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	<title>kishan-patanayak &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/kishan-patanayak/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "kishan-patanayak"</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 07:21:28 +0000</pubDate>

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	<language>en</language>

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<title><![CDATA[ गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ(६) : क्या 'हरिजन' शब्द शाश्वत रहे?]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=295</link>
<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 10:07:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[    &#8216;हरिजन&#8217; शब्द शाश्वत रहे , यह गांध]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;"><a href="http://samatavadi.wordpress.com/files/2008/04/e0a495e0a4bfe0a4b6e0a4a8.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-296" src="http://samatavadi.wordpress.com/files/2008/04/e0a495e0a4bfe0a4b6e0a4a8.jpg?w=193" alt="Kishan Pattanayak" width="193" height="300" /></a>    'हरिजन' शब्द शाश्वत रहे , यह गांधी जी नहीं चाहते थे । 'अछूत' शब्द के प्रति उनका विरोध था , इसीलिए वे यहाँ तक मानते थे कि ' स्वराज्य में दफ़ा १२४ राजद्रोह के लिए नहीं होगी , परन्तु हरिजनों को अछूत कहने वाले के विरुद्ध होगी।' ( <em>महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १९४ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    हरिजन शब्द के प्रति अपने लगाव के बावजूद दलितों की इस शब्द के प्रति आपत्ति को वे तरजीह देते थे । मद्रास के शंकर नामक एक कार्यकर्ता ने वहाँ के दलितों के लिए हरिजन शब्द के बारे में आपत्ति की बाबत गांधी जी को लिखा कि वे हरिजन कैसे कहलाए ? हम तो हरजन हैं हरिजन नहीं । शंकर ने लिखा था ,इन लोगों को यदि हिन्दू कहें , तो इन्हें अच्छा लगेगा । आप इजाजत दीजिए ।' उसे गांधी जी ने लिखा ,' हरिजन नाम पर आपत्ति होने पर के लिए मुझ अफ़सोस होता है । तुम्हारे मित्रों को जो नाम पसन्द हो , वह इस्तेमाल कर सकते हो । मगर उन्हें यह समझाना कि मेरे मन में विष्णु य शिव का जरा भी ख्याल न था । मेरे लिए तो इसका अर्थ 'भगवान का आदमी' ही होता है । विष्णु , शिव या ब्रह्मा में मैं कोई भेद नहीं मानता । सभी ईश्वर के नाम हैं ।मगर इस मामले में उनके निर्णय पर अमल करना चाहिए ।' ( <em>वही , पृ. </em>१३७ ) </p>
<p style="text-align:left;">    २९ अक्टूबर , १९३२ को एक बंगाली सज्जन का पत्र गांधी जी को मिला, 'आप 'हरिजन' नाम देकर अछूतों का दूसरा नाम कायम करना चाहते हैं । इन्हें नाम देने की बात ही क्यों न छोड़ दी जाए ? उसके जवाब में गांधी जी ने लिखा- 'हरिजन' शब्द अछूत भाइयों को ध्यान में रखकर हमेशा के लिए इस्तेमाल करना हो , तो आपका ऐतराज ठीक हैओ ।मगर अभी तो उन्हें अलग करके दिखलाए बिना काम नहीं चल सकता ।साथ ही मुझे यह लगता है कि 'अछूत' या उससे मिलते-जुलते देशी भाषाओं में काम में लिए जाने वाले दूसरे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करना अब उचित नहीं है।' ( <em>वही, पृ. १५५ </em>)</p>
