कल तुम गुजर रहे थे , या कोई ग़ज़ल गुनगुना रहा था …. कल आहट थी कोई पहचानी , या कोई दरवाजे पर आ आ के जा रा था …. कल चाँद था फलक पर , या तेरा चेहरा मुस्कुरा रहा था …. मैने बहुत रोका मगर… more →
लम्हें जिन्दगी केmehhekk wrote 13 hours ago: रात प्रहर खुद को गहरी नींद में पाया सपनो में हमसे मिलने साजन आया | वक़्त का लम्हा था कुछ रुका रुका स … more →
mehhekk wrote 2 weeks ago: खोल दो अपनी पंखुड़ियों को हौले हौले एक के बाद एक फैलाओ अपनी बाहें इतनी सारी कायनात भर लो आशाओं क … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 weeks ago: गड़े मुर्दे उखड़ कर भी इसलिये ताजा हो जाते हैं। क्योंकि जिसे मुद्दे पर चला चर्चा का दौर एक बार फिर वह … more →
अफ़लातून wrote 3 weeks ago: अन्त कायर का कायरों को वार नहीं झेलने पड़ते और इसलिए घाव न उनकी छाती पर होते हैं न पीठ पर उनका खून बा … more →
mehhekk wrote 3 weeks ago: जब मैं उदास होती हूँ मन में ही सिसकती रोती हूँ बिन कारण ही,ऐसे ही भाव … more →
अफ़लातून wrote 3 weeks ago: जनम दिन १. जीर्ण कपड़ा उतार कर नया पहनना पुनर्जीवन है - मेरे गले यह बात अब तक नहीं उतरी | कुशन पर धु … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक न … more →
अफ़लातून wrote 1 month ago: चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हा … more →
प्रवीण wrote 1 month ago: स्वर्ग को चूम, खुशीओं की हवायें बिखर गई, अनजान अनदेखी दिशाओं में, जब जब घाटी में जली बर्फ़, सपनों को … more →
mehhekk wrote 1 month ago: दिल के आँगन में यूही कभी कभी खेलते नज़र आते है हुल्लड़ मचाते खुद ही रूठते खुद को ही मनाते झगड़ते,जीत … more →
प्रवीण wrote 1 month ago: दिन, दिन तू ये कहने को है ! रात, रात तू ये कहने को है! हमारी रात तू तब होती है, जब आपकी जुल्फ़ की चि … more →
mehhekk wrote 1 month ago: नीली झील की सतह पर झूलता है वो जहाँ हमारी मोहोब्बत से सज़ा ख्वाबों का आशियाँ सूबह की सुनहर … more →
hemjyotsana "Deep" wrote 2 months ago: कल तुम गुजर रहे थे , या कोई ग़ज़ल गुनगुना रहा था …. कल आहट थी कोई पहचानी , या कोई दरवाजे पर आ … more →
प्रवीण wrote 2 months ago: जिंदिगी का हर पल , सदियों में बदल गया, तुम याद आई इतना ! एक बूंद की प्यास में, मैं सागर पी गया, तुम … more →
कल्पना भारती wrote 2 months ago: सुबह से लेकर शाम है लवों पे तेरा ही नाम है भरता है दिल तेरे लिए आंहें कोमल मन में सिर्फ तेरी यादें क … more →
अफ़लातून wrote 2 months ago: जल्दी में प्रियजन मैं बहुत जल्दी में लिख रहा हूं क्योंकि मैं बहुत जल्दी में हूं लिखने की जिसे आप भी … more →
अफ़लातून wrote 2 months ago: [गांधी जयन्ती को बीते कल दो ही दिन हुए थे । सलीम मिले तो चार पंक्तियां सुनाईं । मैंने कहा लिख दीजिए … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: एक दिन घूमते हुए उसने चाय पिलाई तब वह अच्छा लगा कुछ दिन बाद वह मिला तो उसने पैसे उधार मांगे तब वह बु … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 months ago: हमने देखा था उगता सूरज उन्होने देखा डूबता हुआ वह कर रहे थे चंद्रमा की रौशनी में जश्न मनाने की तैयारी … more →