मैं अत्यन्त अकेला था अनन्त शून्य था मेरे अन्दर यूँ ही विचार आया मन में अपना भी हो एक सुन्दर घर कुछ न कुछ बटोरकर जैसे-तैसे आदि परमाणु रचा बहुत लम्बी प्रतीक्षा के पश्चात वह सुन्दर दृश्य दिखा एक धमाके के… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: मैं अत्यन्त अकेला था अनन्त शून्य था मेरे अन्दर यूँ ही विचार आया मन में अपना भी हो एक सुन्दर घर कुछ न … more →