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	<title>inlglish &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/inlglish/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "inlglish"</description>
	<pubDate>Sat, 30 Aug 2008 03:56:26 +0000</pubDate>

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<item>
<title><![CDATA[आदमी स्वयं भ्रम में फंसा नजर आता-हिन्दी कविता ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=73</link>
<pubDate>Wed, 27 Aug 2008 15:37:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=73</guid>
<description><![CDATA[यूं तो वक्त गुजरता चला जाता
पर आदमी सा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यूं तो वक्त गुजरता चला जाता<br />
पर आदमी साथ चलते पलों को ही<br />
अपना जीवन समझ पाता<br />
गुजरे पल हो जाते विस्मृत<br />
नहीं हिसाब वह रख पाता</p>
<p>कभी दुःख तो कभी होता सुख<br />
कभी कमाना तो कभी लुट जाना<br />
अपनी ही कहानियां मस्तिष्क से<br />
निकल जातीं<br />
जिसमें जी रहा है<br />
वही केवल सत्य नजर आती<br />
जो गुजरा आदमी को याद नहीं रहता<br />
अपनी वर्तमान हकीकतों से ही<br />
अपने को लड़ता पाता </p>
<p>हमेशा हानि-लाभ का भय साथ लिये<br />
अपनों के पराये हो जाने के दर्द के साथ जिये<br />
प्रकाश में रहते हुए अंधेरे के हो जाने की आशंका<br />
मिल जाता है कहीं चांदी का ढेर<br />
तो मन में आती पाने की ख्वाहिश  सोने की लंका<br />
कभी आदमी का मन अपने ही बोझ से टूटता<br />
तो कभी कुछ पाकर बहकता<br />
कभी स्वतंत्र होकर चल नहीं पाता </p>
<p>तन से आजाद तो सभी दिखाई देते हैं<br />
पर मन की गुलामी से कोई कोई ही<br />
मुक्त नजर आता<br />
सत्य से परे पकड़े हुए है गर्दन भौतिक माया<br />
चलाती है वह चारों तरफ<br />
आदमी स्वयं के चलने के भ्रम में फंसा नजर आता<br />
.....................................</p>
<p><strong>लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहेःईश्वर का वर्णन कोई नहीं कर सकता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=65</link>
<pubDate>Thu, 07 Aug 2008 04:03:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=65</guid>
<description><![CDATA[रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं<br />
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं</strong><br />
कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।<br />
<strong>संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्यार बिकता हैं यहां-हिंदी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=63</link>
<pubDate>Wed, 06 Aug 2008 15:33:57 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=63</guid>
<description><![CDATA[
जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार
पर म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
जब भी हम ढूढ़ते हैं अपने लिए प्यार<br />
पर मिलती है सब जगह से दुत्कार<br />
खुद करो चाहे किसी से भी तुम<br />
मांगो न किसी से इसका उपहार<br />
लोग नहीं निकल पाते अपने दिल से<br />
खरीदा और बिकता पैसे से यहाँ प्यार<br />
भाषा में बहुत होते हैं सुन्दर शब्द<br />
पर बोलने में सब लोग हैं लाचार<br />
अपनों में कितना भी तलाशो नहीं मिलता<br />
गैरों भी नहीं मिल सकता जल्दी प्यार<br />
शब्द में होती ढेर सारी शक्ति<br />
पर पैसे से ही लोग देते-लेते प्यार<br />
बेहतर है निकल पड़े अनजाने सफर पर<br />
शायद कहीं मिल जाये प्यार<br />
अपनों की भीड़ में रहकर ऊबने से अच्छा है<br />
अनजाने लोगों के बीच ढूँढें सच्चा प्यार<br />
---------------------------------</strong></p>
<blockquote><p><strong>यह इस मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका</a> पर प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं दी गयी है।<br />
दीपक भारतदीप, कवि एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाज की इमारत में आदमी पत्थर की तरह लग जाते-कविता साहित्य]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=60</link>
<pubDate>Wed, 30 Jul 2008 13:50:37 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=60</guid>
<description><![CDATA[हर पल लोगों के सामने
अपना कद बढाने की क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हर पल लोगों के सामने<br />
अपना कद बढाने की कोशिश<br />
हर बार समाज में<br />
सम्मान पाने की कोशिश<br />
आदमी को बांधे रहती है<br />
ऐसे बंधनों में जो उसे लाचार बनाते </p>
<p>ऐसे कायदों पर चलने की कोशिश जो<br />
सर्वशक्तिमान के बनाए बताये जाते<br />
कई किताबों के झुंड में से<br />
छांटकर लोगों को सुनाये जाते<br />
झूठ भी सच के तरह बताते </p>
<p>सब जानते हैं कि भ्रम रचे गए<br />
आदमी को पालतू बनाने के लिए<br />
उड़ न सके कभी आजाद पंछी की तरह<br />
फिर भी कोई नहीं चाहता<br />
अपने बनाए रास्ते पर चलना<br />
क्योंकि जहाँ तकलीफ हो वहाँ चिल्लाते<br />
जहाँ फायदा हो वहाँ हाथ फैलाकर खडे हो जाते<br />
समाज कोई इमारत नहीं है<br />
पर आदमी इसमें पत्थर की तरह लग जाते </p>
<p>आदमी अकेला आया है<br />
और अकेला ही जाता भी<br />
पर ताउम्र उठाता है ऐसे भ्रमों का बोझ<br />
जो कभी सच होते नहीं दिख पाते<br />
लोग पंछियों की तरह उड़ने की चाहत लिए<br />
इस दुनिया से विदा हो जाते </p>
<p>-----------------------------</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>क्यों नहीं देते सुखद अहसास</strong></p></blockquote>
<p>हाथ के स्पर्श से किसी के बदन को<br />
तसल्ली मिलती है तो<br />
उसे छूकर क्यों नहीं देते सुखद अहसास<br />
चंद अल्फाजों से किसी के दिल को<br />
हमदर्दी मिल जाती है<br />
तो अपनी जुबान से बोलकर<br />
क्यों नहीं देते किसी को सुखद अहसास<br />
अपने देखने से किसी को<br />
अच्छा लगता है<br />
तो क्यों नहीं अपनी नजरें इनायत कर<br />
किसी को क्यों नहीं देते अहसास<br />
क्या डरते हैं<br />
अपने से लड़ते हैं<br />
सोचते हैं<br />
किसी को सुखी देख<br />
परेशान होगा मन<br />
ए जिन्दगी को आकाश वाले का तोहफा<br />
माननी वालों<br />
दुख से सजा है यह उसका तोहफा<br />
इसे मिलजुलकर सुख बना दो<br />
इसलिए अक्ल दी है<br />
बांटकर एक दूसरे का दुख-दर्द<br />
क्यों नहीं देते एक दूसरे को सुख का अहसास</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कहने वाले का कहना ही है व्यापार-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=58</link>
<pubDate>Tue, 29 Jul 2008 14:49:36 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=58</guid>
<description><![CDATA[एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>एक सपना लेकर<br />
सभी लोग आते हैं सामने<br />
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन</p>
<p>कहते हैं<br />
‘तुम उस पर बैठ सकते हो<br />
और कर सकते हो दुनियां पर शासन</p>
<p>उठाकर देखता हूं दृष्टि<br />
दिखती है सुनसान सारी सृष्टि<br />
न कहीं सिंहासन दिखता है<br />
न शासन होने के आसार<br />
कहने वाले का कहना ही है व्यापार<br />
वह दिखाते हैं एक सपना<br />
‘तुम हमारी बात मान लो<br />
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो<br />
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे<br />
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’</p>
<p>उनको देता हूं अपने पसीने का दान<br />
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं<br />
रहने देता अपने मन में निशान<br />
मतलब निकल जाने के बाद<br />
वह मुझसे नजरें फेरें<br />
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं<br />
मुझे पता है<br />
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन<br />
