झुरियाँ “डाकिया” आवाज़ सुन दौड़ के जाना चाहती आँगन थके हुए कदम रुक रुक कर ही चलते थैले से निकलते काग़ज़ देख चहेरा उत्सुक होता झुरियों की हर लकीर मुस्कुरा के कहती ‘ ला दे हमारी चिट्ठी… more →
mehhekk wrote 1 year ago: झुरियाँ “डाकिया” आवाज़ सुन दौड़ के जाना चाहती आँगन थके हुए कदम रुक रुक कर ही चलते थैले स … more →
Tags: prakashit kavitayein, Shayari, Kavita, Hindi Poem, Sher, Mehek, letter, dakiya, WorDs
Follow this tag via RSS