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	<title>lohia &amp;laquo; WordPress.com Tag Feed</title>
	<link>http://wordpress.com/tag/lohia/</link>
	<description>Feed of posts on WordPress.com tagged "lohia"</description>
	<pubDate>Sun, 07 Sep 2008 22:02:19 +0000</pubDate>

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<title><![CDATA[छात्रसंघ : घूस दो ,बदनाम करो , निकाल फेंको]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/?p=187</link>
<pubDate>Wed, 14 May 2008 04:10:46 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[ पिछला भाग   
समाजवादी आन्दोलन से प्रभ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;"> <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2008/05/13/studentsunion/" target="_blank"><span style="text-decoration:underline;">पिछला भाग</span> </a>  </p>
<p style="text-align:left;">समाजवादी आन्दोलन से प्रभावित काशी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के नेतृत्व में १९६७ में <strong>' अंग्रेजी हटाओ , भारतीय भाषा लाओ ' </strong>चला । एक बुनियादी सवाल पर व्यापक जन जागृति के साथ -साथ इसी आन्दोलन के दौर में पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघों की स्थापना भी हो गयी । सातवें दशक में छात्रसंघों और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों के निमंत्रण पर ही जयप्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन को अपनी शर्तों पर नेतृत्व देना स्वीकार किया । आंतरिक आपातकाल के दौरान सभी मौलिक अधिकारों के निलम्बन के क्रम में छात्रसंघों पर भी राष्ट्रव्यापी प्रतिबन्ध रहा । असम के समस्त महाविद्यालयों के छात्रसंघों के महासंघ ' अखिल असम छात्रसंघ ' द्वारा छेड़ा गया आन्दोलन बुनियादी प्रश्नों से जुड़ा अंतिम सकारात्मक जन आन्दोलन था । इसके बाद की युवा पीढ़ी के नसीब में मंडल विरोधी तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस जैसी संविधान विरोधी विकृतियाँ ही रहीं हैं ।</p>
<p style="text-align:left;">    छात्रसंघों की सकारात्मक भूमिकाओं के साथ यह भी गौरतलब है कि व्यापक राजनीति में जाति , पैसे  और अपराध का वर्चस्व बढ़ने के साथ - साथ छात्र राजनीति भी इन व्याधियों से ग्रस्त हुइ है । प्रतिबद्धताविहीन राजनीति का बढ़ना छात्र हितों के भी प्रतिकूल है । छात्र राजनीति के भ्रष्ट नेतृत्व वर्ग की आड़ में शिक्षा जगत के व्यवस्थापकों को निरंकुश और अलोकतांत्रिक कदम उठाने का मौका मिल गया । १९८३ में माधुरी बेन शाह की अध्यक्षता में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जाँच हेतु बनी समिति ने यहाँ तक संस्तुति कर दी विश्वविद्यालय की व्यवस्था में छात्रसंघों का कोई स्थान नहीं है । छात्रसंघ पदाधिकारियों के प्रति <strong>' घूस दो , बदनाम करो , निकाल फेंको ' </strong>की नीति अपना कर काशी विश्वविद्यालय में छात्रसंघ १९८५ से चार वर्षों तक निलंबित रखा गया । प्रशासन द्वारा छात्रसंघ पदाधिकारियों को दिए गए भारी भरकम अनुदानों का विवरण  विञापन के रूप में राष्त्रीय समाचार पत्रों में छपवाया गया । सच्चाई यह थी कि इन आरोपों का जिम्मेदार और भागीदार भ्रष्ट प्रशासन भी था ।</p>
<p style="text-align:left;">    छात्रसंघों की कार्यप्रणाली में जहां छात्र संसद और छात्रों की साधारण सभा ( जनरल बॉडी ) की भूमिका गौण रखकर पदाधिकारियों के हाथों में अधिकार केन्द्रित कर दिये जाते हैं वहीं यह भ्रष्टाचार संभव होता है । दरअसल , विश्विद्यालय प्रशासन के भ्रष्ट तत्व भी चाहते हैं हैं कि छात्रसंघ के अधिकार विकेन्द्रीकृत न हों क्योंकि छात्र संसद अथवा साधारण सभा के साथ सौदेबाजी मुमकिन नहीं होती । प्रशासन के लिए सिर्फ दो तीन पदाधिकारियों के साथ सौदेबाजी आसान होती है । काशी विश्वविद्यालय छात्र संघ निर्वाचन में १९९७ के पूर्व कभी भी पुलिस हस्तक्षेप की नौबत नहीं आई थी । चुनाव घोषित करके न कराने की स्थिति बनाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिला प्रशासन और निजी सुरक्षातंत्र के सहयोग से दमन की पराकाष्ठा कर दी । विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार प्रशासनिक दमन के फलस्वरूप दो छात्रों की हत्या हुई । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अपराध अनुसन्धान विभाग की जाम्च के पश्चात विश्वविद्यालय के तत्कालीन चीफ प्रॉक्टर  तथा एक पुलिस उपाधीक्षक समेत कई पुलिस तथा सुरक्षाकर्मियों पर हत्या का आरोप पत्र दाखिल हो चुका है । तत्कालीन कुलपति ने अपने कार्यकाल के अन्तिम दिन आरोपी चीफ़ प्रॉक्टर को विधिक सहायता हेतु एक बड़ी धनराशि देने का आदेश दे दिया ।</p>
<p style="text-align:left;">    जगतीकरण के इस दौर में उच्च शिक्षा के अवसरों को संकुचित करने तथा ववसायीकरण की दिशा में पहल करने के उद्देश्य से भारी फीस वृद्धि और 'पेड सीट' शुरु करने के निर्णय बिना प्रतिवाद लागू हो जाने में छात्रसंघ का निलंबन मददगार साबित हुआ है । <strong>परिसर में छात्र संगठनों द्वारा चर्चा-गोष्ठियाँ तक प्रतिबन्धित हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा संघ परिवार द्वारा आयोजित गोष्ठियाँ इसका अपवाद हैं ।</strong> यह भी उल्लेखनीय है कि इस धारा के छात्र संगठन द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किए गए छात्र संघ संविधान संशोधन का उच्च न्यायालय में सिर्फ इस लिए समर्थन किया गया ताकि चुनाव में हारा हुआ उसका उम्मीदवार कुर्सी पा सके । ( आइसा के आनन्द प्रधान चुनाव में जीते थे और विद्यार्थी परिषद के हारे हुए प्रत्याशी देवानंद सिंह ने उच्च न्यायालय में प्रशासन के पक्ष का समर्थन किया था। ) </p>
<p style="text-align:left;">     छात्रों को अपनी लोकतांत्रिक भावनाओं व आकांक्षाओं को प्रकट करने का छात्रसंघ जैसा मंच जब नहीं मिल पाता है तब अपराधिक एवं जातिगत गिरोह प्रभावी हो जाते हैं । जन राजनीति में अपराधीकरण का समाधान विधान सभा , लोकसभा निलंबित करके संभव है क्या ? <strong>छात्रों के व्यापक हस्तक्षेप से ही जाति , पैसे और गुण्डागर्दी का इलाज संभव है । डॉ. लोहिया के शब्दों में जब विद्यार्थी राजनीति नहीं करते तब वे सरकारी राजनीति को चलने देते हैं और इस तरह परोक्ष में राजनीति करते हैं ।</strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><em>- अफ़लातून.</em></strong></p>
<p style="text-align:left;"><strong><em>अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश .</em></strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[नेपाल के युवजनों से राममनोहर लोहिया]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/?p=178</link>
<pubDate>Sun, 27 Apr 2008 11:48:33 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[[  जुलाई १९६७ में बनारस में हुए नेपाल क]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><em><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/files/2008/04/ram_mohan_lohiya.jpg"></a><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/files/2008/04/ram_mohan_lohiya1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-180" src="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/files/2008/04/ram_mohan_lohiya1.jpg" alt="" width="350" height="425" /></a>[  जुलाई १९६७ में बनारस में हुए नेपाल के युवा समाजवादियों के सम्मेलन को डॉ. लोहिया ने यह सन्देश दिया था । प्रदीप गिरि , केदारनाथ श्रेष्ठ और नेमकान्त दाहल सम्मेलन के आयोजक थे । लोकतंत्र के करीब आने के बाद शायद यह सन्देश पहली बार प्रसारित हो रहा है ।</em></p>
<p><em>    नेपाल के बारे में डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने जो कुछ कहा - लिखा उनमें से यह आखिरी सन्देश है । नेपाल के जनसंघर्ष की अन्तर्पीड़ा को इस सन्देश की सदीच्छा शायद अब पूरी होगी ।  ]</em></p>
<p> </p>
<p><em>    </em></p>
<p><em>    </em></p>
<p><em></em></p>
<p><em></em></p>
<p><em></em></p>