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>जिस घर के अंदर झांका वहीं जंग का मैदान पाता </strong></p></blockquote>
<p>अपनों में गैर<br />
और गैरों में अजनबी हो जाना<br />
कितना सताता है<br />
जब आदमी अपने को अकेला पाता है </p>
<p>भरी दोपहर में<br />
शरीर से बहता पसीना<br />
चलते जा रहे पांव<br />
चंद पलों के मन के सुख की खातिर<br />
जिस घर के अंदर झांका<br />
वहीं जंग का मैदान पाता है</p>
<p>मांगने पर थोड़ा प्यार<br />
इतराने लगते हैं लोग<br />
देते हैं नसीहतें तमाम<br />
पर चंद प्यार के लफ्ज बोलकर<br />
हमदर्दी जताने का ख्याल<br />
किसी को नहीं आता है </p>
<p>ऊपर से बरसाता आग सूरज<br />
नीचे जलती धरती<br />
नंगे पांव चलता आदमी<br />
ढूंढता है सभी जगह मन की शीतलता<br />
पर भी नजर डाले<br />
लोगों का मन छल से भरा<br />
स्वयं को ही धोखा देता नजर आता है</p>
<p>कुछ पल प्यार की चाह<br />
जलते पांव के लिये शीतलता की राह<br />
मांग कर अपने आपको<br />
शर्मिंदा करने से तो<br />
जलती आग मे चलते रहना ही भाता है<br />
भला आदमी भी कभी आदमी को<br />
सुख के पल दे पाता है<br />
..................................<br />
उस महफिल में चंद पल सुकून से<br />
बिताने की खातिर रखा था कदम<br />
हमें मालुम नहीं था दिलजलों ने<br />
अपने लिये उसे सजाया हैं<br />
उनके मसले देखकर ख्याल आया कि<br />
इससे तो घर ही अच्छे थे हम<br />
पहले भी कम नहीं थे साथ हमारे<br />
वहां से बेआबरू होने का लेकर लौटे गम<br />
......................................</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
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]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[श्रमिक पुत्र कभी अभिनेता नहीं बनता-हास्य कविता-व्यंग्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=55</link>
<pubDate>Mon, 28 Jul 2008 14:08:24 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=55</guid>
<description><![CDATA[
आज मजदूर दिवस है
आओ सब मिलकर नारे लगाय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
आज मजदूर दिवस है<br />
आओ सब मिलकर नारे लगायें<br />
जो गरीबों और मजदूरों को भायें<br />
जन कल्याण और न्याय के लिये<br />
जोर से आवाज उठायें<br />
फिर भूल चाहे भूल जायें<br />
एक ही दिन तो सब करना है<br />
फिर कौन पूछेगा कोई कि<br />
हम क्या कर रहे हैं<br />
मजदूर दिवस कोई रोज नहीं आता<br />
जो कोई फिक्र करें कि<br />
उसके बाद भी कुछ करना होगा<br />
फिर तो पूर वर्ष<br />
न नारे होंगे न कोई सभायें<br />
फिर क्यों घबड़ायें<br />
................................</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इस लेख के अन्य बेवपत्रक/पत्रिकाएं नीचे लिखी हुईं  हैं<br />
<a href="http://anantrajl.blogspot.com">1. अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://deepakraj.blogspot.com">4.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.wordpress.com">संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</a> </strong></p></blockquote>
<p>पत्थर तोडने वाले मजदूर की बेटी से<br />
खेलते हुए दूसरे मजदूर के बेटे ने कहा<br />
‘‘मै तो बड़ा होकर हीरो बनूंगा’<br />
उसने कहा<br />
‘‘अब ठहर गया है जमाना<br />
समय बदलता है यह सत्य है<br />
पर कितना भी बदले<br />
मजदूर का बेटा हीरो नहीं बनता है<br />
सब जगह यही है हाल<br />
यहां आदमी अब मां के पेट से बनता है<br />
मजदूर का बेटा चाहे कितना भी कर ले<br />
वह समाज में हीरो नहीं बनता है<br />
...............................</p>
<blockquote><p><strong>यह कवितापाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
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<p>  </strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी उड़ा ले जाते हैं-हिन्दी शायरी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=52</link>
<pubDate>Sun, 27 Jul 2008 15:15:52 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=52</guid>
<description><![CDATA[मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>मोहब्बत में साथ चलते हुए<br />
सफर हो जाते आसान<br />
नहीं होता पांव में पड़े<br />
छालों के दर्द का भान<br />
पर समय भी होता है बलवान<br />
दिल के मचे तूफानों का<br />
कौन पता लगा सकता है<br />
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी<br />
उड़ा ले जाते हैं<br />
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते<br />
जो सवालों को दिये जायें<br />
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान<br />
.................................<br />
जब तक प्यार नहीं था<br />
उनसे हम अनजान थे<br />
जो किया तो जाना<br />
वह कई दर्द साथ लेकर आये<br />
जो अब हमारी बने पहचान थे</p>
<blockquote><p><strong>यह कविता  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
<a href="http://rajlekh.wordpress.com">1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका</a><br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></strong></p></blockquote>
<p></strong></p></blockquote>
<blockquote><p><strong>रिश्तों के कभी नाम नहीं बदलते-हिन्दी ग़ज़ल</strong></p></blockquote>
<p>दुनियां में रिश्तों के तो बदलते नहीं कभी नाम<br />
ठहराव का समय आता है जब, हो जाते अनाम<br />
कुछ दिल में बसते हैं, पर कभी जुबां पर नहीं आते<br />
उनके गीत गाते हैं, जिनसे निकलता है अपना काम<br />
जो प्यार के होते हैं, उनको कभी गाकर नहीं सुनाते<br />
ख्यालों मे घूमते रहते हैं, वह तो हमेशा सुबह शाम<br />
रूह के रिश्ते हैं, वह भला लफ्जों में कब बयां होते<br />
घी के ‘दीपक’ जलाकर, दिखाने का नहीं होता काम </p>
<blockquote><p><strong><strong></p>
<p>यह कविता  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति-पत्रिका’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://zeedipak.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong></strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःसज्जन की मित्रता पूर्वाद्ध की छाया के समान]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=48</link>
<pubDate>Sat, 26 Jul 2008 05:02:30 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=48</guid>
<description><![CDATA[दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्<br />
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर<br />
इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी तो साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता। </p>
<p><strong>आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्<br />
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्</strong></p>
<p>जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्ध में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।</p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से  इस ब्लाग <a href="http://rajdpk1.wordpress.com">‘दीपक भारतदीप की अनुभूति पत्रिका’</a> पर लिखा गया है। इस पर कोई विज्ञापन नहीं है। न ही यह किसी वेबसाइट पर प्रकाशन के लिये इसकी अनुमति दी गयी है।<br />
इसके अन्य  वेब पृष्ट हैं<br />
<a href="http://deepkraj.blogspot.com">1. शब्दलेख सारथी</a><br />
<a href="http://terahdeep.blogspot.com">2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका</a><br />
<a href="http://dpkraj.blogspot.com">3.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[देखें यह  चालाकी है या चोरी या कोई प्रयोग-आलेख]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=44</link>