<p style="text-align:left;">    गांधी जी ने सवर्णों के लिए भी एक नाम दिया था । अहमदाबाद में सवर्णों की एक सभा में उनके भाषण में यह नाम आया है । ' मेरे लिए अछूत , यदि हम अपने से (सवर्णों से ) तुअलना करें , तो हर्जन है - भगवान का आदमी और हम दुर्जन हैं ।अछूतों ने सारे श्रम करके , शोणित सुखाकर तथा अपने हाथ गंदे करके हमें आराम और सफाई से रहने की सुविधा दी है । ----- यदि हम चाहें तो अब से भी खुद हरिजन बन सकते हैं , लेकिन इसके लिए हमें उनके प्रति किये गये पापों का प्रायश्चित करना पड़ेगा ।' (<em>महात्मा गांधी ,अहमदाबाद के सवर्णों को , यंग इण्डिया ,६ अगस्त ,१९३१,पृ. २०३</em> )</p>
<p style="text-align:left;">    समतावादी नेता किशन पटनायक का 'हरिजन बनाम दलित' , नाम की इस बहस के सन्दर्भ में ठोश सुझाव है कि 'हरिजन' शब्द अछूतों के लिए था । जिस हद तक अछूत नहीं रह गये हैं  उस हद तक हरिजन शब्द भी हटाना चाहिए और अगर प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से सवर्ण जातियाँ अस्पृश्यता को चलाए रखना चाहती हैं तो गांधी के द्वारा प्रयुक्त दूसरे शब्द का इतेमाल व्यापक होना चाहिए और सभी उच्च जातियों को दुर्जन जातियाँ कह कर पुकारना चाहिए ।----'दलित' शब्द की विशेषता यह है कि स्वत: स्फूर्त ढंग से शिक्षित , सचेत हरिजन समूह इस शब्द के साथ जुड़ रहे हैं ।' ( <em>हरिजन बनाम दलित,सं राजकिशोर</em> ) यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इस वर्ग के बड़ी संख्या में साधारण ग्रामीण आज भी अपनी जाति का नाम न बता कर खुद को हरिजन कहते हैं । क्या इसका यह कारण है कि ग्रामीण समाज में अस्पृश्यता समाप्त नहीं हुई है और इस कारण गांधी जी द्वारा दिया गया नाम सवर्णों से बताने में एक तरह की सुरक्षा का भाव छिपा होता है ?</p>
<p style="text-align:left;"> </p>
<p style="text-align:left;"><strong>[ जारी ]</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/16/gandhi_ambedkar/">भाग १</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/17/gandhi_ambedkar2/">भाग २</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/18/gandhi_ambedkar3/">भाग ३</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong> <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/19/gandhi_ambedkar_4/">भाग ४</a></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong> <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2008/04/21/gandhi_ambedkar5/" target="_blank">भाग ५</a></strong></p>
<p style="text-align:left;">   </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[चरम गुलामी : जब गुलामी भाने लगती है , बौद्धिक साम्राज्यवाद(३):अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=281</link>
<pubDate>Tue, 19 Feb 2008 10:23:01 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/?p=281</guid>
<description><![CDATA[&#8216; विचारधारा और इतिहास के अंत की &#8216; घो]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left"><strong>' विचारधारा और इतिहास के अंत की '</strong> घोषणाओं का वैश्वीकरण के हक़ में एक निश्चित बौद्धिक सहयोग है । फोर्ड फाउन्डेशन पोषित एक शोध में पुराने <strong>राष्ट्र-राज्य</strong> की अवधारणा के स्थान पर <strong>राज्य-राष्ट्र </strong>और<strong> 'मल्टीनेशनल स्टेट'</strong> जैसी अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कस्मीर और उत्तर-पूर्वी  भारत के उदाहरण दिए गए हैं । ऐसे विद्वानों द्वारा तमिलनाडु के हिन्दी विरोधी आन्दोलन में बहुराष्त्रीय राज्य के तत्व होने की बात कही गई है । <em><font color="#0000ff">गुलामी के चरम दौर को समझाते हुए किशन पटनायक कहते थे कि उसमें गुलामी का अहसास भी नहीं रह जाता है । अहसास रहने पर मानव-स्वभाव मुक्ति के लिए उद्यत होता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि गुलामी में एक प्रकार की सुरक्षा का अहसास रहता है। बौद्धिक गुलामी के बारे में भी ये सामान्य बातें लागू होती हैं ।</font></em></p>
