फिर वही दर्द, वही शाम है लबों पर फिर तेरा नाम है ज़िन्दा हूँ पर ज़िन्दगी नहीं सीने में साँसों का ताम-झाम है नतीजा-ए-इम्तिहाँ कुछ नहीं मेरा यह कैसा अन्जाम है मंज़िल से है अब तलक फ़ासला मेरी हर कोशिश नाकाम … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 8 months ago: फिर वही दर्द, वही शाम है लबों पर फिर तेरा नाम है ज़िन्दा हूँ पर ज़िन्दगी नहीं सीने में साँसों का ताम-झ … more →
विनय wrote 1 year ago: You always compared and found me better Like all other, this truth is bitter I know you are envious … more →