<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 10:40:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=44</guid>
<description><![CDATA[दीपक बापू कहिन पर अपना पाठ रखा और उस ब्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://deepakbapukahin.wordpress.com">दीपक बापू कहिन</a> पर अपना पाठ रखा और उस ब्लाग पर गया -जहां मेरे पाठ की कापी मेरे से पूछे ही रखी जा रही है-तो क्या देखता हूं कि पहले वाला पाठ उसने नहीं रखा पर आज वाला पाठ वहां पर आ गया। इतना तो  समझ में आ गया है कि मेरे ब्लाग सीधे उस वेबसाइट/ब्लाग पर कैसे पहुंच रहे हैं। अब केवल यह जानना बाकी है कि वह इस देश का हिंदी ब्लागर है जो नये प्रयोग कर रहा है या कोई अंग्रेजी का ब्लागर है। इसकी संभावना भी हो सकती है कि वर्डप्रेस से जुड़ा कोई वह ब्लाग भी हो  कि जो विभिन्न श्रेणियों के ब्लाग को अलग अलग करने की दृष्टि से बनाया गया हो। वह कोई ऐसा अंग्रेजी ब्लागर भी हो सकता है जो केवल साफ्टवेयर के सहारे अपना ब्लाग चला रहा हो और इस देश का भी। </p>
<p>इन संभावनाओं की तलाश करते हुए यह पोस्ट मैं लिख रहा हूं। शायद मैं ऐसा नहीं करता अगर दीपक बापू कहिन पर एक नया पाठ रखने चिट्ठाकार समूह को ईमेल करने के तत्काल उसके ब्लाग पर मुझे अंग्रेजी के बहुत सारे नये पाठ नहीं दिखाई देते। क्या वह उन संदेशों को कहीं पढ़ रहा था। मैंने उससे कहा था कि दोपहर तक वह मेरे पाठ हटा दे और उसने ऐसा करने की बजाय बहुत सारे अंग्रेजी के पाठ ही डाल दिये और गुमराह कर रहा है कि यह तो किसी अंग्रेज का ब्लाग है। इतना तय है कि अगर वह भारत के हिंदी ब्लाग जगत का सदस्य है तो बहुत पुराना है क्योंकि उसे इन चर्चाओं के बारे में पता चल जाता है। अगर वह अंग्रेज ब्लागर है तो फिर उसने मेरे तीन ब्लाग की कापी करने के बाद फिर किसी अन्य ब्लाग के पाठ को वहां क्यों नहीं रखा था। मेरे पाठ लगतार दो दिन तक  क्यों दिखाई दे रहे थे?<br />
क्या इस बीच में वहां कोई ऐसा पाठ नहीं आया था। बहरहाल उसने मेरे पाठ को खींचने वाले जो तार वहां लगा रखे हैं उनको हटाते हुए यह पोस्ट मैं लिख रहा हूं। देखते हैं अगर उसके बाद भी यह ब्लाग वहां पहुंचता है तो फिर आगे मामला बढ़ायेंगे और नहीं तो उस ब्लाग पर निगाह रखना होगी कहीं वह कोई और कारिस्तानी तो नहीं कर रहा है। वैसे यह अंतर्जाल है पता नहीं पड़ता है कि हमें कोई धोखा दे रहा है या स्वयं ही खा रहे हैं। मैं इधर उधर जब सफल नहीं होता तो अपने लिखने में ही प्रयोग करता हूं।  </p>
<blockquote><p><strong><br />
दीपक भारतदीप<br />
लेखक एवं संपादक</strong></p></blockquote>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संगीत का लेते नाम, मचाते कोहराम-हास्य कविता]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=42</link>
<pubDate>Sat, 19 Jul 2008 10:18:13 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=42</guid>
<description><![CDATA[
गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
गीत और संगीत से<br />
दिल मिल जाते हैं पर<br />
अब तो उसकी परख के लिये<br />
प्रतियोगितायें को अब वह<br />
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते<br />
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते<br />
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन<br />
उससे हमले कराये जाते<br />
मद्धिम संगीत और गीत से<br />
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में<br />
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते</p>
<p>कहें महाकवि दीपक बापू<br />
‘अब गीत और संगीत<br />
में लयताल कहां ढूंढे<br />
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते<br />
महफिलें तो बस नाम है<br />
श्रोता तो वहां भाड़े के सैनिक की<br />
तरह सजाये जाते<br />
जो हर लय पर तालियों का शोर मचाते<br />
देखने वाले भी कान बंद कर<br />
आंखों से देखने की बजाय<br />
उससे लेते हैं सुनने का काम<br />
गायकों को सैनिक की तरह लड़ते देख<br />
फिल्म का आनंद उठाये जाते<br />
किसे समझायें कि<br />
भक्ति हो या संगीत<br />
एकांत में ही देते हैं आनंद<br />
शोर में तो अपने लिये ही<br />
जुटाते हैं तनाव<br />
जिनसे बचने के लिये संगीत का जन्म हुआ<br />
क्या उठाओगे गीत और संगीत का आंनद<br />
जैसे हम उठाते<br />
लगाकर रेडियो पर विविध भारती पर<br />
अपनी अंतर्जाल की पत्रिका पर लिखते जाते<br />
यारों, संगीत सुनने की शय है देखने की नहीं<br />
गीत वह जिसके शब्द दिल को भाते हैं<br />
सुरों के महायुद्ध में जीत हार होते ही<br />
सब कुछ खत्म हो जाता है<br />
पर तन्हाई में लेते जब आनंद तब<br />
वह दिल में बस जाते<br />
बाजार में दिल के मजे नहीं बिकते<br />
अकेले में ही उसके सुर पैदा किये जाते</p>
<blockquote><p>(दीपक भारतदीप, लेखक संपादक)</p></blockquote>
<p>...................................</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:विषयी लोग दीप और संत हीरे समान होते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=39</link>
<pubDate>Thu, 03 Jul 2008 01:30:02 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=39</guid>
<description><![CDATA[
दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग
]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><br />
दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग<br />
बड़ी लहर जो विषय की, जरत न मोरे अंग </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जलते हुए दीपक की रौशनी को देखकर पतंगे जल-जल कर मर जाते हैं। उसी प्रकार जब मनुष्य के मन में विषयों की लहर हमेशा उठती है और वह उसमें बहता रहता है-उसे अपने जीवन मरण का विचार ही नहीं रहता।</p>
<p><strong>सहकामी दीपक दसा, सौंखें तेल निवास<br />
कबीर हीरा संत जन, सहजै सदा प्रकाश </strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जिसमें कामवासना अधिक होती है उसकी दशा दीपक के समान होती है जो जलते हुए अपने तेल को भी चूस लेता है जबकि वह उसकी ऊजा का स्त्रोत होता है और उसके समाप्त होने पर दीपक स्वयं भी बुझ जाता है। इसके विपरीत संत लोग हीरे के समान होते हैं जिनकी तपस्या का प्रकाश चारों और फैलता है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:देता तो परमात्मा है किसी अन्य का भ्रम मत पालो]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=38</link>
<pubDate>Wed, 02 Jul 2008 01:32:49 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=38</guid>
<description><![CDATA[देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन
लोग भर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>देनदार कोउ और है, भेजत सा दिन रैन<br />
लोग भरम पै धरे, वाते नीचे नैन</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि इस जीवन में कुछ देने वाला तो परमात्मा है पर लोग अपने द्वारा लेने-देने की भ्रम पाल लेते है। इसी कारण हमारे नेत्र झुके रहते है।</p>
<p><strong>दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि<br />
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि जीवन में बुरे दिन आने पर सब लोग पहचानना भी भूल जाते है। ऐसे समय में यदि अपने सहृदय लोगों से सम्मान ओर प्रेम मिलता रहे तो फिर धन की हानि की पीड़ा कम हो जाती है।<br />
<strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संसार में कुछ लोग तो गरीब है और कुछ अमीर, पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह माया के इस भ्रम का शिकार हो जाता है और उसे लगता है कि जो अमीर है वह कुछ अधिक योग्य है और जो गरीब है वह अयोग्य। आजकल तो यह भ्रम और बढ़ गया है लोग चर्चित और धनवान लोगों को देवता समझ लेते हैं जैसे कि उनमें इंसानों जैसे गुणों के साथ कोई दोष हो ही नहीं। चारों तरफ भ्रम का साम्राज्य है। इसलिये लोग छलकपट और अपराध करके अधिक से अधिक धन कमा कर समाज में प्रतिष्ठित होना चाहते है।</p>