<p align="left"><font color="#0000ff"><em>    </em></font><font color="#000000">सरकार द्वारा लिए गए विदेशी धन से चलने वाली प्राथमिक शिक्षा परियोजनाओं में अदना नौकरी करने और शोध परियोजनाओं का परिचालन करने फर्क को नजरन्दाज नहीं किया जाना चाहिए , पर छोटी-बड़ी किसी भी विदेशी मदद से चलने वाली परियोजनाओं में यदि भारत के प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज विज्ञानी शरीक हों तब उनकी गतिविधियों और भूमिका की जांच का एक तरीका अवश्य होना चाहिए(कि.प.)।कम्युनिस्ट पार्टियों में जांच का एक तरीका मौजूद है। <strong><font color="#0000ff">जो समूह वैश्वीकरण का मुकम्मल विकल्प देने की विचारधारा से लैस होने का दावा करते हैं उन्हें बौद्धिक साम्राज्यवाद के इन पहलुओं के प्रति सचेत रहना होगा ।</font></strong></font></p>
<p align="left"><font color="#0000ff"><strong>    </strong></font><font color="#000000">विदेशी दानदाता संस्थाओं के द्वारा 'मानवीय चेहरे वाला वैश्वीकरण' और 'न्यायपूर्ण वैश्वीकरण' की घोषणाएं की जा रही हैं जिनका मकसद वैश्वीकरण विरोधी जन-उभार को दिग्भ्रमित करना है। हालांकि गौण या हाशिए के मसलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कुछ ऊपरी तौर पर प्रगतिशील दिखने वाले अध्ययनों और आन्दोलनों को बढ़ावा दिया जाता है। 'सबऑल्टर्न स्टडीज़' इसका नमूना है। पूंजीवाद के समक्ष जब भी संकट आता है वह अपने बचाव के लिए ऐसे कदम उठाता है । महान आर्थिक मन्दी के बाद के दौर में जिस तरह कल्याणकारी राज्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए ठीक उसी तरह 'मानवीय चेहरे वाला वैश्वी करण' मौजूदा दौर में चलाया जा रहा है ।</font></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">- अफ़लातून , राज्य अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद - उत्तर प्रदेश</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#993366">समाजवादी जनपरिषद की बाबत अविनाश द्वारा उद्धृत जनसत्ता की कतरन में उन्हें कुछ भ्रम हुआ है।भ्रम का मुख्य आधार मेरे इन विचारों और सीएसडीएस से जुड़े दल के सदस्य का होना है। इस बाबत स्पष्ट हो कि:</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">दल के संविधान की 3.1.(2) के अनुसार सक्रिय सदस्य दल द्वारा स्वीकृत आचरण संहिता का पालन करेगा। दल की आचरण संहिता पर हमे फक्र है तथा नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इसे हम अनिवार्य मानते हैं। इसे यहाँ पूरा दे रहा हूँ :</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सक्रिय सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह-</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.1 जनेऊ जैसे जातिश्रेष्ठता के चिह्न धारण नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.2 छुआछूत का किसी भी रूप में पालन नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.3 जाति आधारित गालियों का प्रयोग नहीं करेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">1.4 दबी हुई जातियों को छोड़कर किसी भी अन्य जाति विशेष संगठन की सदस्यता