<p><em>   </em> नेपाली युवजन का एक जगह इकट्ठा होना ही बड़ी बात है । जब राज्य स्वच्छन्द हो जाता है , उसे किसी भी तरह के समूह से डर लगने लगता है । मेरा अन्दाज है कि पशुपतिनाथ की भीड़ से भी वर्तमान राजा को डर लगता होगा । ऐसी अवस्था में जनतन्त्र और समाजवाद का उद्देश्य लेकर जो भीड़ बनारस में इकट्ठा हो रही है वह नेपाली इतिहास के लिए निर्णायक हो सकती है ।</p>
<p>   वर्तमान राजा के पिता ने जब वे राणाशाही के कैदी जैसे थे , मुझसे एक बार पुछवाया था कि क्या किसी जुलूस के नेतृत्व करने का उनका समय आ गया है । राणा और राजा की लड़ाई का आज जैसा जनतन्त्र विरोधी नतीजा निकलेगा ऐसा अन्दाज हम नहीं लगा सके थे । खैर , कोई बात नहीं , क्योंकि इतिहास बिल्कुल सीधी चाल नहीं चलता थोड़े बहुत उलट फेर या आगे पीछे ही करते हैं । एक बात मैं वर्तमान राजा को जरूर कहना चाहूँगा । बेचारे मानें न मानें , आज वे गद्दी पर बैठ हैं उसमें थोड़ा बहुत मेरा भी हाथ रहा है । चाहे इसी नाते मेरी वे सलाह मानें कि नेपाल के नागरिकों को भाषण और संगठन की आजादी मिले बाकी चीजें बाद में होती रहेंगी ,  उनकी और जनता की पारस्परिक रजामन्दी से ।</p>
<p>    नेपाल के युवजनों को मैं सलाह दूँगा कि जनतन्त्र और समाजवाद ऐसे देवता हैं कि जिन पर कभी - कभी बड़ी आहुति चढ़ानी पड़ती है । ऐसा कुछ, थोड़ा बहुत नेपाल के युवजनों ने किया है । लेकिन वह बहुत कम है । देखों योरोप के युवजनों को और उनकी संकल्प शक्त को । संकल्प चाहे छोटा करो लेकिन उसके हासिल करने में अपना तन मन न्योछावर करने की शक्त हासिल करो । मैं बहुत चाहता था आप लोगों के बीच आता लेकिन इसी संदेश से संतोष कर रहा हूँ ।</p>
<p><strong> डॉ. राममनोहर लोहिया  ,                        जुलाई १९६७ .</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (७) : अफ़लातून]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/?p=297</link>
<pubDate>Wed, 23 Apr 2008 09:48:27 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में गांधी ज]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में गांधी जी की धारा के दो प्रमुख उत्तराधिकारियों - डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों में सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रमों को नजरअन्दाज करने पर बहस अपूर्ण रहेगी । संपूर्ण क्रांति के आन्दोलन के बीच लोकनायक जयप्रकाश की उपस्थिति में तोड़ी गयी जनेऊ का ढेर लग जाता था तथा हजारों नवयुवकों ने जातिसूचक चिह्न त्याग दिये थे । समाजिक विभाजन कम से कम हो इसलिए डॉ. लोहिया ने 'साठ संकड़ा' के सिद्धान्त में औरत , आदिवासी , दलित और पिछड़ों को एक ही राजनैतिक परिभाषा में संगठित करने के प्रयास किए । उनकी पार्टी में हर स्तर साठ सैंकड़ा का सिद्धान्त लागू होने के कारण दलितों और पिचड़ों का नेतृत्व भी पैदा हुआ ।</p>
<p style="text-align:left;">    यह निश्चित तौर पर स्पष्त रहना चाहिए कि इस बहस में गांधी जी की पैरवी में मुखर हो रहे धार्मिक सहिष्णुता विरोधी दल तथा नव-साम्राज्यवाद का बंदनवार सजा कर स्वागत करने वाले दल के कंधे से कंधा मिलाना जयप्रकाश , विनोबा तथा लोहिया के अनुगामियों के लिए संभव नहीं है । इसे प्रकार अम्बेडकरवादी स्मूहों को भी नयी आर्थिक नीति के सन्दर्भ में एक स्पष्ट सोच प्रकट करनी होगी ।</p>
<p style="text-align:left;">    गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में हिस्सा लेने वालों के लिए गांधी जी की यह सलाह सर्वथा उचित है - <strong>" हम बड़ों के बल का अनुसरण करें , उनकी कमजोरी का कभी नहीं । बड़ों की लाल आँखों में अमृत देखें , उनके लाड़ से दूर भागें , मोहमयी दया के वश होकर वे बहुत कुछ करने की इजाजत दें , बहुत कुछ करने को कहें , तब लोहे जैसे सख्त बनकर उससे इनकार करें । मैं एक बार यदि कहूँ कि हरगिज झूठ न बोलना , मगर मुश्किल में पड़कर झूठ के सामने आँखें बन्द कर लूँ , तब मेरी आँखों की पलकों को पकड़कर जोर से खोल देने में तुम्हारी भक्त होगी , मेरे इस दोष को दरगुजर करने में द्रोह होगा । " ( </strong><em>पत्र - मगनभाई देसाई को, महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन, पृ. ११२ </em><strong> ) *</strong></p>
<p style="text-align:left;"> </p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA[Ubuntu linux innovation in UP and Bihar]]></title>
<link>http://uplinux.wordpress.com/?p=11</link>
<pubDate>Sat, 22 Mar 2008 07:04:56 +0000</pubDate>
<dc:creator>uplinux</dc:creator>
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<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश व बिहार में - लाइनक्स उबु]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>उत्तर प्रदेश व बिहार में - लाइनक्स उबुँटू व आई टी रचन शीलता</b> :</p>
]]></content:encoded>
</item>
<item>
<title><![CDATA['पूंजी',रोज़ा लक्ज़मबर्ग,लोहिया : ले. सुनील (3)]]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/09/01/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a5%9b%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a5%9b%e0%a4%ae%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9/</link>
<pubDate>Sat, 01 Sep 2007 12:46:42 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[   
Technorati tags: पूंजी, रोज़ा लक्समबर्ग, लोहिय]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">   </p>
<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a5%80">पूंजी</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a5%9b%e0%a4%be%20%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97">रोज़ा लक्समबर्ग</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be">लोहिया</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/capital">capital</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/rosa%20luxemberg">rosa luxemberg</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/lohia">lohia</a></p>
<p align="left">निश्चित रूप से कार्ल मार्क्स का ध्यान इस ओर गया था और उन्होंने अपने ग्रन्थ <strong>'पूंजी' </strong>में औपनिवेशिक लूट का विस्तृत वर्णन किया है । लेकिन इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को उन्होंने अपने विश्लेषण का अंग नहीं बनाया । बाद में रोज़ा लक्ज़मबर्ग ने कुछ हद तक इस कमी को पूरा करने की कोशिश की । लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि उपनिवेशों की लूट और शोषण , पूंजीवाद के विकास तथा औद्योगीकरण का एक प्रमुख आधार है , तो दुनिया के गैर - यूरोपीय देशों के लिए तो यह रास्ता खुला ही नहीं है । वे कहाँ के उपनिवेश लाएँगे ? इसलिए भारत सहित एशिया-अफ़्रीका-लातिनी अमेरिका के तमाम देशों के लिए पूंजीवादी विकास और औद्योगीकरण का विकल्प मौजूद ही नहीं है । वहाँ सीमित और अधकचरे किस्म का वैसा ही औद्योगीकरण हो सकता है , जैसा अभी तक हुआ है ।लेकिन आधुनिक औद्योगिकरण की औपनिवेशिक शोषण की अनिवार्यता इतनी गहरी है व अन्तर्निहित है कि इसके लिए भी इन देशों के बाहर उपनिवेश नहीं मिले , तो देश के अंदर उपनिवेश विकसित करने पड़े ।<a href="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/09/windowslivewritercf7de9fa4fa1-5ea4rosa3.gif"><img width="144" src="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/09/windowslivewritercf7de9fa4fa1-5ea4rosa-thumb1.gif" height="240" /></a> इन देशों के पिछड़े इलाके , आदिवासी अंचल , गाँव और खेती आधारित समुदाय , एक प्रकार के ' आंतरिक उपनिवेश ' हैं , जो लगातार उपेक्षा , शोषण , लूट व विस्थापन के शिकार होते रहते हैं । इसलिए खेती और किसानों का दोयम दर्जा , कंगाली व शोषण आधुनिक पूंजीवादी विकास और औद्योगिक व्यवस्था में अंतर्निहित है। वह पूंजी संचय और पूंजी निर्माण का एक प्रमुख स्रोत है । मार्क्सवादी विचार की एक प्रमुख कमी यह है कि एक कारखाने के अंदर मजदूरों के शोषण को ही उसने , अतिरिक्त मूल्य का प्रमुख स्रोत मान लिया लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार , विनिमय एवं पूंजी के जरिये अन्य देशों का शोषण तथा देश के अन्दर अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों का शोषण इसका ज्यादा बड़ा स्रोत साबित हुआ है । इसी शोषण के कारण पश्चिमी यूरोप के देशों में पूंजीपतियों और मजदूरों दोनों की आमदनी में वृद्धि संभव हुई , दोनों के बीच का टकराव टालना संभव हुआ तथा इन देशों में वह क्रान्ति नहीं हुई , जिसकी भविष्यवाणी मार्क्स और एन्गल्स ने की थी । दुनिया के गैर यूरोपीय देशों की दृष्टि मार्क्स के विचार की यह एक प्रमुख कमी थी , जिसे भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने<strong>' मार्क्स के बाद का अर्थशास्त्र' ( Economics after Marx, 'Marx,Gandhi and Socialism')</strong> नामक अपने निबंध में अच्छे ढंग से उजागर किया है ।</p>