<p>समझदार और ज्ञानी लोग कभी भी भ्रम का शिकार नहीं होते उनको पता होता है कि यह सब माया का खेल है। इसलिये वह अमीर गरीब का भेद नहीं करते। ऐसे सहृदय सज्जन ऐसे किसी अमीर मित्र या रिश्तेदार का साथ नहीं छोड़ते तो उस व्यक्ति को अपने आप को धनी ही समझना चाहिए। माया तो आनी जानी है पर अगर कोई अपने लोग फिर भी सम्मान देते हैं तो समझ लो कुछ नहीं गया।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतकःसंतोष से अमीर-गरीब समान हो जाते हैं]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=37</link>
<pubDate>Tue, 01 Jul 2008 03:58:43 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=37</guid>
<description><![CDATA[वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलै]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।<br />
स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र</strong></p>
<p>भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनी और निर्धन के संतोष में कोई अंतर नही। जिसकी बहुत बड़ी इच्छाएं वह दरिद्र होते हुए भी मन के संतुष्ट हो जाता है तो भला किसे धनी कहा जाये और किसे दरिद्र।</p>
<p><strong>संक्षिप्त व्याख्या-</strong>यहां कोई धनी अपने धन पर इतराता है तो कोई अपनी निर्धनता को लेकर त्रस्त रहता है। अपनी देह में विचरने वाले मन की ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। अगर मन में संतोष है तो फिर किस बात की चिंता रह जाती है। कुछ लोग ऐसे है जो अपने पास भौतिक साधनों के अभाव की परवाह न करते हुए भक्ति भाव से अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वह परमात्मा द्वारा दिये गये धन से संतुष्ट हो जाते हैं पर कई धनिक हैं जो धन क पीछे सदैव पड़े रहते हैं पर मन की शांति उनसे कोसों दूर रहती है। इतना ही नहीं अपनी कम आवश्यकताओं के कारण संतुष्ट लोगों के मन की शांति उनको नहीं सुहाती और तब वह सोचते हैं कि काश! हमें मन की शांति मिल जाये। </p>
<p>आज का भौतिक संसार तो आपने देखा होगा मनुष्य की अशांति पर ही अधिक चल रहा है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक अभिनेता कहता है-‘डोंट बी संतुष्ट‘। मतलब यह कि आज के युग के व्यवसायी अपने हित के लिऐ ऐसे प्रयास करते हैं कि आम आदमी के मन में असंतोष भड़काकर उन्हें माया के ऐसे चक्कर में फंसाया जहां से वह निकल नहीं सके।</p>
<p>अगर आदमी के मन में संतोष है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह धनी है या निर्धन। हमारा काम कम आवश्यकता से चल जाता है तो उससे संतुष्ट हो जाना चाहिए। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:शरीर रुपी बाजार में मन बिक गया]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=36</link>
<pubDate>Mon, 30 Jun 2008 02:45:47 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=36</guid>
<description><![CDATA[यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय 
ज्य]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय </strong><br />
ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नांव<br />
कविवर रहीम कहते हैं की शरीर-रुपी बाजार में मन बिक गया, जैसे पानी में व्यक्ति का प्रतिबिबं पड़ने से जल के अन्दर समाहित व्यक्ति का शरीर वास्तविक नहीं होता. वह केवल परछाईं मात्र होता है,</p>
<p><strong>रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति<br />
कटे चाटै स्वान के, दोउ भांति विपरीति</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं की तुच्छ विचार वाले नीच मनुष्य से प्रेम और द्वेष नहीं करना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिऐ.</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[रहीम के दोहे:अपने मन की वेदना सबके सामने मत प्रगट करो]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=35</link>
<pubDate>Sun, 29 Jun 2008 02:47:16 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=35</guid>
<description><![CDATA[रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट कर]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट करेइ<br />
जाहिं निकारो गेह तें, कस न भेद कहिं देइ</strong></p>
<p>कविवर रहीम कहते हैं कि अपने दिल का हाल हर किसी से मत कहो। सबके सामने आपने आंसु गिराने से कोई लाभ नहीं। यहां लोग दूसरे की वेदना का रहस्य सबके सामने कहकर उपहास उड़ाते हैं। अपने दुःख भुलाने के लिये दूसरों की वेदना का मजाक उड़ाने में उनको मजा आता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>समाज सिकुड़ रहा छोटे और विघटित परिवारों तथा अन्यत्र स्थानों पर कार्य करने की वजह से कई लोग अकेलेपन को झेल रहे हैं। ऐसे में जब उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है तब वह अपने आसपास के लोगों को अपना समझकर कहने लगते हैं जबकि वही लोग बाद में उनका उपहास उड़ाते है। उसके बाद होता यह है कि अपनी समरूया का हल तो होता नहीं उल्टे लोग हंसी उड़ाकर तकलीफ और देते हैं। सच बात तो यह है कि सभी लोग अनेक प्रकार के तनाव झेल रहे हैं पर जब कोई उनको तकलीफ सुनाता है तो वह यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं कि चलो दूसरा भी दुःखी है। अपना दर्द पीते हैं फिर कोई अपनी तकलीफ सुना जाये तो सबके सामने उसका मजाक कर अपना मनोरंजन करते हैं। उसके साथ यह हुआ। देखो उसने यह गलती कर डाली।</p>
<p>ऐसे में अच्छा यही है कि अपनी पीड़ा आप झेलते रहो। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। अच्छा समय निकल गया तो बुरा भी निकल जायेगा-यही सोचकर दिल को तसल्ली देना ठीक है। अगर कोई सोचता है कि दिल का हाल सुनाकर तसल्ली हो जाये तो वह संभव नहीं है। हां, अगर यह विश्वास हो जाये कि कोई व्यक्ति वाकई समस्या का हल कर देगा तो फिर उसे सच बता देना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:टोना-टोटका सब झूठ है]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=34</link>
<pubDate>Sat, 28 Jun 2008 04:02:18 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=34</guid>
<description><![CDATA[जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय<br />
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यंत्र और मंत्र एकदम बेकार है और इसके भ्रम में कभी मत पड़ो। जब तक परम सत्य और शब्द को नहीं जानेगा तब तक वह सिद्ध नहीं हो सकता। कौवा कभी हंस नहीं हो सकता। </p>
<p>जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोईं शब्द उचार<br />
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार</p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मुख से ऐसे शब्द बोलना चाहिए जिससे दूसरा प्रसन्न हो जाये। अगर दूसरा व्यक्ति हमारे बोलने से प्रसन्न होता है तो हमें स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।</p>
<p>संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को जागरूक बनाती है पर कुछ हमारे देश में कुछ लोग ऐसे है जो शिक्षित होने के बावजूद टोने टोटके वालों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं या कथित ढोंगी साधुओं की दरबार में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह यंत्र-मंत्र और टोना टोटका कई लोगों के लिये व्यापार बना हुआ है। कहीं पैसा लेकर यज्ञ हो रहा है तो कही तावीज आदि बेचा जाता है। किसी के हाथ में कोई सिद्धि नहीं है पर सिद्ध कहलाने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। सच तो यह है जीवन का पहिया घूमता है तो कई काम स्वतः बनते हैं तो कई आदमी के बनाने के बावजूद बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अंधविश्वासों की सहायता लेना अपने आपको धोखा देना है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[संत कबीर वाणी:प्रपंची गुरूओं से कोई लाभ नहीं]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=33</link>