स्वीकार नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">2.1 दहेज नहीं लेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">2.2 औरत की पिटाई नहीं करेगा और औरत(नारी) विरोधी गालियों का व्यवहार नहीं करेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">2.3 एक पत्नी या पति के रहते दूसरी शादी नहीम करेगा और न ही उस स्थिति में बिना शादी के किसी अन्य महिला/पुरुष के साथ घर बसाएगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">3 धार्मिक या सांप्रदायिक द्वेष फैलाने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">4 समाजवादी जनपरिषद के प्रत्येक सदस्य के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह ऐसे किसी गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्था (  NGO ), जो मुख्यत: विदेशी धन पर निर्भर हो,</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">(क) का संचालन नहीं करेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">(ख) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली समिति का सदस्य नहीं होगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">(ग) से आजीविका नहीं कमाएगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">5.1 सदस्यता-ग्रहण/नवीनीकरण के समय अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति व आय की घोषणा करेगा ।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">5.2 अपनी व्यक्तिगत आय का कम से कम एक प्रतिशत नियमित रूप से समाजवादी जनपरिषद को देगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">5.3 विधायक या साम्सद चुने जाने पर अपनी सुविधाओं का उतना अंश दल को देगा जो राष्त्रीय कार्यकारिणी द्वारा तय किया जायेगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff">    उपर्युक्त आचरण संहिता के प्रावधान को न मानना दल की न्यूनतम कसुटी का उल्लंघन माना जाएगा और यह दल द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही का आधार होगा।</font></strong></p>
<p align="left"><strong><font color="#0000ff"></font></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[राजनीति में मूल्य (शेष भाग) : किशन पटनायक]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/04/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97/</link>
<pubDate>Wed, 04 Apr 2007 05:40:11 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: value_based_politics, kishan patanayak
 पिछली प्रविष्ट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/value_based_politics">value_based_politics</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/kishan%20patanayak">kishan patanayak</a></p>
<p align="left"> <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/value_basedpoliticskishan-patanayak/">पिछली प्रविष्टी</a> से आगे : ऊपर की बातों से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि राजनीति में मूल्यों की प्रबलता का होना एक निरन्तर स्थिति नहीं है । यह भी सोचना गलत है कि साधारण मतदाता या जनसाधारण मूल्यों पर बहुत आग्रह रखता है या जनसाधारण के दबाव से ही राजनीति सही दिशा में प्रवाहित होगी ; इतिहास बताता है कि यह काम आम आदमी का दायित्व नहीं है । मूल्यों और दिशाओं का प्रवर्तन बुद्धिजीवी करते हैं - तब करते हैं जब वे या तो सत्य की खोज करते हैं या लोक के प्रति अपने को उत्तरदायी समझते हैं । एक छोटे समूह के द्वारा संगठित-प्रचार होकर ये मूल्य जनसाधारण का समर्थन प्राप्त करते हैं और व्यापक समाज में हलचल पैदा करते हैं । इसी बिन्दु पर जनसाधारण मूल्यों का संरक्षक भी बनता है ।लेकिन जब बौद्धिक समाज में जड़ता आ जाती है तब जनसाधारण पुन: मूल्यों के बारे में उदासीन हो जाता है ।</p>