<p align="left">    मार्क्स के विश्लेषण में एक कमी और थी । श्रम को उन्होंने उत्पादन और मूल्य सृजन का मुख्य आधार माना । एक मजदूर के श्रम से जो उत्पादन होता है , उसका पूरा हिस्सा उसे न दे कर एक छोटा सा हिस्सा दिया जाता है, और यही अतिरिक्त मूल्य का व मालिकों के मुनाफ़े का का स्रोत बनता है ।यह सही है ,लेकिन इससे तस्वीर पूरी नहीं बनती । पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में औद्योगीकरण का एक प्रमुक आधार बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का मुफ्त या बहुत कम लागत पर दोहन , शोषण व विनाश भी रहा है ।<a href="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/09/windowslivewritercf7de9fa4fa1-5ea4lohia-stamp2.jpg"><img align="right" width="179" src="http://samatavadi.files.wordpress.com/2007/09/windowslivewritercf7de9fa4fa1-5ea4lohia-stamp-thumb.jpg" height="240" style="border-width:0;" /></a> जिस तरह कारखाने के अन्दर एवं देश के अन्दर श्रम का शोषण पूंजीवादी औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं था , उसी तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट व बरबादी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई ।अंतर्राष्ट्रीय व्यापार,विनिमय व अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेश इसके प्रमुख माध्यम बने । प्राकृतिक संसाधनों का यह शोषण कच्चे माल की निरंतर बढ़ती जरूरतों के रूप में तो है ही , जो खदानों , खेतों , जंगलों और सागरों से प्राप्त होता है ।लेकिन जल , जंगल , जमीन , हवा ,जैविक सम्पदा आदि को सीधे हड़पने , प्रदूषित करने और नष्ट करने की औद्योगिक पूंजीवाद की क्षमता व जरूरत भी जबरदस्त है । यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि अमेरिका के दोनों विशाल महाद्वीप व आस्ट्रेलिया महाद्वीप के मूल  निवासियों को नष्ट करके वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने तथा एशिया व अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने का मौका यूरोप को न मिला होता तो भी औद्योगिक क्रान्ति संभव नहीं होती । चूंकि दुनिया के गरीब एवं कथित रूप से 'अविकसित' देशों में अधिकांश लोगों की जिन्दगी अभी भी प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी है, वहां पर औद्योगिक सभ्यता का दोनों तरह का शोषण  ( श्रम एवं प्राकृतिक संसाधनों का ) काफी हद तक एकाकार हो जाता है । दोनों के विनाशकारी असर को भोगने के लिए वहां की जनता मानों अभिशप्त है ।*</p>
<p align="left"><u> <strong>( जारी )</strong>     लेख के <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/">प्रथम</a> और  <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/31/narodnikmarxindustalisation/">द्वितीय</a>     भाग                                                                                              </u></p>
<p align="left">    * दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पूंजीवादी मुनाफे के साथ एक प्रकार का 'लगान' भी पूंजीवाद का महत्वपूर्ण ( शायद ज्यादा महत्वपूर्ण )अंग है । यह 'लगान' प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जे व एकाधिकार से आता है । इसी प्रकार पेटेण्ट - कॉपीराइट कानूनों के जरिये ज्ञान पर एकाधिकार कायम करके कमाई जा रही रॉयल्टी भी इसी तरह की आय है । यह भी कहा जा सकता है कि जमीन एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों से लोगों को बेदखल करके होने वाला 'प्राथमिक पूंजी संचय'  कोई पूंजीवाद का पूर्व चरण या प्रारंभिक चरण नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाली पूंजी के विस्तार की पूंजीवाद की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है ।</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[' नारी हानि विसेस क्षति नाहीं ']]></title>
<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/09/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b9/</link>
<pubDate>Thu, 09 Aug 2007 01:43:48 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
<guid>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/09/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b9/</guid>
<description><![CDATA[Technorati tags: तुलसीदास, मानस, स्त्री, शूद्र, tulsid]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8">तुलसीदास</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8">मानस</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80">स्त्री</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0">शूद्र</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/tulsidas">tulsidas</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/manas">manas</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/stree">stree</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/shoodra">shoodra</a></p>
<p align="left">    पिछली तीन <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/">प्रविष्टियों</a> में <a href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/07/tulsidaswomenrss/">रामचरितमानस</a> का <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/08/03/banarastulsi-ghatshambhoo-mallah/">सन्दर्भ</a> आया और स्वस्थ लोगों के बीच चर्चा-बहस हुई । घुघूती बासूती ने स्त्री के दर्द का उदाहरण शूद्र के दर्द से दिया । इष्टदेव संकृत्यायन और अनूप शुक्ला ने मानस में स्त्री विरोधी पंक्तियों के सन्दर्भ में इस बात पर गौर करने का निवेदन किया कि उक्त पंक्तियाँ किस पात्र द्वारा किन परिस्थितियों में कही जा रही हैं , इसे नजरअन्दाज न किया जाए ।</p>
<p align="left">    आनन्द , प्रेम और शान्ति के आह्वान के मुख्य प्रयोजन के साथ राममनोहर लोहिया ने रामायण मेला आयोजित करने की संकल्पना की थी । उन्हें लगता था कि आयोजन से हिन्दुस्तान की एकता जैसे साम्प्रतिक लक्ष्य भी प्राप्त किए जाएँगे । कम्बन की तमिल रामायण , एकनाथ की मराठी रामायण , कृत्तिबास की बंगला रामायण और ऐसी ही दूसरी रामायणों ने अपनी-अपनी भाषा को जन्म और संस्कार दिया ऐसा लोहिया मानते थे । उनका विचार था कि रामायण मेला में तुलसी की रामायण को केन्द्रित करके इन सभी रामायणों पर विचार किया जाएगा और बानगी के तौर पर उसका पाठ भी होगा । लोहिया का निजी मत था कि तुलसी एक रक्षक कवि थे ।</p>
<blockquote>
<p align="left">'जब चारों तरफ़ से अझेल हमले हों , तो बचाना , थामना , टेका देना , शायद ही तुलसी से बढ़कर कोई कर सकता है । जब साधारण शक्ति आ चुकी हो , फैलाव , खोज , प्रयोग , नूतनता और महाबल अथवा महा-आनन्द के लिए दूसरी या पूरक कविता ढूँढ़नी होगी ।'</p>
</blockquote>
<p align="left">    लोहिया को लगता था कि , 'नारी को कलंकित करने वाली पंक्तियों को हँस कर टाल देना चाहिए कि ये पंक्तियाँ किसी शोक-संतप्त अथवा नीच पात्र के मुँह में है या ऐसे कवियों की है जो अपरिवर्तनशील युग में था । हमें आशा है कि रामायण मेले में , भाषणों द्वारा और वहाँ के वातावरण से जनता को विवेक बुद्धि मिलेगी , और सच को संगत कोण से देखने का मौका मिलेगा ।' इस चिट्ठे पर हो रही चर्चा में उठे मुद्दों पर लोहिया के विचार और उनकी योजना के प्रासंगिक अंश  यहाँ दिए जा रहे हैं ।</p>
<blockquote>
