ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती घर का धंधा आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा कहँ ‘ काका ‘ कविराय , खाय वह ठूँसमठूँसा यदि ऊपर… more →
The House of Hindi PoetrySatish Chandra satyarthi wrote 8 months ago: फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸ लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट। कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में … more →
devendr wrote 1 year ago: ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती … more →
devendr wrote 1 year ago: प्रकृति बदलती छण-छण देखो, बदल रहे अणु, कण-कण देखो| तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो | भाग्य वाद पर अड़े … more →
devendr wrote 1 year ago: जन – गण – मन के देवता , अब तो आँखें खोल महँगाई से हो गया , जीवन डाँवाडोल जीवन डाँवाडोल , … more →