<p align="left">    उत्तर भारत के मौर्यकाल से हर्षवर्धन तक और गोरे देशों में १७वीं-१८वीं सदी में ज्ञान और धर्म के क्षेत्रों में सांस्कृतिक आन्दोलन की प्रबलता थी । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रथमार्ध में यूरोप की राजनीति में क्रान्तिकारी मानवीय मूल्य स्थापित हुए और बाद में पूरे विश्व में इन मूल्यों का प्रसार हुआ ।कई औपनिवेशिक देशों में साम्राज्यवाद-विरोधी राजनीति के तहत वहाँ के बौद्धिक समूह सक्रिय हुए । इन देशों की राजनीति में साम्राज्यवाद-विरोधी और पूँजीवाद-विरोधी मूल्यों और आदर्शों की स्थापना हुई । भारत में गांधी और समाजवाद के अपने-अपने बौद्धिक वर्ग बने । जब बौद्धिक वर्ग व्यापक ढंग से और निरन्तरता के साथ राजनीति को मूल्यों के द्वारा प्रभावित करता है तब जनसाधारण भी मूल्यों के बारे में मुखर होता है । हाल के चुनाव में यह कितना हास्यास्पद लगता था कि कुछ बुद्धिजीवी लोग चुनाव घोषित हो जाने और नामांकन हो जाने के बाद भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रत्याशियों की पहचान करवाते थे । बुद्धिजीवियों के लिए यह जीवन भर का काम है, चुनाव के दिनों में वे अपना मत ठीक ढंग से दे दें , तो काफी है । प्रसिद्ध व्यावसायिक पत्रिका <em>आउटलुक </em>ने कई नामी-गिरामी बुद्धिजीवियों को लेकर प्रत्याशियों की नैतिकता की जाँच करने की एक टोली बनाई थी । लेकिन इनमें से एक भी आदमी स्पष्ट शब्दों में नहीं बताता कि उदारीकरण और ग्लोबीकरण से भारत की आम जनता को क्या लाभ होगा । इस टोली का कोई भी व्यक्ति यह नहीं बताता कि लगातार बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी को कैसे रोका जाए और बुद्धिजीवियों की वेतनवृद्धि क्यों वांछनीय है ।धन के केन्द्रीकरण का भ्रष्टाचार और अपराध से कोई सम्बन्ध है या नहीं ? अपने युग के ज्वलन्त और बुनियादी सवालों पर जिन बुद्धिजीवियों का कोई स्पष्ट मत नहीं है वे चले हैं चुनाव-राजनीति को प्रभावित करने ! पक्षधर बनकर या अपना खेमा गाड़कर ही कोई बौद्धिक समूह चुनाव को प्रभावित कर सकता है ।</p>
<p align="left">    असल में राजनैतिक अनैतिकता की वृद्धि का युग समाज में बौद्धिक पतन का भी युग होता है । पिछले कई सालों में भारत की ज्ञान-संस्थाओं की सबसे बड़ी घटना है प्रोफेसरों और विशेषज्ञों के रहन-सहन और वेतन-भत्तों में अभूतपूर्व वृद्धि । उनकी जड़ता और उदासीनता के कारण देश के साधारण जनों का जो अपना पारम्परिक ज्ञान और विवेक था वह भी नष्ट हो गया है और कोई नया मूल्य भी स्थापित नहीं हो पाया है ।</p>
<p align="left">    फिर भी चुनाव के दिनों में मूल्यों की बात इसलिए होती है कि राजनेता या उसका समर्थक - बुद्धिजीवी जब जनसाधारण के पास जाएगा तो मूल्यों के बिना कोई खुला संवाद  हो नहीं सकता है । अगर राजनीति में जनसाधारण नहीं होता तो ये लोग मूल्यों की बात पाखंड के स्तर पर भी नहीं करते । यह सत्य है कि राजनैतिक अस्थिरता जनसाधारण को पसन्द नहीं है , देश के लिए अच्छी चीज नहीं है । लेकिन 'स्थिरता' कोई ऐसा मूल्य नहीं है जो कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनने से लोगों को प्राप्त हो जाएगा । अस्थिरता की एक प्रक्रिया चल रही है ; इस प्रक्रिया को कहाँ रोका जाएगा ? कहाँ-कहाँ रोकने पर पाँच-दस साल के बाद स्थिरता आयेगी । उन मूल्यों को स्थापि करने का वायेदा कोई भी बड़ा रजनैतिक दल नहीं कर रहा है । चुनाव के बाद दल-बदल आधारित सरकार हम नहीं बनायेंगे - यह वायदा कोई नहीं करता ।