<p align="left"><font color="#333333">" एक कार्यक्रम तुलसी रामायण के नवाह्न पाठ का जरूर होना चाहिए । एक अगुआ दोहा-चौपाई लय से पढ़ेगा और उसको हज़ार , दस हज़ार या लाख , जितने भी लोग हों उसी लय से दोहराने की कोशिश करेंगे । लय से पढ़ने वाले लोगों को अभी से तय करना चाहिए , उनके दिन और समय भी । इन अगुओं में औरतें , शूद्र और अन्य धर्मी जरूर रहें । द्विज तो होंगे ही । हो सकता है कि कुछ हिन्दू सोचें कि हिन्दू धर्म को भ्रष्ट किया जा रहा है और कुछ कट्टर अन्य धर्मी भी सोचें कि उनको खाने और हिन्दू धर्म में खपाने की कोशिश हो रही है ।वास्तविकता यह है कि उन्मुक्त मानव आनन्द और पूरे हिन्दुस्तान की एक राष्ट्रीयता इस तरह के नवाह्न पाठ से जगेंगे । मैं समझता हूँ कि हिन्दुस्तान की साधारण जनता उसको बहुत पसन्द करेगी ।</font></p>
<p align="left"><font color="#333333">   एक दिक्कत उठ सकती है । मान लो,कोई नारी पाठ की अगुआगिरी कर रही है और उसी समय आठ अवगुण वाली नारी के स्वभाव की चौपाई आ पड़े या <strong><font color="#0080c0">' नारी हानि विसेस क्षति नाही"</font></strong> , तब क्या हो? यहीं दृष्टि का सवाल उठता है। सबसे पहली बात तो यह है कि नारी और शूद्र सम्बन्धी और अन्य प्रकार की जितनी भ्रष्ट चौपाइयाँ रामायण में हैं वे ज्यादातर भ्रष्ट पात्रों के मुँह में रखी गयी हैं या किसी पागलपन के मौके पर । <strong>महाकाव्य एक महान नाटक होता है । उसमें सैंकड़ों किस्म के पात्र होते हैं ।हर पात्र की कही हुई,हर एक बात,न तो अच्छी ही होती है न चिर सत्य ।</strong></font></p>
<p align="left"><strong><font color="#333333">.......इसलिए मैं उम्मीद करूँगा कि अगुआगिरी करने वाली नारी उसी झूम से उन चौपाइयों को पढ़ेगी जैसे दूसरी चौपाइयों को। मन में , जहाँ जैसी जरूरत होगी, वह पात्र पर हँस लेगी या तुलसी पर ।</font></strong></p>
<p align="left"><font color="#333333">....दृष्टि-सुधार के लिए इस नर-नारी सम्बन्ध का थोड़ा विश्लेषण और कर दूँ । इस सम्बन्ध में इधर (सं.-मार्च १९६१ का भाषण ) सबसे अच्छी किताब सिमोन दबोव्वार की निकली है । उनका कहना है कि सदा से नर-नारी सम्बन्ध की दो परस्पर विरोधी धुरियाँ रही हैं : एक , कि नर नारी को पूरी तरह अपने क़ब्जे में रखना चाहता है, और दूसरे , कि नारी सजीव और स्वंतंत्र हो , जिससे क़ब्जा मजेदार हो , लेकिन यह सम्भव कैसे। ऐसे क़ब्जे को हम अपनी भाषा में चुलबुला क़ब्जा कह सकते हैं,जो कि फ्रांसीसी और दूसरी भाषाओं में ,इतने कम शब्दों में कहना ,शायद सम्भव नहीं है । अधीन वस्तु सजीव और स्वतंत्र हो,यह है नर दिमाग की विडम्बना । और सिमोन का कहना बिलकुल सही है।</font></p>
<p align="left"><font color="#333333">    फिर हम तुलसी को याद करें । नारी स्वतंत्रता और समानता की जितनी जानदार कविता मैंने तुलसी की पढ़ी और सुनी उतनी और कहीं नहीं , कम से कम इससे ज्यादा जानदार कहीं नहीं ।अफ़सोस यह है कि नारी हीनता वाली कविता तो हिन्दू नर के मुँह पर चढ़ी रहती है लेकिन नारी सम्मान वाली कविता को वह भुलाये रहता है। मामला यहाँ तक बढ़ गया है कि अगर कुछ दिन पहले रामस्वरूप वर्मा ने मुझे याद नहीं न दिलाया होता तो मैं भी भूल गया था कि " पराधीन सपनेहु सुख नाहीं" का सम्बन्ध नारी से है।</font></p>
<p align="left"><font color="#333333">    चुलबुला क़ब्जा असम्भव है। निर्जीव क़ब्जा बेमजा है । नर और नारी का स्नेहमय सम्बन्ध बराबरी की नींव पर हो सकता है । ऐसा सम्बन्ध किसी समाज ने अभी तक नहीं जाना। सीता और राम में भी पूरी बराबरी का स्नेह नहीं था। समाज के अन्दर व्याप्त गैरबराबरी का कण उसमें भी पड़ गया। फिर भी, जितना ज्यादा सीता , द्रौपदी और पार्वती इत्यादि को ऊँचे और स्वतंत्र आसन पर बैठाया है ,उससे ज्यादा ऊँचा नारी का स्थान दुनिया में कहीं , और कभी नहीं हुआ । यदि दृष्टि ठीक है तो राम कथा और तुलसी - रामायण की कविता सुनने या पढ़ने से नर - नारी के साथ सम स्नेह की ज्योति मिल सकती है ।</font></p>
<p align="left"><font color="#333333">    ऐसी दृष्टि , लगता है कि हिन्दुस्तान को बहुत ठोकर खाने के बाद ही मिलेगी । दहेज की रकम बढ़ती चली आ रही है और जब माता - पिता उसे न दे पाएँगे और जब बढ़ेगा जिसे हिन्दुस्तान में अनर्थ कहा जाता है , तब लोग समझेंगे कि नारी को भी इसी तरह खोल दो जैसे नर को । पठन - पाठन और मेलों से कुछ काम जरूर बनता है ।मुझे आशा है कि जो भाषण मेले में होंगे उनसे दृष्टि बनेगी ।</font></p>
<p align="left"><font color="#333333">    .... शूद्र और पिछड़े वर्गों के मामले में रामायण में काफ़ी अविवेक है । इस सम्बन्ध में एक बात ध्यान में रहे तो बड़ा अच्छा है ।शूद्र को हीन बनाने की जितनी चौपाइयाँ हैं , उनमें से अधिकतर कुपात्रों ने कही हैं , अथवा कुअवसर पर ।इतना जरूर सही है कि द्विज और विप्र को हर मौके पर इतना ऊँचा चढ़ाया गया है कि शूद्र और बनवासी नीचे गिर जाते हैं । इसे भी समय का दोष और कवि को समय का शिकार समझ कर रामायण का रस पान करना चाहिए । मैं उन लोगों में नहीं जो चौपाइयों के अर्थ की खींचतान करते हैं , अथवा १०० चौपाइयों के मुकाबले में केवल विपरीत चौपाई का उदाहरण दे कर अपनी ग़लत बात को मनवाना चाहते हैं । यदि मैं निषाद के प्रसंग का उल्लेख इस सम्बन्ध में करता हूँ तो रामायण की सफ़ाई देने के लिए नहीं बल्कि यह दिखाने के लिए जाति - प्रथा के इस बीहड़  और सड़े जंगल में एक छोटी-सी चमकती पगडंडी है । प्रसंगवश मैं इतना और कह दूँ कि किसी चौपाई के सैंकड़ों मतलब बताने में न तुलसी की प्रतिभा है , न बताने वाले की ।विद्वत्ता तो इसी में है कि सभी सम्भव अर्थों पर टीका करते हुए सबसे सही अर्थ को स्थिर को स्थिर करना ।</font></p>
<p align="left"><font color="#333333">    निषाद भरत मंडली को लक्षमण की तरह दीखता है ।जिसको छुआ नहीं जाता है ,वह एकाएक राम का छोटा भाई कैसे बन जाता है ?  तुलसी के निषाद में यह सब प्रेम का चमत्कार है । प्रेम के सामने सब रीति-रिवाज ढह जाते हैं। मुझे मालूम नहीं कि वाल्मीकि अथवा दूसरी रामायणों में प्रेम को इतनी बड़ी जगह है या नहीं ,जितना तुलसी में। एक और प्रसंग में कहा है,जहाँ भरत और राम का वर्णन है, </font><font color="#0080c0"><strong>" भरत अवधि सनेह ममता की , जदपि राम सीम समता की । " </strong></font><font color="#000000">राम समता की सीमा हैं ,उनसे बढ़कर समता और कहीं नहीं है । इस समता का ज्यादा निर्देश मन की समता की ओर है , ठंड और गरम अथवा हर्ष और विषाद अथवा जय और पराजय की दोनों स्थितियों में मन की समान भावना ।मन की ऐसी भावना अगर सच है तो बाहरी जगत के प्राणियों के लिए भी छलकेगी। जिस तरह राम की समता छलकती है ,उसी तरह भरत का स्नेह भी छलकता है। दोनों निषाद को गले लगाते हैं । यह सही है कि अब पालागी और गलमिलौवल को साथ-साथ चलना प्रवंचना होगी।पालागी खतम हो और गलमिलौवल रहे ।</font></p>
<p align="left"><font color="#000000">    ...... मुझे एक और दिलचस्प बात मिली है। रावण कुल के अधिकतर नाम मोटी आवाज , तेज बोल पर हैं। रावण खुद कौन है ?जो रव या हल्ला करे। मेघनाद , कुम्भकरण, सूर्पनखा का मृत पति विद्युत जिह्व सब जोर-बोल के नाम हैं।इस कुल के सभी नाम ऐसे क्यों पड़े अथवा कवियों अथवा कहानीकारों ने रव पर ही सब नाम क्यों गढ़े ? खोज का यह एक अच्छा विषय है ।</font></p>
</blockquote>
<p align="left">&#160;</p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[कृष्ण - कृष्णा सखा-सखी ही क्यों रहे ? : कृष्ण (४) : लोहिया]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/05/03/%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%96%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%96%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d/</link>
<pubDate>Thu, 03 May 2007 08:58:03 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: lohia, krishna, draupadi
  गत प्रविष्टी से आगे :]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/lohia">lohia</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/krishna">krishna</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/draupadi">draupadi</a></p>
