क्वचित प्रकाशं क्वचित्प्रकाशं, नभ: प्रकीर्णाम बुधरम विभाति । क्वचित क्वचित पर्वत सनिरुद्धम , रुपं यथा शान्त महार्णवस्य ॥ बिलकुल शुरुआती श्लोकों में से एक । आदरणीय गुरु रामचन्द्र शास्त्री का सिखाया हुआ… more →
यही है वह जगहअफ़लातून wrote 5 months ago: क्वचित प्रकाशं क्वचित्प्रकाशं, नभ: प्रकीर्णाम बुधरम विभाति । क्वचित क्वचित पर्वत सनिरुद्धम , रुपं यथ … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: कल सुबह कभी मेरे पड़ोसी प्रयाग पुरी चल बसे । मैं उन्हें बाबाजी बुलाता था । उनका अभिवादन होता था … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: पिछला भाग सोनाबाबू श्रीनाट्यम के संस्थापकों में से एक थे और उसके साथ उन्होंने नाटकों में अभिनय के अल … more →