तब स्थिरता कैसे लाएँगे ? किसी भी खेमे के घटक यह वायदा नहीं करते कि जिस खेमे की ओर से चुनाव लड़ते हैं , अगले चुनाव तक उसी खेमे में रहेंगे ? अगर खेमा बदलने की भी गुंजाइश है तो स्थिरता कैसे आयेगी ? अन्ततोगत्वा 'राजनैतिक स्थिरता' और 'साम्प्रदायिक शान्ति' आम जनता की आर्थिक सुरक्षा पर ही टिकी रहती है । आर्थिक गैर-बराबरी और असुराक्षा बढ़ती रहेगी और साम्प्रदायिक शान्ति कायम रहेगी , यह कैसे सम्भव है ? करोड़ों लोग बेकार होते जाएँगे , विस्थापित होते रहेंगे तो राजनैतिक स्थिरता का आधार क्या होगा ?</p>
<p align="left">    बेरोजगारी , अशिक्षा आदि प्रश्नों का सीधा सम्बन्ध आर्थिक क्षमता से है । मार्च १९९८ के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने १० वर्षों के कुछ लक्ष्य घोषित किए ? बेकारी १० वर्षों में पूरी तरह समाप्त हो जाएगी । इतनी पूँजी और बजट का व्यय कहाँ से आएगा ? वेतन वृद्धि से ५० से १०० हजार करोड़ रु. का जो अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा , वह पैसा कहाँ से आएगा ? क्या इसके बाद भी बजट में में इतना पैसा रह जाएगा जिससे भाजपा सरकार नए रोजगार और सम्पूर्ण प्राथमिक शिक्षा की योजनाएँ बना पाएगी ? वित्तीय इन्तजाम का उपाय बताये बगैर लोककल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करना विशुद्ध बेईमानी है । वेतन-वृद्धि को रोककर उसी पैसे को या तो प्राथमिक शिक्षा या रोजगार विस्तार के लिए लगाया जा सकता है । कोई खेमा इसके लिए तैयार नहीं है । यानी उनकी सरकारें न बेरोजगारी दूर करने के बारे में गम्भीर हैं , न प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के बारे में ।</p>
<p align="left">    जब अच्छाई कहीं भी नहीं होती है , और नए सिरे से अच्छाई पैदा करने की शक्ति मुख्य नायकों में नहीं होती है तब एक तरकीब निकलती है : बुराइयों को छोटी और बड़ी में बाँटने की । वैसे , बुराई से जुड़ना एक मानवीय स्थिति है ।व्यवहार के हर मोड़ पर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है जिसमें किसी न किसी बुराई के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से समझौता करना होता है । लेकिन छोटी बुराई का एक अपना दर्शन है ।अगर कोई बड़ी अच्छाई लाने का जोखिम भरा काम करने जा रहे हैं तभी आपका यह नैतिक अधिकार होता है कि किसी छोटी बुराई का सहारा वक्ती तौर पर ले लें ।जहाँ अच्छाई की नयी धारा प्रचलित करने का कोई संकल्प या साधना नहीं है ही नहीं , वहाँ छोटी बुराई की बात केवल अपनी अवसरवादी राजनीति को जारी रखने का बहाना है ।इसका एक दुष्चक्र बनता है । छोटी बुराई का सहारा लेते-लेते छोटी बुराई खुद एक बड़ी बुराई हो जाती है और आप बड़ी बुराई को छोटी समझने लगते हैं ।</p>
<p align="left">    १९६७ में कांग्रेस को बड़ी बुराई मानकर गैर-कांग्रेसवाद की रणनीति अपनाई गई थी । इस रणनीति के प्रवर्तकों ने सोचा था कि समाजवाद की राजनैतिक ताकत को बढ़ाने के लिए यह एक वक्ती कौशल है । जैसे-जैसे समाजवाद का अपना जनाधार सशक्त और व्यापक होता जाएगा , वैसे-वैसे छोटी बुराई और भी छोटी हो जाएगी । समाजवादियों और प्रगतिशीलों को इस रणनीति से बहुत फायदा हुआ ।उनको शक्ति बढ़ाने का बहुत मौका मिला - १९६७ से १९९७ तक , तीस साल का मौका मिला । लेकिन समाजवादियों और प्रगतिशीलों ने इस मौके का इस्तेमाल किया सत्ता-भोग के लिए , जनाधार बढ़ाने के लिए नहीं ।जन संघ उर्फ भारतीय जनता पार्टी ने इस समय का इस्तेमाल जनाधार बढ़ाने के के लिए किया । फलस्वरूप ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है कि समाजवादियों और प्रगतिशीलों का खेमा एकदम शक्तिहीन हो गया है । (समाप्त)</p>