<p align="left">  <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/05/02/lohiakrishna-3/">गत प्रविष्टी</a> से आगे :  कुरु - धुरी की आधार - शिला थी कुरु - पांचाल संधि । आसपास के इन इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था सो कृष्ण ने उन लीलाओं के द्वारा किया , जिनसे पांचाली का विवाह पाँचों पाण्डवों से हो गया । यह पांचाली भी अद्भुत नारी थी । द्रौपदी से बढ़ कर भारत की कोई प्रखर - मुखी और ज्ञानी नारी नहीं । कैसे कुरु पक्ष के सभी को उत्तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्या दूसरे को दाँव पर रखने की उसमें स्वतंत्र सत्ता है ?</p>
<p align="left">    अर्जुन समेत पाँचों पाण्डव उसके सामने फीके थे । यह कृष्णा तो कृष्ण के ही लायक थी । महाभारत का नायक कृष्ण , नायिका कृष्णा । कृष्णा और कृष्ण का सम्बन्ध भी विश्व - साहित्य में बेमिसाल है । दोनों सखा - सखी ही क्यों रहे । कभी कुछ और दोनों में से किसीने होना चाहा ? क्या सखा - सखी का सम्बन्ध पूर्व रूप से मन की देन थी या उसमें कुरु - धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था ? जो हो , कृष्ण और कृष्णा का यह सम्बन्ध राधा और कृष्ण के सम्बन्ध से कम नहीं , लेकिन साहित्यकारों और भक्तों की नजर इस ओर कम पड़ी है । हो सकता है कि भारत की पूर्व - पश्चिम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म , न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा , शायद इसलिए कि यदि वह वस्य कर्मफल-हेतु बन जाता , तो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था । उसने कभी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी - केन्द्र बनाये , उसके लिए दूसरों का हस्तिनापुर ही अच्छा रहा । उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप में रखा , जिसे संसार अपनी कहता है , वैसी न बनाया । कौन जाने कृष्ण के लिए यह सहज था या इसमें भी उसका दिल दूखा था ।</p>
<p align="left">    कृष्णा अपने नाम के अनुरूप साँवली थी , महान सुन्दरी रही होगी । उसकी बुद्धि का तेज , उसकी चकित हरिणी आँखों में चमकता रहा होगा । गोरी की अपेक्षा साँवली, नखशिख और अंग में अधिक सुडौल होती है ।राधा गोरी रही होगी। बालक और युवक कृष्ण राधा में एकरस रहा । प्रौढ़ कृष्ण के मन पर कृष्णा छायी रही होगी,राधा और कृष्ण तो एक थे ही।कृष्ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी- बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्था में श्यामा को निहारना । कृष्ण - कृष्णा सम्बन्ध में और कुछ न हो , भारतीय मर्दों को श्यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर मनन करना चाहिए ।</p>
<p align="left">    रामायण की नायिका गोरी है । महाभारत की नायिका कृष्णा है ।गोरी की अपेक्षा साँवला अधिक सजीव है । जो भी हो , इसी कृष्ण - कृष्णा सम्बन्ध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्म हुआ। न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्याग । कृष्णा पांचाल यानी कनौज के इलाके की थी , संयुक्ता भी । धुरी - केन्द्र इन्द्रप्रस्थ का अनाड़ी राजा पृथ्वीराज अपने पुरखे कृष्ण के रास्ते न चल सका ।जिस पांचाली द्रौपदी के जरिये कुरु - धुरी की आधार - शिला रखी गयी , उसी पांचाली संयुक्ता के जरिये दिल्ली - कनौज की होड़ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बना । कभी - कभी लगता है कि व्यक्ति का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्म होता है , कभी फीका कभी रँगीला । कहाँ द्रौपदी और कहाँ संयुक्ता , कहाँ कृष्ण और कहाँ पृथ्वीराज , यह सही है । फीका और मारात्मक पुनर्जन्म , लेकिन पुनर्जन्म तो है ही ।</p>
<p align="left">    कृष्ण की कुरु - धुरी के और भी रहस्य रहे होंगे । साफ़ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्व का निर्माता और प्रतीक था । उसी तरह जरासंध भौतिकवादी एकत्व का निर्माता था । आजकल कुछ लोग कृष्ण और जरासंध युद्ध को आदर्शवाद - भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं । वह सही जँचता है ,किन्तु अधूरा विवेचन । जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्व का इच्छुक था । बाद के मगधीय मौर्य और गुप्त राज्यों में कुछ हद तक इसी भौतिकवादी एकरूप एकत्व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का ।कृष्ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्व का का निर्माता था । जहाँ तक मुझे मालूम है ,अभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी बहुरूप एकत्व के आधार पर कभी नहीं हुआ । चिर चमत्कार तो तब होगा जब आदर्शवाद और भौतिकवाद के मिलेजुले बहुरूप एकत्व के आधार पर भारत का निर्माण होगा । अभी तक तो कृष्ण का प्रयास ही सर्वाधिक माननीय मलूम होता है , चाहे अनुकरणीय राम का एकरूप एकत्व ही हो । कृष्ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल - जीवन है जो औरों में नहीं । </p>
<p align="left">    कृष्ण यादव-शिरोमणि था , केवल क्षत्रीय राजा ही नहीं , शायद क्षत्रीय उतना नहीं था , जितना अहीर । तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है ,क्षत्राणी द्रौपदी उसे हटा न पायी । विराट विश्व और त्रिकाल के उपयुक्त कृष्ण बहुरूप था । राम और जरासंध एकरूप थे , चाहे आदर्शवादी एकरूपता में केन्द्रीयकरण और क्रूरता कम हो , लेकिन कुछ न कुछ केन्द्रीयकरण तो दोनों में होता है । मौर्य और गुप्त राज्यों में कितना केन्द्रीयकरण था , शायद क्रूरता भी ।</p>
<p align="left">    बेचारे कृष्ण ने इतनी नि:स्वार्थ मेहनत की , लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा है । सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे - " बोलो हरि , हरि बोल " के उच्चारण से - अपनी आख़री यात्रा पर निकाले जाते हैं , नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़ कर सारे भारत में हिन्दू मुर्दे - " राम नाम सत्य है " के साथ ही ले जाये जाते हैं । बंगाल के इतना तो नहीं , फिर भी उड़ीसा और असम में कृष्ण का स्थान अच्छा है। कहना मुशकिल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस , कौन बीस है । सबसे आश्चर्य की बात है कि स्वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहाँ एक - दूसरे को ' जैरामजी " से नमस्ते करते हैं । सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह " जैरामजी " बड़ा मीठा लगता है , शायद एक कारण यह भी हो ।</p>
<p align="left">    राम त्रेता के मीठे , शान्त और सुसंस्कृत युग का देव है । कृष्ण पके , जटिल , तीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है । राम गम्य है। कृष्ण अगम्य है । कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं , यदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद और कूटनीति की नकल करते हैं , उसका अथक निस्व उनके लिए असाध्य रहता है । इसीलिए कृष्ण हिन्दुस्तान में कर्म का देव न बन सका । कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किये हैं । कितने सन्धि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों के धागे उसे पलटने पड़ते थे ।यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं की प्रदेशों के आपसी सम्बन्धों में में कृष्णनीति अब भी चलायी जए । कृष्ण जो पूर्व - पश्चिम की एकता दे गया ,उसी के साथ - साथ उस नीति का औचित्य भी खतम हो गया । बच गया कृष्ण का मन और उसकी वाणी । और बच गया राम का कर्म । अभी तक हिन्दुस्तानी इन दोनों का समन्वय नहीं कर पाये हैं । करें , तो राम के कर्म में भी परिवर्तन आये । राम रोऊ है , इतना कि मर्यादा भंग होती है । कृष्ण कभी रोता नहीं । आँखें जरूर डबडबाती हैं उसकी , कुछ मौकों पर , जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं ।</p>
<p align="left">    कैसे मन और वाणी थे उस कृष्ण के । अब भी तब की गोपियाँ और जो चाहें वे ,उसकी वाणी और मुरली की तान सुन कर रस विभोर हो सकते हैं और अपने चमड़े के बाहर उछल सकते हैं । साथ ही कर्म-संग के त्याग , सुख-दुख,शीत-उष्ण,जय-पराजय के समत्व के योग और सब भूतों में एक अव्यव भाव का सुरीला दर्शन ,उसकी वाणी में सुन सकते हैं ।संसार में एक कृष्ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया ।</p>
