चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हारे होकर भी और इस लड़त में जब हमारी कामयाबी का रास्ता खुला और वे शब्द लोगों के घरों और दिलो-दिमाग़ में … more →
यही है वह जगहMaheep Saraf wrote 3 weeks ago: तेरे चेहरे पर ये गुस्सा ग़ज़ब हे, बहुत सताता हे याद तो इसकी भी आती हे, तेरे जाने के बाद — … more →
अफ़लातून wrote 1 month ago: चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हा … more →
Rahul Katyayan wrote 1 month ago: मैं क्यों हारूँगा किस्मत से जबकि मुझे ये ऐतबार है मेरी हर हार मैं छिपी खुदा तेरी भी हार है … more →
Rahul Katyayan wrote 1 month ago: मैं क्यों हारूँगा किस्मत से जबकि मुझे ये ऐतबार है मेरी हर हार मैं छिपी खुदा तेरी भी हार है … more →
Maheep Saraf wrote 8 months ago: खोया खोया हूँ कई दिनों से, किस वज़ह से मुझे पता नहीं घना अंधेरा छाया हे नभ में, पर दिखती कोई घटा नही … more →
Maheep Saraf wrote 8 months ago: बस एक बार बता दे ग़लती मेरी, चाहे फिर कभी बात ना हो मुस्करा दे एक बार अब तो, इस तरह मुझसे नाराज़ ना … more →
Maheep Saraf wrote 8 months ago: अब समझ में आया लोग चाँद को खूबसूरत क्यों कहते हैं शायद मेरी तरह वो भी उसमे तेरी ही झलक को देखते हैं … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (कविता – स्तेफ़ान स्पेंडर) बंदूकें धन के अंतिम कारण के हिज्जे बताती हैं बसंत में पहाड़ों पर सी … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (लेख – अरुंधती रॉय) अभी हाल ही में एक युवा कश्मीरी मित्र से मेरी बात हो रही थी कश्मीर में जीवन … more →
Maheep Saraf wrote 10 months ago: पल पल हर्षित , हर पल गर्वित नई उड़ान और नयी अभिलाषा कर्म प्रतीक हाथों के संग हम लिखें नवीन जीवन परिभ … more →
Maheep Saraf wrote 10 months ago: मैं नहीं जानता कहाँ जा रही हे ये जिंदगी क्यों ये धड़कने मेरी आवाज़ मुझको देती हे क्यों साँसों मे मेर … more →
Maheep Saraf wrote 10 months ago: मेरी तन्हाई का उनको अहसास कहाँ हे छोड़ कर अकेले हमको वो मस्त वहाँ हे जीयें या मरें उनकी बाला से हम प … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (कविता – स्तेफ़ान स्पेंडर) मैं हमेशा उनके बारे में सोचता हूँ जो सच में महान थे मैं हमेशा उनके … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (कविता – हैरॉल्ड पिंटर) हँसी थम जाती है पर कभी नहीं होती खत्म हँसी झुठाने में लगा देती है अपना … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (लेख – हावर्ड ज़िन – 09 दिसंबर, 2006) यह निबंध हावर्ड ज़िन की सिटी लाइट्स द्वारा प्रकाशि … more →
Maheep Saraf wrote 10 months ago: हर महफ़िल मे साथ ले जाता हूँ काफिला यादों की उनकी और वो कहते हें कि हम उन्हे याद नहीं करते सामने आते … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (कविता – हैरॉल्ड पिंटर) लाश कहाँ मिली थी? लाश किसको मिली थी? लाश जब मिली तब क्या वह मृत थी? ला … more →
anileklavya wrote 10 months ago: (कविता – हैरॉल्ड पिंटर) मौत की उम्र तो हो चली है पर उसके पंजे में अब भी दम है पर मौत आपको निहत … more →
anileklavya wrote 11 months ago: (लेख – पी. साईनाथ – 03 अप्रैल, 2006) किसानों द्वारा आत्महत्याओं की संख्या इस हफ़्ते 400 … more →