<p align="left"><strong>स्रोत - सामयिक वार्ता , फरवरी , १९९८.</strong></p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%9f/</link>
<pubDate>Mon, 02 Apr 2007 14:00:38 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: value_based_politics, kishan patanayak
    राजनीति एक व्]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/value_based_politics">value_based_politics</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/kishan%20patanayak">kishan patanayak</a></p>
<p>    राजनीति एक व्यवहार है । जैसे-जैसे किसी राजनैतिक व्यक्ति या समूह की क्षमता और प्रभाव बढ़ने लगता है , उसको अपने आदर्श और नीति का कार्यरूप बतलाना पड़ता है । सिद्धान्त और व्यवहार में तालमेल रखना एक कठिन काम प्रतीत होने लगता है । सत्ता से वह जितना दूर रहेगा उतना वह आदर्श और नैतिकता की बात करेगा । प्रभाव बढ़ने पर और सत्ता हासिल करना सम्भव दिखाई देने पर उसकी असली परीक्षा शुरु होती है । आदर्श की चुनौती और स्खलन का आकर्षण - इन दो पाटों के बीच विवेकशील राजनेता सावधान रहता है । सत्ता से दूर रहते समय उसकी जो प्रतिबद्धताएँ और नैतिक संस्कार बन जाते हैं , सत्ताभोग के काल में उसके लिए कवच बनते हैं । इसलिए लम्बे समय तक सत्ता के पदों पर बना रहना अच्छा नहीं है । सफल और प्रभावी राजनेताओं को चाहिए कि वे स्वेच्छा से कुछ अरसे के लिए सत्ता की इच्छा पर संयम रखें । सत्ता की इच्छाविहीन राजनीति में कोई रस नहीं होता है ; मगर सत्ता की इच्छा पर संयम न होने से राजनीति की नैतिक प्रेरणा नष्ट हो जाती है ।</p>
<p>    अगर प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने १८ साल के प्रधानमंत्रित्व के बीच कभी पाँच या सात साल का सत्ता पद से सन्यास लिया होता तो शायद वे आज भी एक आलोक-स्तम्भ बने रहते । सत्तापद पर चिपके रहने के कारण उनकी क्या दुर्दशा हुई है यह हाल के चुनावों में स्पष्ट हो रहा है । उनकी दौहित्र-वधु सोनिया के कांग्रेस के मुख्य प्रचारक होने के बावजूद उनके भाषण में कहीं यह बात नहीं आती है कि नेहरू की सरकारी नीतियों से देश को सही मार्गदर्शन मिला था । एक व्यक्तित्व के तौर पर इन्दिरा गांधी या राजीव गांधी की कोई तुलना जवाहरलाल नेहरू से नहीं हो सकती है । लालबहादुर शास्त्री से भी नेहरू बहुत बड़े आदमी थे। लेकिन आज के चुनाव में शास्त्री , इन्दिरा , राजीव , इन सबका नाम ले कर वोट माँगा जा सकता है । नेहरू के नाम से कोई वोट नहीं माँगता है । यह कितना विचित्र है ?</p>
<p>    राजनीति में व्यवहार का पलड़ा कभी - कभी इतना भारी होता है कि मूल्यों से समझौता न करनेवालों को जनता भी हिकारत भरी नजर से देखती है । मानो बिलकुल शुद्ध होना अव्यावहारिकता है और इसलिए राजनीतिक अक्षमता का परिचायक है । मूल्यों और नैतिकता के बारे में जनसाधारण उतना कठोर नहीं है जितना कि हमलोग अकसर सोचते हैं । जनसाधारण राजनीति से कुछ परिणाम देखना चाहता है । आदर्शवादी व्यक्तियों और समूहों से परिणामों की उम्मीद नहीं जगती है तो आदर्श के प्रति वह उदासीन हो जाता है । जनसाधारण राजनीति से कैसा परिणाम चाहता है ? क्या जनसाधारण राजनीति में नैतिकता का नियामक बन सकता है ? इसका जवाब आज के राजनैतिक अध्ययनों-चिन्तनों से नहीं मिलता है ।</p>