<p align="left">    वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्ण का सम्बन्ध कैसा था । क्या सखा - सखी का सम्बन्ध स्वयं एक अन्तिम सीढ़ी और असीम मैदान है , जिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं ? कृष्ण छलिया जरूर था , लेकिन कृष्णा से उसने कभी छल न किया । शायद वचन - बद्ध था , इसलिए । जब कभी कृष्णा ने उसे याद किया , वह आया । स्त्री - पुरुष की किसलय - मित्रता को , आजकल के वैज्ञानिक , अवरुद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं । यह अवरोध सामाजिक या मन के आन्तरिक कारणों से हो सकता है । पाँचों पाण्डव कृष्ण के भाई थे और द्रौपदी कुरु - पांचाल संधि की आधार- शिला थी ।अवरोध के सभी कारण मौजूद थे । फिर भी , हो सकता है कि कृष्ण को अपनी चित्तप्रवृत्तियों का कभी विरोध न करना पड़ा हो । यह उसके लिए सहज और अन्तिम सम्बन्ध था अगर यह सही है , तो कृष्ण - कृष्णा के सखा - सखी सम्बन्ध के ब्योरे पर दुनिया में विश्वास होना चाहिए और तफ़सील से , जिससे से स्त्री - पुरुष सम्बन्ध का एक नया कमरा खुल सके । अगर राधा की छटा निराली है , तो कृष्ण की घटा भी । छटा में तुष्टिप्रदान रस है , घटा में उत्कंठा-प्रधान कर्त्तव्य ।</p>
<p align="left">    राधा - रस तो निराला है ही । राधा - कृष्ण एक हैं , राधा - कृष्ण का स्त्री रूप और कृष्ण राधा का पुरुष रूप । भारतीय साहित्य में राधा का जिक्र बहुत पुराना नहीं है , क्योंकि सबसे पहली बार पुराण में आता है " अनुराधा " के नाम से । नाम ही बताता है प्रेम और भक्ति का वह स्वरूप , जो आत्म विभोर है , जिससे सीमा बाँधने वाली चमड़ी रह नहीं जाती । आधुनिक समय में मीरा ने भी उस आत्मविभोरता को पाने की कोशिश की । बहुत दूर तक गयी मीरा , शायद उतनी दूर गयी जितना किसी सजीव देह को किसी याद के लिए जाना संभव हो । फिर भी , मीरा की आत्मविभोरता में कुछ गर्मी थी । कृष्ण को तो कौन जला सकता है , सुलझा भी नहीं सकता , लेकिन मीरा के पास बैठने में उसे जरूर कुछ पसीना आये , कम से कम गर्मी तो लगे । राधा न गरम है , न ठंडी , राधा पूर्ण है । मीरा की कहानी एक और अर्थ में बेजोड़ है । पद्मिनी मीरा की पुरखिन थी । दोनों चित्तौड़ की नायिकाएँ हैं । करीब ढाई सौ वर्ष का अन्तर है । कौन बड़ी है , वह पद्मिनी जो जौहर करती है या वह मीरा जिसे कृष्ण के लिए नाचने से कोई मना न कर सका । पुराने देश की यही प्रतिभा है । बड़ा जमाना देखा है इस हिन्दुस्तान ने । क्या पद्मिनी थकती - थकती सैंकड़ों बरस में मीरा बन जाती है ? या मीरा ही पद्मिनी का श्रेष्ठ स्वरूप है ? अथवा जब प्रताप आता है , तब मीरा फिर पद्मिनी बनती है । हे त्रिकालदर्शी कृष्ण ! क्या तुम एक ही में मीरा और पद्मिनी नहीं बन सकते ?</p>
<p align="left">    राधा - रस का पूरा मजा तो ब्रज - रज में मिलता है । मैं सरयू और अयोध्या का बेटा हूँ । ब्रज - रज में शायद कभी न लौट सकूँगा । लेकिन मन से तो लौट चुका हूँ । श्री राधा की नगरी बरसाने के पास एक रात रह कर मैंने राधारानी के गीत सुने हैं ।</p>
<p align="left">    कृष्ण बड़ा छलिया था । कभी श्यामा मालिन बन कर , राधा को फूल बेचने आता था । कभी वैद्य बन कर आता था , प्रमाण देने कि राधा अभी ससुराल जाने लायक नहीं है । कभी राधा प्यारी को गोदाने का न्योता देने के लिए गोदनहारिन बन कर आता था । कभी वृन्दा की साड़ी पहन कर आता था और जब राधा उससे एक बार चिपट कर अलग होती थी , शायद झुँझला कर , शायद इतरा कर , तब श्री कृष्ण मुरारी को ही छट्ठी का दूध याद आता था , बैठ कर समझाओ राधारानी को कि वृन्दा से आँखें नहीं लड़ायी ।</p>
<p align="left">    मैं समझता हूँ कि नारी अगर कहीं नर के बराबर हुइ है , तो सिर्फ ब्रज में और कान्हा के पास । शायद इसीलिए आज भी हिन्दुस्तान की औरतें वृन्दावन में जमुना के किनारे एक पेड़ में रुमाल जितनी चुनड़ी बाँधने का अभिनय करती हैं । कौन औरत नहीं चाहेगी कन्हैया से अपनी चुनड़ी हरवाना , क्योंकि कौन औरत नहीं जानती कि दुष्ट जनों द्वारा चीर हरण के समय कृष्ण ही उनकी चुनड़ी अनन्त करेगा । शायद जो औरतें पेड़ में चीर बाँधती हैं , उन्हें यह सब बताने पर वह लजाएँगी , लेकिन उनके पुत्र पुण्य आदि की कामना के पीछे भी कौन - सी सुषुप्त याद है ।</p>
<p align="left">    ब्रज की मुरली लोगों को इतना विह्वल कैसे बना देती है कि वे कुरुक्षेत्र के कृष्ण को भूल जाँए और फिर मुझे तो लगता है कि अयोध्या का राम मनीपुर से द्वारका के कृष्ण को कभी भुलाने न देगा । जहाँ मैंने चीर बाँधने का अभिनय देखा उसी के नीचे वृन्दावन के गन्दे पानी का नाला बहते देखा , जो जमुना से मिलता है और राधा रानी के बरसाने की रँगीली गली में पैर बचा - बचा कर रखना पड़ता है कि कहीं किसी गन्दगी में न सन जाँए । यह वही रँगीली गली है , जहाँ से बरसाने की औरतें हर होली पर लाठी ले कर निकलती हैं और जिनके नुक्कड़ पर नन्द गाँव में मर्द मोटे साफे बाँध और बड़ी ढालों से अपनी रक्षा करते हैं । राधा रानी अगर कहीं आ जाए , तो वह इन नालों और गन्दगियों को तो खतम करे ही , बरसाने की औरतों के हाथ में इत्र , गुलाल और हल्के , भीनी महक वाले , रंग की पिचकाली थमाये और नन्द गाँव के मरदों को होली खेलने के लिए न्योता दे। ब्रज में महक और नहीं है , कुंज नहीं है , केवल करोल रह गये हैं । शीतलता खतम है ।बरसाने में मैंने राधारानी की अहीरिनों को बहुत ढूँढ़ा । पाँच - दस घर होंगे । वहाँ बनियाइनों और ब्राह्मणियों का जमाव हो गया है , जब किसी जात में कोई बड़ा आदमी या बड़ी औरत हुई , तीर्थ - स्थान बना और मन्दिर और दुकानें देखते - देखते आयीं , तब इन द्विज नारियों के चेहरे भी म्लान थे , गरीब , कृश और रोगी , कुछ लोग मुझे मूर्खतावश द्विज - शत्रु समझने लगे हैं । मैं तो द्विज - मित्र हूँ , इसलिए देख रहा हूँ कि राधारानी की गोपियाँ , मल्लाहिनों और चमाइनों को हटा कर द्विजनारियों ने भी अपनी कांति खो दी है । मिलाओ ब्रज की रज में पुष्पों की महक , दो हिन्दुस्तान को कृष्ण की बहुरूपी एकता , हटाओ राम का एक रूपी द्विज - शूद्र धर्म , लेकिन चलो राम के मर्यादा वाले रास्ते पर , सच और नियम पालन कर ।</p>
<p align="left">    सरयू और यमुना कर्त्तव्य की नदियाँ हैं । कर्त्तव्य कभी - कभी कठोर हो कर अन्यायी हो जाता है और नुकसान कर बैठता है । जमुना और चम्बल , केन तथा दूसरी जमुना - मुखी नदियाँ रस की नदियाँ हैं । रस में मिलन है , कलह मिटाता है । लेकिन लास्य भी है , जो गिरावट में मनुष्य को निकम्मा बना देता है । इसी रसभरी इतराती जमुना के किनारे कृष्ण ने अपनी लीला की , लेकिन कुरु धुरी का केन्द्र उसने गंगा के किनारे ही बसाया । बाद में , हिन्दुस्तान के कुछ राज्य जमुना के किनारे बने और एक अब भी चल रहा है । जमुना क्या तुम कभी बदलोगी , आखिर गंगा में ही तो गिरती हो । क्या कभी इस भूमि पर रसमय कर्त्तव्य का उदय होगा । कृष्ण ! कौन जाने तुम थे या नहीं । कैसे तुमने राधा - लीला को कुरु लला से निभाया । लोग कहते हैं कि युवा कृष्ण का प्रौढ़ कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं । बताते हैं कि महाभारत में राधा का नाम तक नहीं । बात इतनी सच नहीं , क्योंकि शिशुपाल ने क्रोध में कृष्ण की पुरानी बातें साधारण तौर पर बिना नामकरण के बतायी हैं । सभ्य लोग ऐसे जिक्र असमय नहीं किया करते , जो समझते हैं वे , और जो नहीं समझते हैं वे भी । महाभारत में राधा का जिक्र हो कैसे सकता है । राधा का वर्ण्न तो वही होगा जहाँ तीन लोक का स्वामी उसका दास है । रास का कृष्ण और गीता का कृष्ण एक हैं । न जाने हजारों वर्ष से अभी तक पलड़ा इधर या उधर क्यों भारी हो जाता है ? बताओ कृष्ण !</p>
<p align="left">    <strong>( " जन " , १९५८ जुलाई से )</strong></p>
<p align="left">&#160;</p>
]]></content:encoded>
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<title><![CDATA[पटना-गया की मगध-धुरी , हस्तिनापुर-इन्द्रप्रस्थ की कुरु-धुरी : कृष्ण(३) : लोहिया]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/05/02/%e0%a4%aa%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%97%e0%a4%a7-%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf/</link>
<pubDate>Wed, 02 May 2007 06:50:55 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: lohia, krishna
