यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं ज़मीने-वक़्त पर दूर तक बिखरे हैं इन्हें मत … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 week ago: यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं ज़म … more →
विनय wrote 2 months ago: न वह कभी आँखों से उतारा ही गया और न कभी … more →
विनय wrote 4 months ago: मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है, ल … more →
विनय wrote 4 months ago: न कोई शिकायत है तुझसे न कोई गिला है तुम … more →
विनय wrote 7 months ago: जब भी तेरा नाम लेती हैं बहुत ख़ुश होती … more →
विनय wrote 7 months ago: जीज़स से पूछेंगे तुमको बनाया कैसे कम्प … more →
विनय wrote 9 months ago: मेरा दर्द मेरा दु:ख मेरा अपना … more →
विनय wrote 10 months ago: तुमको ज़िन्दगी की हर ख़ुशी मिले तेरे लब … more →
विनय wrote 1 year ago: बहुत उदास-सी एक शाम बैठी है मेरे साथ अप … more →