<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 06:17:35 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=33</guid>
<description><![CDATA[शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अप]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार<br />
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य का शब्द हो उसी के अनुसार कार्य करो। इस संसार में कई ऐसे गुरू हैं जो पांखडी और प्रपंची होते हैं। वह अपने स्वार्थ के अनुसार कार्य करते हुए उपदेश देते हैं और उनसे कोई लाभ नहीं होता। </p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-</strong>इस संबंध में मेरे द्वारा एक आलेख अन्य ब्लाग पर लिखा गया था जो यहां प्रस्तुत है। </p>
<p>आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं<br />
भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है। </p>
<p>भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.</p>
<p>भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं. </p>
<p>यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और अध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।'' </p>
<p>मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं। </p>
<p>एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चाणक्य नीति:शास्त्रों की निंदा करने वाले अल्पज्ञानी]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=32</link>
<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 02:40:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[
1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नही]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong></p>
<p>1.आकाश में बैठकर किसी से वार्तालाप नहीं हो सकता, वहां कोई किसी का संदेश वाहक न जा सकता है और न वहां से आ सकता है जिससे कि एक दूसरे के यहां के रहस्यों जाना जा सकें। अंतरिक्ष के बारे में सामान्य मनुष्यों को कोई ज्ञान नहंी रहता पर फिर भी विद्वान लोगों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में ज्ञान कर लिया। ऐसे विद्वान प्रतिभाशाली और दिव्य दृष्टि वाले होते हैं।</p>
<p>2.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वेद की निंदा करने वाले वेद की महानता को कम नहीं कर सकते। शस्त्र निहित आचार-व्यवहार को कार्य बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों की मर्यादा को नष्ट नहीं कर सकते। </p>
<p>3.बुद्धिमान मनुष्य को कौवे से पांच बातें सीखनी चाहिए। छिपकर मैथुन करना, चारों और दृष्टि रखना अर्थात चैकन्ना रहना, कभी आलस्य न करना, तथा किसी पर विश्वास न करना।</strong></p>
<p>संपादकीय व्याख्या-कई लोग भारतीय वेद शास्त्रों के बारे में दुष्प्रचार में लगे हैं। इनमें तो कई अन्य धर्मों के विद्वान भी हैं। उन्होंने इधर-उधर से कुछ श्लोक सुन लिये और अब वेदों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। उनके बारे में वह कुछ नहीं जानते। लाखों श्लोकों में से दो चार श्लोक पढ़कर उन पर टिप्पणियां करना अल्पज्ञान का ही प्रतीक है। इन वेदों के अध्ययन से ऐसा लगता है कि आज अप्रासंगिक लगने वाले कुछ संदेश अपने समय में उपयुक्त रहे होंगे। भारतीय वेदों ने ही इस विश्व में सभ्यता स्थापित की है। वेदों मेें यह कहीं नहीं लिखा हुआ है कि समय के साथ अपने अंदर परिवर्तन नहीं लाओ। </p>
<p>आधुनिक विज्ञान में पश्चिम का गुणगान करने वालों को यह पता होना चहिए कि सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे मेें भारतीय विद्वान बहुत पहले से ही जानते थे। भारत के अनेक पश्चिम को ही आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानता है जो आज भी पूर्ण नहीं है और प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भृतहरि शतक:नौकर का धर्म निभाना होता है कठिन]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=31</link>
<pubDate>Fri, 20 Jun 2008 14:16:41 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=31</guid>
<description><![CDATA[मौनान्मूकः प्रवचनपटूर्वातुलो जल्पक]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मौनान्मूकः प्रवचनपटूर्वातुलो जल्पको वा<br />
धृष्टः पाश्र्वे वसति च सदा दूरतश्र्चाऽप्रगल्भ<br />
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः<br />
सेवाधर्मः परमगहना योगिनामप्यगम्यः</strong><br />
हिंदी में भावार्थ-इस संसार में सेवा का धर्म अत्यंत कठिन है। यदि सेवाक मौन रहे तो उसे गूंगा और बात करे तो बकवादी कहेंगे। अगर हमेशा ही अपने पास बैठा रहे तो ढीठ और दूर रहे तो मूर्ख माना जायेगा। क्षमाशील होता भीरु और अगर कोई बात सहन न करे तो निम्न कोटि का कहा जायेगा। इस बात को तो योगीजन भी समझ नहीं पाते।</p>
<p>वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यहां सेवा से आशय परमार्थ के लिए की जाने वाली सेवा नहीं है वरन् जो अपने पेट पालने के लिए दूसरों की नौकरी करने से है। आज हमारे देश के सभी शिक्षित लोग नोकरी के पीछे भाग रहे हैं और जो नौकरी कर रहे हैं वह सब ऐसी हालत का सामना करते हैं जिसमें उन्हें अपनी स्थिति समझ मेे नहीं आती। कुल मिलाकर अगर हम कहीं नौकरी कर रहे हैं तो अपने आत्म सम्मान की बात आजकल तो भूल ही जाना चाहिए। नौकरी चाहे निजी हो या सरकारी उसमें आदमी के लिऐ तनाव तो रहता ही है। यहां बोस के ऊपर बोस है पर हैं सभी नौकरी करने वाले। नौकरी करते हुए किसी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता हैं। इसलिये निश्चिंत होकर नौकरी करें तो ही ठीक है। उसमें अगर आत्म सम्मान बचाने का विचार किया तो वह संभव नहीं है।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[समाज के साथ होने का भ्रम पालना व्यर्थ-चिंतन ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=30</link>
<pubDate>Sat, 07 Jun 2008 07:42:10 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><img src='//i21.tinypic.com/1y1nbd.jpg[/IMG]' alt='' class='alignleft' />समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत मुझे कभी नहीं सुहाता। मुझे उकताहट होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म, प्रदेश और या कुल के नाम अपना परिचय देकर अहंकार या कुंठा प्रदर्शित करता  हैं। मेरा मानना है कि यह सब उन लोगों को कहना पड़ता है जो अपने अंदर केवल कमाने और खाने के अलावा कोई योग्यता नहीं रखते। वैसे कोई आदमी किसी का सगा नहीं होता। यहां तक कि जब अपने परिवार पर संकट होता है तो आदमी पहले अपने को बचाने का प्रयास करता है। अगर वह किसी समूह या वर्ग के होने का दावा करता है तो इसका आशय यह है कि उसका  लाभ उठाना चाहता है अगर कहीं से उसे लगता है कि उसके वर्ग या समूह की हानि से उसे भी परेशानी होगी तो वह उसके साथ हो जाता है। इसके विपरीत अगर उसे लगता है कि  मदद नहीं  करने से व्यक्तिगत हानि होगी तो वह दूर भागता है और अगर हानि लाभ की संभावना से परे हो तो वह मूंह भी फेर लेता है।</p>
<p>                     मतलब यह कि व्यक्तियों द्वारा  समूहों और वर्गों के जुड़े होना भी एक भ्रम है। मै किसी प्रकार के नारों और वाद पर चर्चा नहीं करता क्योंकि उनमें कोई को गहन विचार नहीं होता। कुछ अनुमान और कल्पनाएं दिखाकर ऐसे नारे और वाद प्रतिपादित किये जाते हैं जिनका प्रयोजन उन समूहों और वर्गो के लोगों को  एकत्रित कर अपने लिये आर्थिक और सामाजिक श्रीवृद्धि के साधन जुटायें जायें। हर समूह या वर्ग के शीर्षस्थ लोग कथित रूप से बड़े होने का स्वांग कर कल्याण और विकास का नारा देते हैं। मैंने कई बार देखा है और कई बार ठगा जाता हूं। कई बार तो ऐसा भी लगा है कि जिस समूह या वर्ग से जुड़ा बताकर कोई बड़ा आदमी मेरे कल्याण की बात कर मुझे अपने साथ जुड़ने को प्रेरित कर रहा है तो यह जानते हुए भी कि वह ढोंग कर रहा है तब भी उसकी बात दिखाने के लिये मान लेता हूं। सोचता हूं कि यार, आदमी को समूह या वर्ग से जुड़ा होना चाहिए क्योंकि सब लोग एसा ही करते हैं। मनुष्य ही सामजिक प्राणी है और असामाजिक भी। ऐसे में अपने समूह या वर्ग से अलग किसी समूह या वर्ग के व्यक्ति से कोई वाद-विवाद हुआ तो उसमें मेरे लोग ही मेरे काम आयेंगे-यही भ्रम पालकर  खामोश हो जाता हूं। भरोसा नहीं है कि मेरे समूह या वर्ग के बड़े लोग मेरे किसी काम आयेंगे इसलिये किसी से वाद-विवाद भी नही करता पर फिर भी सच नहीं कहता और भीड़ में भेड़ की तरह शामिल हो जाता हूं।</p>