पिछले दो हिस्से । पूर्व - प]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/lohia">lohia</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/krishna">krishna</a></p>
<p align="left"><a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/04/27/lohiakrishna/">पिछले</a> दो <a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/04/28/lohiakrishna-2/">हिस्से</a> । पूर्व - पश्चिम एकता की दो धुरियाँ स्पष्ट ही कृष्ण - काल में थीं । एक पटना - गया की मगधपुरी और दूसरी हस्तिनापुर - इन्द्रप्रस्थ की कुरु-धुरी ।  मगध - धुरी का भी फैलाव स्वयं कृष्ण की मथुरा तक था जहाँ मगध - नरेश जरासंध का दामाद कंस राज्य करता था । बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित - मित्र थे । मगध - धुरी के खिलाफ़ कुरु - धुरी का सशक्त निर्माता कृष्ण था । कितना बड़ा फैलाव किया कृष्ण ने इस धुरी का । पूर्व में मणिपुर से ले कर पश्चिम में द्वारका तक इस कुरु - धुरी में समावेश किया । देश की दोनों सीमाओं , पूर्व की पहाड़ी सीमा और पश्चिम की समुद्री सीमा को फाँसा और बाँधा , इस धुरी को कायम और शक्तिशाली करने के लिए कितनी मेहनत और कितने पराक्रम करने पड़े , और कितनी लम्बी सूझ सोचनी पड़ी ।उसने पहला ही वार अपने ही घर मथुरा में मगधराज के दामाद पर किया । उस समय सारे हिन्दुस्तान में यह वार गूँजा होगा । कृष्ण की यह पहली ललकार थी , वाणी द्वारा नहीं । उसने कर्म द्वारा रण-भेरी बजायी ।  कौन अनसुनी कर सकता था । सबको निमन्त्रण हो गया यह सोचने के लिए कि मगध राजा को अथवा जिसे कृष्ण कहे उसे सम्राट के रूप में चुनो । अन्तिम चुनाव भी कृष्ण ने बड़े छली रूप में रखा । कुरु - वंश में ही न्याय-अन्याय के आधार पर दो टुकड़े हुए और उनमें अन्यायी टुकड़ी के साथ मगध - धुरी को जुड़वा दिया। संसार ने सोचा होगा कि वह तो कुरुवंश का अन्दरुनी और आपसी झगड़ा है । कृष्ण जानता था कि वह तो इन्द्रप्रस्थ हस्तिनापुर की कुरु - धुरी और राजगिरि की मगध-धुरी का झगड़ा है ।</p>
<p align="left">    राजगिरि राज्य कंस - वध पर तिलमिला उठा होगा । कृष्ण ने पहले ही वार में मगध की पश्चिमी को खतम-सा कर दिया । लेकिन अभी तो ताकत बहुत ज्यादा बटोरनी और बढ़ानी थी । यह तो सिर्फ आरम्भ था । आरम्भ अच्छा हुआ । सारे संसार को मालूम हो गया । लेकिन कृष्ण कोई बुद्धू थोड़े ही था जो आरम्भ की लड़ाई को अन्त बना देता । उसके पास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कंस के ससुर और उसकी पूरे हिन्दुस्तान की शक्ति से जूझ बैठता । वार करके , संसार को डंका सुना के कृष्ण भाग गया । भागा भी बड़ी दूर द्वारका में । तभी से उसका नाम रणछोड़दास पड़ा । गुजरात में आज भी हजारों लोग शायद एक लाख से भी अधिक लोग होंगे जिनका नाम  रणछोड़दास है । पहले मैं इस नाम पर हँसा करता था , मुसकाना तो कभी न छोड़ूँगा । यों , हिन्दुस्तान में और भी देवता हैं जिन्होंने अपना पराक्रम भाग कर दिखाया जैसे ज्ञानवापी के शिव ने । यह पुराना देश है । लड़ते - लड़ते थकी हड्डियों को भागने का अवसर मिलना चाहिए । लेकिन कृष्ण थकी पिण्डलियों के कारण नहीं भागा । वह भागा जवानी की बढ़ती हड्डियों के कारण । अभी हड्डियों को बढ़ाने और फैलाने का मौका चाहिए था । कृष्ण की पहली लड़ाई तो आजकल की छापामार लड़ाई की तरह थी , वार करो और भागो । अफ़सोस यही है कि कुछ भक्त लोग भगाने ही में मजा लेते हैं ।</p>
<p align="left">    द्वारका मथुरा से सीधे फासले पर करीब ७०० मील है । वर्तमान सड़कों की यदि दूरी नापी जाए तो करीब १०५० मील होती है । बिचली दूरी इस तरह ८५० मील होती है । कृष्ण अपने शत्रु से बड़ी दूर तो निकल ही गया , साथ ही साथ देश की पूर्व - पश्चिम एकता हासिल करने के लिए उसने पश्चिम के आखरी नाके को बाँध लिया । बाद में , पाँचों पाण्डवों के बनवासयुग में अर्जुन की चित्रांगदा और भीम की हिडिम्बा के जरिये उसने पूर्व के आखिरी नाके को भी बाँधा । इन फासलों को नाँपने के लिए मथुरा से अयोध्या , अयोध्या से राजमहल और राजमहल से इम्फाल की दूरी जाननी जरूरी है ।यही रहे होंगे उस समय के विशाल राजमार्ग । मथुरा से अयोध्या की बिचली दूरी करीब ३०० मील है ।अयोध्या से राजमहल करीब ४७० मील है । राजमहल से इम्फाल की बिचली दूरी करीब सवा पाँच सौ , यों वर्तमान सड़कों से फासला करीब ८५० मील और सीधा फासला करीब ३८० मील है । इस तरह मथुरा से इम्फाल का फासला उस समय के राजमार्ग से करीब १६०० मील रहा होगा । कुरु - धुरी के केन्द्र पर कब्जा करने और उसे सशक्त बनाने के पहले कृष्ण केन्द्र से ८०० मील दूर भागा और अपने सहचरों और चेलों को उसने १६०० मील दूर तक घुमाया । पूर्व-पश्चिम की पूरी भारत-यात्रा हो गयी । उस समय की भारतीय राजनीति को समझने के लिए कुछ दूरियाँ और जानना जरूरी है है । मथुरा से बनारस का फासला करीब ३७० मील और मथुरा से पटना करीब ५०० मील है । दिल्ली से , जो तब इन्द्रप्रस्थ थी , मथुरा का फासला करीब ९० मील है । पटने से कलकत्ते का फासला करीब सवा तीन सौ मील है । कलकत्ते के फासले का कोई विशेष तात्पर्य नहीं ,सिर्फ इतना ही कि कलकत्ता भी कुछ समय तक हिन्दुस्तान की राजधानी रही है , चाहे गुलाम हिन्दुस्तान की ।मगध-धुरी का पुनर्जन्म एक अर्थ में कलकत्ते में हुआ । जिस तरह कृष्ण - कालीन मगध-धुरी के लिए राजगिरि केन्द्र , उसी तरह ऐतिहासिक मगध-धुरी के लिए पटना या पाटलिपुत्र केन्द्र है , और इन दोनों का फासला करीब ४० मील है । पटना - राजगिरि केन्द्र का पुनर्जन्म कलकत्ते में होता है , इसका इतिहास के विद्यार्थी अध्ययन करें , चाहे अध्ययन करते समय सन्तापपूर्ण विवेचन करें कि यह काम विदेशी तत्वाधान में क्यों हुआ ।</p>
<p align="left">    कृष्ण ने मगध धुरी का नाश करके कुरु - धुरी की प्रतिष्ठा क्यों करनी चाही ? इसका एक उत्तर तो साफ है , भारतीय जागरण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पश्चिम में था जो राजगिरि और पटना से बहुत दूर पड़ जाता था । उसके अलावा मगध - धुरी कुछ पुरानी पड़ चुकी थी ,शक्तिशाली थी , किन्तु उसका फैलाव संकुचित था । कुरु - धुरी नयी थी और कृष्ण इसकी शक्ति और इसके फैलाव का सर्वशक्तिसम्पन्न निर्माता था , मगध - धुरी को जिस तरह चाहता शायद न मोड़ सकता ,कुरु - धुरी को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ और फैला सकता था । सारे देश को बाँधना जो था उसे । कृष्ण त्रिकालदर्शी था । उसने देख लिया होगा कि उत्तर - पश्चिम में आगे चल कर यूनानियों , हूणों ,पठानों , मुगलों आदि के आक्रमण होंगे इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केन्द्र कहीं वहीं रचना चाहिए , जो इन आक्रमणों का सशक्त मुकाबला कर कर सके । लेकिन त्रिकालदर्शी क्यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगध - धुरी बदला चुकाएगी और सैंकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्ण की भूमि के नजदीक यानि कन्नौज और उज्जैन तक खिसक चुकी होगी , किन्तु अशक्त अवस्था में । त्रिकालदर्शी ने देखा शायद यह सब कुछ हो , लेकिन कुछ न कर सका हो । वह हमेशा के लिए अपने देशवासियों को कैसे ज्ञानी और साधु दोनों बनाता । वह तो केवल रास्ता दिखा सकता था । रास्ते में भी शायद त्रृटि थी । त्रिकालदर्शी को शायद यह भी देखना चाहिए था कि उसके रास्ते पर ज्ञानी ही नहीं , अनाड़ी भी चलेंगे और वेकितना भारी नुकसान उठायेंगे ।राम के रास्ते पर चल कर अनाड़ी का भी अधिक नहीं बिगड़ता , चाहे बनना भी कम होता हो । अनाड़ी ने कुरु - पांचाल संधि का क्या किया ?</p>
<p align="left"><strong>( जारी )</strong></p>
]]></content:encoded>
</item>
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<title><![CDATA[देश की पूर्व - पश्चिम एकता का देव : कृष्ण (२) : डॉ . लोहिया]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/04/28/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5-%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%ae-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95/</link>
<pubDate>Sat, 28 Apr 2007 17:55:40 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[Technorati tags: lohia, krishna