<p>    समझ लेना चाहिए की जनसाधारण की उपस्थिति सार्वजनिक जीवन में एक नियामक का काम नहीं करती है । लोगों की भावना सिर्फ यह होती है कि अनैतिक काम बहुत अधिक नहीं होने चाहिए । अनैतिकता बहुत अधिक दिखाई नहीं देनी चाहिए ।अगर दो प्रतिद्वन्द्वी है और दोनों पराक्रमी हैं और उनमें से एक ज्यादा कलंकित है तो लोग अपेक्षाकृत साफ-सुथरे आदमी को पसन्द करेंगे । इस अर्थ में जनसाधारण की नैतिकता के बारे में एक नियामक भूमिका है । चूँकि जनसाधारण उपस्थित है और राय देने वाला है इसलिए भी राजनेता उसकी नैतिकता सम्बन्धी भावनाओं को अपील करने की कोशिश करते हैं । इसी तरह जनसाधारण एक नियामक है । जनसाधारण की उपस्थिति नहीं रहेगी तो शायद नैतिकता का प्रसंग भी नहीं उठेगा ।इस सीमित दायरे में जनसाधारण सार्वजनिक नैतिकता का नियामक है।</p>
<p>    जनसाधारण पहले पराक्रम को देखता है , बाद में नैतिकता को । सामर्थ्य या पराक्रम हासिल करने के नियम और शुद्धता हासिल करने के नियम अलग-अलग होते हैं । शुद्धता के द्वारा कोई पराक्रमी नहीं बन पाता है । गांधीजी पराक्रमी थे , मगर शुद्धता के कारण नहीं ; पराक्रम अर्जन करने के उनके काम अलग थे , और शुद्ध बनने के अलग । नैतिकता और पराक्रम का संयोग उनमें १९१६ से १९४५ तक रहा । १९४५ के बाद उनका पराक्रम कम हो गया ।</p>
<p>    पराक्रम प्राप्त करने के महान उपाय भी होते हैं , जोखिम भरे काम होते हैं , लेकिन बहुत छोटे-छोटे रास्ते भी होते हैं । धनी और सम्भ्रान्त लोग राजनीति में जल्द सफल हो जाते हैं।कुछ लोग चोरी करके धनी बनते हैं , धन के सहारे राजनीति करते हैं और सम्भ्रान्त बन जाते हैं । तीसरे कदम पर वे धन और आभिजात्य के बल पर राजनीति की चोटी पर जाने का दाँव लगाते हैं । निर्धनों और शूद्रों के लिए राजनीति में बने रहना बहुत कठिन है।इसलिए भी शूद्र राजनेता नैतिकता के प्रश्न को गौण कर देता है ।</p>
<p>    पराक्रमी होने के लिए ये सारे छोटे रास्ते हैं । ये रास्ते प्राचीन काल से हैं । इस पराक्रम से सत्ता प्राप्ति हो सकती है - राष्ट्र या जनता को महान नहीं बनाया जा सकता है ।</p>
<p>    राजनीति का स्वर्णयुग यानी पराक्रम और मानवीय मूल्यों का संयोग तब होता है जब किसी राज्य या भूभाग में धर्म , संस्कृति , ज्ञान , अर्थनीति या राजनीति के क्षेत्र में मूल्यों का आन्दोलन होता है । मूल्यों का यह आन्दोलन राजनीति के बाहरी क्षेत्रों में होने पर भी राजनीति इसके द्वारा प्रभावित होती है , नए मूल्यों को राजनीति में स्थापित करने की एक धारा राजनीति के अन्दर भी सबल होने लगती है । भारत के बौद्ध युग और गांधी युग की राजनीति में मानवीय मूल्यों का स्तर अन्य युगों की तुलना में उच्चतर था । जिसको भारत में गांधी युग कहा जाएगा वह विश्व के लिए समाजवादी आन्दोलन के विकास का भी युग था। इस संयोग का प्रभाव इतना अधिक था कि पूँजीवादी और प्रतिगामी विचारों के राजनैतिक दलों को भी कुछ मानवीय तथा प्रगतिशील मूल्यों के अनुकूल अपनी घोषणाएँ करनी पड़ती थीं। नेहरू-इन्दिरा की कांग्रेस अपने को समाजवादी कहती थी , यहाँ तक कि भारतीय जनता  पार्टी ( जनसंघ ) ने एक बार अपने को ' गांधीवादी समाजवादी ' घोषित कर दिया था । 'आखिरी आदमी '  - जो गांधीजी का शब्द था , अभी हाल तक राजनैतिक घोषणापत्रों पर मँडराता था । <strong>( अगली प्रविष्टी में जारी ) ( स्रोत - सामयिक वार्ता , फरवरी १९९८ )</strong></p>
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