<p>यह मेरा अकेले का सच नहीं है बल्कि सब लोग यही कर रहे हैं। अपने अंदर एक अनजाना खौफ है जो शुरू से आदमी में जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों और वर्गों में उसे बने रहने के लिये प्रेरित करता है जो सामान्य लोगों के सहयोग से कुछ कथित लोगों को बड़ा आदमी बना देते हैं और उनका  जीवन भर उनका शोषण करते हैं। इस देश में पहले भी ऐसा ही हुआ अब भी हो रहा है। सत्य सब जानते हैं कि कोई भी किसी का नहीं है पर फिर भी भ्रम का साथ देते हैं।</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कबीर संदेशःअहंकार होता है पतन का कारण]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=28</link>
<pubDate>Sat, 24 May 2008 06:36:08 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=28</guid>
<description><![CDATA[मैं मेरी तू जनि  करै, मेरी मूल विनासि
म]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मैं मेरी तू जनि  करै, मेरी मूल विनासि<br />
मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फांसि</strong></p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि इस संसार में मनुष्य देह पाकर अहंकार के जाल में मत फंसा क्योंकि यह तो पांव की फांस है जो भक्ति मार्ग पर चलने नहीं देती। बाद में यही गले की फांसी भी बन जाती है।<br />
<strong>तन सराय मन पाहरु, मनसा उतरी आय<br />
को काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय</strong><br />
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह देह धर्मशाला की तरह है और इसका पहरेदार हमारा मन है। इस देह में इच्छाएं और कामनाएं अतिथि के रूप में आकर ठहर जाती हैं। एक का काम पूरा होता है तो दूसरी वहां रहने चली आती है। यहां कोई किसी का सगा नहीं है यह ठोक बजाकर देख लिया।</p>
<p>इत पर घर उत है घरा बनिजन आये हाट<br />
करम करीना बेचि के, उठि करि चालो बाट</p>
<p>संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में देह धारण करने का आशय यह समझना चाहिए कि हम व्यापारी की तरह हाट में आये है। इसलिये हमें सत्कर्मों का व्यापार करना चाहिए। अतः यहां जाने से पहले अपना समय भगवान भक्ति और परमार्थ करते रहना चाहिए। आखिर फिर अपने घर वापस भी तो जाना है।</p>
<p>व्याख्या-हमेशा कहा जाता है कि हमारा आत्मा परमात्मा से बिछड़ कर यहां आया है इसलिये उनका घर ही हमारा घर है। यही कबीरदास जी का आशय है। इसलिये वह यह कहते हैं कि यह देह धारण करना मतलब बाजार में आना है। </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कठपुतली का खेल तो अब भी चल रहा है-व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=24</link>
<pubDate>Sun, 18 May 2008 15:01:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=24</guid>
<description><![CDATA[हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>हम घर से बाहर निकल कर जैसे सायकल से सड़क पर आये तो  एक सज्जन मिल गये और  हमसे बोले-‘कहां जा रहे हो।’</p>
<p>हमने कहा-‘पुतले और पुतली का खेल देखने जा रहे हैं।’<br />
वह बोले-‘‘कहां जा रहे हो? हमें भी बताओ। अरसा हो गया कठपुतली का खेल देखे। हमें भी बताओं तो हम भी अपनी कार से वहां पहुंच रहे हैं।’’<br />
हमने कहा-‘नही, दरअसल हमारे एक मित्र ने हमसे कहा कि आओ पोल खोल देखेंगे। उसी के आग्रह पर उसके घर जा रहे हैं।’</p>
<p>वह बोले-‘‘अरे, वह तो फिल्म का नाम है। उसमें तो मशहूर हीरो  और हीरोइन ने एक्टिंग की है। तुंम उसे पुतले-पुतली का खेल कह रहे हो।’’</p>
<p>हमने कहा-‘मगर फिल्म और कठपुतली के खेल में फर्क क्या हैं?<br />
वह बोला-‘‘कमाल करते हो यार? मैने सुना तुमने पीना छोड़ दी है। लगता है आज सुबह ही पीकर निकले हो। उसमें तो असली हीरो-हीरोइन ने काम किया है।’’</p>
<p>हमने उत्तर दिया कि-‘‘ कब कहा कि नकली ने काम किया है। मगर काम तो वही किया है जो काठ के बने पुतले-पुतली ही करते हैं। उनको जो डायरेक्ट कहता है वैसा ही अभिनय करते हैं। नृत्य निदेशक जैसा कहता है वैसा ही नाचते हैं ओर संवाद लेखक जैसा लिखकर देता है वैसा ही बोलते हैं। बस बोलते खुद है, चलती उनकी टांगे ही है और बोलती उनकी जुबान है। कोई प्रत्यक्ष कोई डोर पकड़े नहीं रहता। अप्रत्यक्ष रूप से तो कोई न कोई पकड़े रहता ही है फिर हुए तो वह भी पुतले-पुतली ही न!’’</p>
<p>वह बातचीत का विषय बदलते हुए बोले-‘छोड़ो यार, कल तुमने क्रिकेट मैच देखा। क्या जोरदार मैच हुआ?’</p>
<p>अमने च ौंककर पूछा-‘‘क्या भारत की टीम का कोई क्रिकेट मैच हो रहा है?’</p>
<p>‘नही यार,‘‘वह बोले-‘वह ट्वंटी-ट्वंटी के मैच हो रहे हैं। क्या जोरदार मैच हो रहे हैं? तुम तो क्रिकेट के शौकीन हो तुम्हें यह मैच देखना चाहिए।</p>
<p>हम बुद्धुओं की तरह खड़े रहे फिर पूछा-‘‘पर मैच किस देश से हो रहा है?<br />
वह झल्लाकर बोले-‘तुमसे बात करना बेकार है। बहस पर बहस करते हो। अरे किसी देश की टीम से नहीं बल्कि ऐसे ही कुछ टीमें हैं उनके मैच हो रहे हैं।’’</p>
<p>हमने बनते हुए कहा-‘‘अच्छा! तुम उन मैचों की बात कर रहे हो। हमने टीवी पर सुना था कि कुछ उस पर बीस हजार करोड़ रुपये का दांव लग रहा है। अब जब दांव लगेगा तो फिर कहीं यह भी कठपुतली के नाच की तरह तो नहीं है।’ जब इतने बड़े मैचों पर जिनमें देश का नाम दांव पर लगा होता है तब ऐसी ही बातें होतीं हैं कि अमुक ने मैचा फिक्स कर लिया  और अमुक ने अपना प्रदर्शन क्षमता से कम किया उसमें सच्चाई न भी होत तो इनमें तो ऐसा हो सकता है क्योंकि इसमें किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है।<br />
वह बोले-‘‘अपने का इन चीजों से क्या लेना देना? अपने को तो मैच देखना है।’</p>
<p>हमने शुष्क स्वर में कहा-‘इनसे कोई लेना देना नहीं है इसलिये तो वह मैच नहीं देख रहे। डांस  चाहे इसमे देखें या उसमें है तो डांस ही।  <br />
वह बोले-‘‘तुमसे अब बहस करना बेकार है। मनोरंजन का मतलब ही नहीं समझते।’<br />
हमने कहा-‘‘नहीं समझते तो दोस्त के आमंत्रण पर उसके घर क्यों जा रहे हैं? बस फर्क यह है कि तुम फिल्म कहते हो हम पुतले-पुतली का नाच कहते हैं।</p>
<p>वह सज्जन झल्लाकर चले गये। हमने अपनी राह ली। हम भी सोच रहे थे कि सुबह-सुबह क्योंे पंगा लिया।</p>
<p>दरअसल पहले लोग अपनी शक्ल ही आइने में देख पाते थे और फिर अपने सामने चलते फिरते लोगोंे से मजा किसको आता है। इसलिये कठपुतली के अभिनय को देखकर उनको मजा आता है। अब आ गये हैं कैमरे। उसमें तो हाड़मांस के पुतले काम करते हैं तो हम कह देते है। कि हीरो-हीरोइन हैं। काम तो वह वैसा ही कर रहेे हैं सच तो यह कि हर कोई हीरो-हीरोइन बनने के सपने देखने का आदी है इसलिये कठपुतली कहने से झिझकता है। यह भी हो सकता है कि कठपुतली का खेल कहने से लोगों को अपने गंवार होने का अहसास होता हो क्योंकि आजकल तो हर कोई माडर्न बनकर रहना चाहता है। उन हांड़मांस के पुंतलों में अपने को देखता है इसलिये ही कहता है कि हीरो-हीरोइन है।  हम भी पहले ऐसे ही देखते थे। इधर जब से ज्ञान और ध्यान में घुसे हैं तब से र्थोड़ा देखने का नजरिया बदला है। क्रिकेट खेल देखकर हमने अपना जीवन बरबाद कर लिया और अगर वह वक्त हमने कहीं अगर और लगाया होता तो आज क्या होते? उसक मलाल अब दूर हो गया है जब से इस ब्लाग विधा में घुसे हैं। हम अपने को पुतला नहीं कहते क्योंकि स्वयं ही विचार कर लिखते हैं। हम तो उसे ही मनुष्य की तरह कर्म करने वाला मानते हैं जो अपनी बुद्धि से चलता है न कि दूसरे की बुद्धि से। कहने को खिलाड़ी और अभिनेता भी अपनी बुद्धि से चलते हैं और हम उन्हें अपने जैसा मानते है पर उनकी फिल्म और ऐसे छोटे मैचों में उनकी सक्रियता को ही पुंतलों जैसा मानते हैं। आखिर हमारी इस राय में क्या कमी है?<br />
