य देश के लोग करते हैं। चीन में अभी भी जनसँख्या में कोई कमी नहीं आयी है उस पर सरकार के इस बदलाव से यह संकेत तो मिल गया है कि सरकार के समाज की जबरन जनसँख्या रोकने के कुछ ऐसे दुष्परिणाम जरूर हुए हैं जिसकी जानकारी बाहर के देशों को नहीं है।</p>
<p align="center"><strong>चीनी रिश्तों के नाम तक भूलने लगे थे<br />
-------------------------------------------</strong>
</p>
<p align="left">बहुत समय पहले मैं एक पत्रिका में पढा था कि चीन लोग तो अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं और वहां कई लडकिया ऎसी हैं जो भाई का मतलब भी नही जानती तो कई ऐसे लड़के भी हैं जो बहिन का मतलब भी नहीं जानते। ताऊ-ताई, चाचा-चाची,मामा-मामी, फूफा-फूफी और अन्य रिश्तों का नाम तक भूल चुके हैं। दुनिया भर के गरीबों और मजदूरों को अमीर बनाने के नाम पर वहाँ सांस्कृतिक क्रान्ति करने वाले लोगों ने वहाँ की परानी संस्कृति को नष्ट कर ही कर डाला। धर्म को अफीम बताते हुए उन्होने समूचे चीन में धन -संपति के अंबार लगाने का सामना दिखाकर वहाँ अपना राज्य कायम कर लिया-साथ ही बोलने और कहने की आजादी भी छीन ली।</p>
<p align="left">फिर शुरू हुआ चीन में एक ऐसा दौर कि वहाँ लिखने-पढने की आजादी मांगने वाले को सरेआम मार दिया गया या जेल में सड़ा दिया गया। एक अमेरिकी विशेषज्ञ का कहना है कि चीन एक बंद गुफा की तरह है वहां क्या है कोई नहीं कह सकता-क्योंकि क्षेत्रफल की दृष्टि से अति विशाल चीन में केवल कुछ ही भागों में विदेशियों को जाने के अनुमति है, और सरकार के व्यवस्था ऎसी है कि आप आम आदमी से मिल नहीं पायेंगे और मिलेंगे तो वह इतना सहमा रहता है कि वह अपनी सरकार की भाषा ही बोलता है। इतना ही नहीं बल्कि चीन से बाहर भी आये चीनी अपनी बात कहने से कतराते हैं-क्योंकि उनमें कहीं न कहीं अकेलेपन का बोध होता है जो शायद वहाँ की जनसँख्या नीति का परिणाम भी हो सकता है।</p>
<p align="left">चीन के आर्थिक विकास पर भी कई लोग उंगली उठाते हैं-उनका कहना है कि वहाँ के जो भी आंकडे हैं वह सरकारी है और उनकी प्रमाणिकता संदिग्ध है। सामजिक विशेषज्ञ भी उसके इस बाते को चुनौती देते हैं कि वहां कोई जातिवाद नहीं बचा है-कुछ का कहना है इस तानाशाही में कुछ खास समुदायों के लोगों को अपना वर्चस्व जमाने का अवसर मिल गया और वहां अब भी कहीं कहीं जातीय तनाव की स्थिति बन जाती है। एक बात पर सभी एकमत है कि एक बच्चे की जनसँख्या की नीति ने वहाँ के समाज को खोखला किया ! वजह साफ है कि व्यक्ति से परिवार, परिवार से रिश्तेदार और और रिश्तेदार से समाज के जो बनने का क्रम है उसमे रिश्तेदार की कडी कमजोर हो गयी थी और एशियाई देशों में सबसे सशक्त समाजों वाला चीन अपनी पहचान खो बैठा। उनकी सरकार तो यह मानती है कि आदमी को बस रोटी, कपड़ा और मकान चाहिऐ और वह यह भूल गयी की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके मन में अन्य लोगों से जुड़ने की प्रवृति होती है- यही कारण है आर्थिक रुप से तथाकथित शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिकों के चेहरे पर जो हंसी दिखती हैं वह खोखली साबित होने लगी है। वहां के किसी वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, लेखक, अभिनेता, या समाज सेवा में नाम कमाने वाले किसी व्यक्ति का नाम कभी भी चर्चा का विषय नहीं बना। वहाँ के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का नाम ही चर्चा में आता है।</p>
<p align="left">शायद चीन की नयी पीढ़ी में बगावत के कोई ऐसे तत्व मौजूद हैं जिसे अलग दिशा में मोड़ने के यह कदम उठाया गया या वाकई चीन के लोगों की मनोदशा में अपने समाज के कमजोर पड़ने की कोई असहनीय पीडा है जिसे दूर करने के लिए यह कदम उठाया गया है यह तो अलग से अध्ययन का विषय है जो पूरी जानकारी मिलने पर ही चर्चा योग्य होगा।</p>
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