 </p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[The pain is like writing rather than on conflict]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=23</link>
<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:49:51 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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<description><![CDATA[it is a hindi article ant translashan by googl tool
I am writing it on internet Absolutely not mean]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div id="result_box" dir="ltr">it is a hindi article ant translashan by googl tool</div>
<div dir="ltr">I am writing it on internet Absolutely not mean it should be that I am a family of medium-high. Truth is that I was born in the lower middle class and the Board's examination, even after I push wages and run. The shop was on the job I was a wholesale shop and other stores to shop for me many times on the trolley was running out. This was his dad I was also secret. Sometimes my legs had removed the nails into the blood. That his job during the afternoon when I was writing had come to the house - it does not have any pain, but life was optimism. If not today, tomorrow, I will - I believe life is precious capital.</p>
<p>Nowadays you have to work on the scooter I am still split on my bicycle. Physical activity to the poor or the poor say some people may feel comfortable, I do not. So the poor people's pain on stories or verses written Wah '- Wah resources are not interested in me. In this country, work hard on those who lack it is not too full of such pain does not like to work. Yes, AC dining rooms of hotels and those who sit in the privacy of his heart in such sensitive work to pain, she created the juices are happy. The pain is also a juice and everything is on pain who do not have the juice to keep the same reason, depriving them of the pain of poor films and writings became like it. Some of our renowned filmmaker and writer on the same level of pain renowned international support has not even ask any of them here. Yes, this country when they got out of goodwill, here they are also awards provided emotional as ever on the common man not associated with them.</p>
<p>I watched as a worker is the bread I do not respect or sympathy and love, need and therefore a matter of how his people and also are back. Everything in your life, your hard work to make one thing I've seen is that poor workers and the pain and feelings of some people do business. Even if they do not get more money on a lot of respect and he earned a name. A poor labourer on the illness and some real, some fake story written to the pain juice sold.<br />
I always struggle with his poems and poems to set up the price gets so because I am feeling is that the hard work of growing self-confidence. In this country, the welfare of the poor and the workers put the slogan of the intellectuals is a long time and he dominated educational and social institutions such that infiltration has become a society of people from their structure is still in pain juice want to laugh -- They lack confidence because it is so painful and hard work do not juice is not the ones created. The lack of money who do they struggle for survival is a disease and other social crises, and also would not give her a sense he is not wanted. A little respect and love and that nobody wants to give.</p>
<p>My wife sometimes push those who buy goods from the time Even bargain basement healers like him, I am refusing to say that - 'This is working hard to help the society, because if he does not understand the cradle for the stomach of a crime Can '.</p>
<p>It is my inner pain is not present any conflict, but my life experience from a reality. my life in the struggle is an experience I have is that most people work hard so that they respect someone not be crushed under the legs. I would also does not claim that I work hard I of those who are very sensitive because it means that their labour to see reduced.<br />
Today I do not so much physical activity. When I fought physical activity even when I was writing satire and comedy, sometimes even when sweat bathe even when I am just writing fun deal. The authors of this confusion so that the pain is written on the popularity earned them the illusion of prevention will be out. The country also work hard to read as well as occasionally wants to work on the chairs of the people - the pain of watching a film or reading the creation of juice would laugh - ever want to read them. So I prefer to write on the pain rather than conflict.</p>
</div>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Translation, the author of nearly all the languages of tools will  ]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=22</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 13:34:04 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=22</guid>
<description><![CDATA[
I have some lessons to the Blog English translation in Hindi to read them. It is also written by In]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong><em></p>
<p>I have some lessons to the Blog English translation in Hindi to read them. It is also written by Indian writers were. It seems that the world's entire world Blog at the same time, however, one of them will appear as the written content of your country and the region has been the subject of a separate - will appear on the fundamentals of a separate not like the reflection. </p>
<p>Hindi with English translation tool to use the Blog writer also went out of his linguistic limitations of the prestigious English may not know that. Hindi on the forums of unregistered Blog English translation of the lessons I am also presented. I read stories in English could be so clear on the translation tool, I will be working hard on the curiosity I am. The English - Hindi tool of the information now found on the already being used elsewhere. I have a Blog writer that day was his comment on a post and when I was there on his Blog post in Hindi. Blog writer's name in English. A number of English first names to write on, I think the comment was such that it will be placed. Blog author of a comment on my Blog in a Hindi - English tool of the discussion was a day when I felt it was a tool that would so quickly I did not expect such a warning.
</p>
<blockquote><p><strong></p>
<p> it is hindi article and it translasion in inglish by googl tool. i dont more knowledge in inglish-Deepak Bharatdeep.enough knowledge of English is not so sorry for any error - Deepak Bharatdeep<strong></p>
<blockquote></blockquote>
<p></strong></p>
</blockquote>
<p>The point is that the translation is not the result cent of its English-reading assistance, has been found. So it has been used to write for me. When I am on my translation of the text for many words, I brought it back to him does not accept the word alternative keeps me. I created a little English, they may also be understood very well, I will take. It seems that his reaction to the positive. Blog writer also some English writers of Hindi Blog for striving to make contact are showing. Blog writer to remember the mood of Hindi-speaking foreign writers Blog for the remains of his contacts should take place. This Blog is not here and who walks through the translation tool at their other speaking Blog writers come in contact with the full possibility. </p>
<p>Blog of a word in the language translation is not a Blog and writers for the Wall of the language seems to have ended. Yesterday an English writer Blog has posted a response on the matter, in the sense that he has been reading my post as he is writing Jennifer Lancey wrote Hello there. I was sent a link to your blog by a friend a while ago. I have been reading a long for a while now. Just wanted to say HI. Thanks for putting in all the hard work. Now is not surprising that I am writing in Hindi read, is the only people who know only English. I read it and the English translation of his address about his opinions do not run, but we will also go well where such comments are alleging that it is clear that our understanding of that. Yes, I can not wait for this thing to me is that a Hindi translation of the Blog tool to read the translation itself but also keeping am. To correct the translation of impurities so am working hard so that my posts and more clearly readable. Now it's time to write the attention that I am keeping Blog of the translation of other languages. All the languages of the world's Blog writer for a day so that they will be close to the longer distances will be named. I want Hindi Blog writer, and they are also the world at his prestigious posts to be on time sometimes on the translation tool that should see the full translation in English that comes from reading. The word translation are not optional for him to choose words as possible. English translation is not necessary that we keep enough of it, that it can be translated in English, the maximum net. There is not any objectionable because we are writing in Hindi and other languages if the author of Blog contact us if they're willing to keep the facility would be. One thing is the experience that we all their lessons in pure Hindi words maximum use it as pure English translation. </p>
<p>Stories<br />
Google's translation of the text has been presented here to</p>
<p></em></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Good news was not read - comic satire अच्छा हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य]]></title>
<link>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=21</link>
<pubDate>Sun, 04 May 2008 10:28:50 +0000</pubDate>
<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
<guid>http://rajdpk1.wordpress.com/?p=21</guid>
<description><![CDATA[My wife has asked the night -&#8221;What will eat?&#8221;
We have said -&#8221;Where we eat at night]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>My wife has asked the night -''What will eat?''<br />
We have said -''Where we eat at night? So you take a cup of milk with him a small toast to be so afraid. Although you asked why?<br />
Ira said - 'you just write something to eat. I thought that perhaps you saw the hunger will take. When preparing food at night and not on the account, he writes, why?<br />
I said - 'write for yourself, not what the think. Read the account of the night will not! How serious is the matter of foreign dignitaries that the people of our country, people are accused of taking more food, it is important to understand that it is no worry about that.<br />
my wife -''out-you must have been like a man. And all the people to say that I am an account at the time you eat at night and come home with only two to four tea and biscuits account of the night with a cup of milk toast two accounts. It is not, and what to eat? And people say I am a time account. </p>
<blockquote><p><strong>it is hindi article and it translasion in inglish by googl tool. i dont more knowledge in inglish-Deepak Bharatdeep</strong></p>
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<p> I have said -''I did that I would tell people to account and I am the account. This is the thing that set our house on the night, caused not eat.'' </p>
<p>I has been silent wife. One morning, and visited the gentleman replied - yaar''Look, our country, what people are saying out of India's people eat more food in the world because of the crisis. Tell me now, the people of this country was poor, and the flag poles on the ideologies of this country to do with the attack. End! Privatization liberalization live. Now say that more accounts. Now what not to eat bread filled the stomach? </p>
<p>I has said -''if food is not enough. A need to eat less bread.<br />
He said a gentleman - you yaar''as one that can not be any time to eat eat.<br />
I has said -''Today we are less physical effort of so little account.<br />
Mrs them were familiar with them and we spoke -''Where an account of time? Almost at night with tea and biscuits at night with a cup of milk toast must account. What is eating less? </p>
<p>We has thought of speaking lies did not help and i said - 'We do not say that low?<br />
He said a gentleman - 'It is also, we still eat on the account. After eating glass of milk must take. Ha, etc. do not pay with her toast. bhabhiji, Do you understand that the only people you drink the milk. After we eat, sleep sip of milk is not only not come.<br />
We have said - 'you eat with, why are so upset? Your boy's wedding will, we must also lashed eat like other people. No such oath not to eat that night and never eat. Yes, yoga meditation since the start of the night, then eat free from worry, you have not ever say that the dinner to take leave. Some also say the man said. </p>
<p>He said - 'The issue is that really what we eat too?<br />
We have said -''Do not think more? You are already complaining of diabetes and it will only benefit those companies who are out of their pills because of the food is digested you get. Yoga, meditation may be that publicity from now increasing the number of healthy people and those on the 'more food' campaign to increase the tension will be the same again made them sick The move may be the same.<br />
He said a gentleman -''it has not yet informed you of what we eat more Indian?<br />
I has said - in this country,''one hundred and five million people live. Far more people eat wheat, rice, said something and. No one has a scale. A house in four age groups of four are members of the amount of food on their own - is different. Now, how the people of this country say that the accounts are more or less.<br />
He said a gentleman - the last ten years, we are seeing that in your home comes as wheat not take more than once. But eating out of its low consumption have been going. Like many small children, etc. ate the chips enter the stomach, pizzs, burger and ate the stomach, then fill in the house where eat?<br />
I has said - 'eating out of the account appear to other people. On the road to the movement of money out of people to see such things are doing so. Eating places them in the market and a crowd of people watching the money flow seems that the nation is the very account.<br />
The concern of a gentleman, after all, if my wife would have said - 'brother Sahib, so why would you worry? The people of this country, an account of seized a short account. A field in sight, not kill. Any of the seized is not happy to see him come? Went on a looting the house, do not. This is your home you told  we eat at night when to come? If you ever bhabhiji and children to come not just to eat on. </p>
<p>He said a gentleman - 'You Kamal doing? Such a debate has been on the field and you eat, then sat been talking about. At tea, you will eat, so she does not force us not come to your house, including family. Yes, once you come to eat, think again.<br />
Then we went and he changed the subject of talks were the wife said -''it said that the people of India who are more account? </p>
<p>I has said -''We know you try to learn why their concerns have been raised. More concern to a great loss of body fat. "<br />
As he spoke out - if it is a matter of course. Although such a title today in the newspaper, saw on the news was read out. Was not a good read. Without meaning to read the news of what advantage?हुआ खबर नहीं पढ़ी-हास्य व्यंग्य</strong></p>
<p>हमने कहा-‘‘हम रात को कहां खाते हैं?तुम दूध का एक कप ले आओ तो उसके साथ एक छोटा टोस्ट खाकर सो जायेंगे। वैसे तुमने यह पूछा क्यों?’<br />
कहने लगीं-‘तुम अभी कुछ खाने पर लिख रहे थे। मैने देखा तो सोचा कि शायद तुम्हें भूख लग जाये। जब रात को खाना नहीं खाते तो उस पर लिखते क्यों हो?’<br />
मैने कहा-‘अपने लिये तो लिखते नहीं है जो यह सोचें। पढ़ने वाले तो रात को खाते होंगे न! फिर कितनी गंभीर बात है कि अपने देश के लोगों पर अधिक खाने का आरोप लग रहा है तो यह समझाना जरूरी है कि ऐसी कोई बात नहीं है।’<br />
हमारी श्रीमती जी बोली-‘‘लगाने वाला भी तुम जैसा कोई आदमी रहा होगा। सारी दुनियां से कहते हो कि एक समय खाना खाता हूं पर तुम रात को घर आते ही चाय के साथ  दो से चार बिस्कुट  खाते हो और रात को दूध के कप के साथ एक दो टोस्ट उदरस्थ कर जाते हो। यह खाना नहीं तो और क्या है? और लोगों से कहते हो कि एक समय खाता हूं।’</p>
<p>हमने कहा-‘‘तो क्या लोगों का बताता फिरूं कि मैं यह खाता हूं और वह खाता हूं। यह तो तय बात है कि रात को हमारे घर पर खाना नहीं बनता।’’</p>
<p>हमारी श्रीमती जी चुप हो गयीं। सुबह ही एक सज्जन आये और बोले-‘‘देखो यार, अपने देश के  बाहर के लोग क्या कह रहे हैं  भारत के लोग अधिक खाते हैं इसलिये दुनियां में खाद्यान्न का संकट है। अब बताओ, इस देश के लोग गरीब थे तो झंडे और डंडे लेकर इस देश पर विचाराधाराओं के साथ हमला करते थे। सरकारीकरण खत्म करो उदारीकरण चलो। अब कह रहे हैं कि अधिक खाते हैं। अब क्या रोटी भी पेट भरकर  नहीं खायें?’</p>
<p>हमने कहा-‘‘भरपेट तो खाना नहीं चाहिए। जरूरत से एक रोटी कम खाना चाहिए।<br />
वह सज्जन बोले-‘‘यार तुम जैसा तो कोई हो नहीं सकता कि एक समय खाना खाये।’<br />
हमने कहा-‘‘हम आजकल शारीरिक मेहनत कम कर रहे हैं इसलिये कम खाते हैं।<br />
हमारी श्रीमती उनसे परिचित थीं और उनसे बोलीं-‘‘कहां एक समय खाते हैं? रात को आते ही चाय के साथ बिस्किट और रात को दूध के कप के साथ टोस्ट जरूर खाते हैं। वह क्या खाने से कम है?’</p>
<p>हमने सोचा झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है और हमने कहा-‘हम कम कहते हैं कि नहीं लेते?’<br />
वह सज्जन बोले-‘यह तो हम भी करते है पर फिर भी खाना खाते हैं। खाने के बाद दूध का ग्लास जरूर लेते हैं। हा,ं उसके साथ टोस्ट वगैरह नहीं ल