    आसमान के देवताओं को जो ]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p style="display:inline;margin:0;padding:0;" class="wlWriterSmartContent">Technorati tags: <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/lohia">lohia</a>, <a rel="tag" href="http://technorati.com/tags/krishna">krishna</a></p>
<p align="left">    आसमान के देवताओं को जो भाग्य उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ़ के लिए तैयार रहना चाहिए , तभी कृष्ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उँगली पर उठाना पड़ा । इन्द्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता , तो ऐसा कृष्ण किस काम का ।फिर कृष्ण के रक्षा-युग का आरम्भ होने वाला था । एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर लीला है । कालिया दहन और कंस वध उसके आसपास के हैं । गोवर्धन उठाने में कृष्ण की उंगली दुखी होगी , अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुँझला कर सहारा देने को कहा होगा । माँ को कुछ इतरा कर उँगली दूखने की शिकायत की होगी । गोपियों से आँख लड़ाते हुए अपनी मुसकान द्वारा कहा होगा । उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्ण की तो आपस में गम्भीर और प्रफुल्लित मुद्रा रही होगी ।कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्ण ने अधिक निहारा होगा , माँ की ओर इतरा कर , या राधा की ओर प्रफुल्लित हो कर । उँगली बेचारे की दूख रही थी । अब तक दुख रही है , गोवर्धन में तो यही लगता है । वहीं पर मानस गंगा है । जब कृष्ण ने गऊ वंश रूपी दानव को मारा था , राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्थल पर कृष्ण से गंगा माँगी । बेचारे कृष्ण को कौन कौन से असंभव काम करने पड़े हैं । हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है दूसरों को सुखी बनाने के लिए । उसकी उँगली दूख रही है । चलो , उसको सहारा दें । गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने , जिनमें पंडे होते ही हैं , प्रश्न किया कि मैं कहाँ का हूँ ।</p>
<p align="left">    मैंने छेड़ते हुए उत्तर दिया , राम की अयोध्या का ।</p>
<p align="left">    पंडों ने जवाब दिया , सब माया एक है ।</p>
<p align="left">    जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्तू वाले राम से गोवर्धन वासियों का नेह कैसे चल सकता है । उनका दिल तो माखन - मिसरी वाले कृष्ण से लगा है ।</p>
<p align="left">    माखन - मिसरी वाला कृष्ण , सत्तू वाला राम कुछ सही है , पर उसकी अपनी उँगली अब तक दूख रही है ।</p>
<p align="left">    एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुई । पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोई नतीजा न निकला , न निकलने वाला था । लेकिन क्या मीठी मुसकान से उस पंडे ने कहा के जीवन में दो मीठी बात करनी सीख गया है , आसमान वाले देवताओं को भगा गया है , माखन - मिसरी वाले देवों की प्रतिष्ठा कर गया है । लेकिन उसका अपना कौन - कौन सा अंग अब तक दूख रहा है ।</p>
<p align="left">    कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया है , जिसने मनुष्य बनने की कोशिश की । उसका राज्य संसार में अधिक फैला । शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी जिन्दगी में वैभव और ऐश न था। शायद इसलिए कि जन - रक्षा का उसका अन्तिम काम ऐसा था कि उसकी उँगली सिर्फ़ न दूखी , उसके शरीर का रोम - रोम सिहरा और अंग - अंग टूट कर वह मरा । अब तक उसका ध्यान करके अपने सीमा बाँधने वाले चमड़े के बाहर उछलते हैं । हो सकता कि इसूमसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया है कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज की मालिक सभ्यता के पुरखे हैं । ईसू रोमियों पर चढ़ा । रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े । शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्ण - लीला का मजा ब्रज और भारत भूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्ण की नियति कठिन है । जो भी हो , कृष्ण और क्रिस्टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया । दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं - कहीं सादृश्य है । कभी दो महाजनों की तुलना नहीं करनी चाहिए । दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं ।फिर भी क्रिस्टोस प्रेम के आत्मोत्सर्गी अंग के लिए बेजोड़ है और कृष्ण सम्पूर्ण मनुष्य - लीला के लिए । कभी कृष्ण के वंशज भारतीय शक्तिशाली बनेंगे , तो सम्भव है उसकी लीला दुनिया भर में रस फैलाये ।</p>
<p align="left">    कृष्ण बहुत अधिक हिन्दुतान के साथ जुड़ा हुआ है । हिन्दुस्तान के ज्यादातर देव और अवतार अपनी मिट्टी के साथ सने हुए हैं । मिट्टी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्प्राण हो जाते हैं । त्रेता का राम हिन्दुस्तान की उत्तर - दक्षिण एकता का देव है । द्वापर का कृष्ण देश की पूर्व - पश्चिम धुरी पर घूमे । कभी - कभी तो ऐसा लगता है कि देश को उत्तर - दक्षिण और पूर्व - पश्चिम एक करना ही राम और कृष्ण का धर्म था ।यों सभी धर्मों की उत्पत्ति राजनीति से है , बिखरे हुए स्वजनों को इकट्ठा करना , कलह मिटाना , सुलह कराना और हो सके तो अपनी और सब की सीमा को ढहाना । साथ - साथ जीवन को कुछ ऊँचा उठाना , सदाचार की दृष्टि से और आत्म - चिन्तन की भी ।</p>
<p align="left">    देश की एकता और समाज के शुद्धि सम्बन्धी कारणों और आवश्यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्पत्ति हुई है । अलबत्ता , धर्म इन आवश्यकताओं से ऊपर उठ कर , मनुष्य को पूर्ण करने की भी चेष्टा करता है । किन्तु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है , उतना और कोई धर्म नहीं । कभी - कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्ण के किस्से तो मनगढन्त गाथायें हैं , जिनमें एक अद्वितीय उद्देश्य हासिल करना था , इतने बड़े देश के उत्तर - दक्षिण और पूर्व - पश्चिम को एक रूप में बाँधना था । इस विलक्षण उद्देश्य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्से बने । मेरा मतलब यह नहीं कि सबके सब किस्से झूठे हैं । गोवर्धन पर्वत का किस्सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है ही , साथ - साथ न जाने कितने और किस्से , जो कितने और आदमियों के रहे हों एक कृष्ण अथवा राम के साथ जुड़ गये हैं । जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ । यह भी हो सकता है कि कोई न कोई चमत्कारिक पुरुष राम और कृष्ण नाम के हुए हों । चमत्कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो । लेकिन उन गाथाकारों का यह कम अनहोना चमत्कार नहीं है , जिन्होंने राम और कृष्ण के जीवन की घटनाओं को इस इस सिलसिले और तफ़सील में बाँधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है ? आज के हिन्दुस्तानी राम और कृष्ण की गाथाओं की एक - एक तफ़सील को चाव से और सप्रमाण जानते हैं , जब कि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुँधली स्मृति मात्र रह गये हैं ।</p>
<p align="left">    महाभारत हिन्दुस्तान के की पूर्व - पश्चिम यात्रा है , जिस तरह रामायण उत्तर - दक्षिण यात्रा है । पूर्व - पश्चिम यात्रा का नायक कृष्ण है , जिस तरह उत्तर - दक्षिण यात्रा का नायक राम है । मणीपुर से द्वारका तक कृष्ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ हुआ है , जैसे जनकपुर से श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का । राम का काम अपेक्षाकृत सहज था । कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी । राम का मुकाबला या दोस्ती हुई भील , किरात , किन्नर , राक्षस इत्यादि से , जो उसकी अपनी सभ्यता से अलग थे । राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्यता में ढाल देना , चाहे हराये बिना या हराने के बाद ।</p>
<p align="left">    कृष्ण को वास्ता पड़ा अपने ही लोगों से । एक ही सभ्यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व - पश्चिम एकता कृष्ण को स्थापित करनी पड़ी । इस काम में पेंच ज्यादा थे । तरह - तरह की सन्धि और विग्रह का क्रम चला । न जाने कितनी चालाकियाँ और धूर्ततायें भी हुईं । राजनीति का निचोड़ भी सामने आया - ऐसा छन कर जैसा फिर और न हुआ । अनेकों ऊँचाइयाँ भी छू गयी । दिलचस्प किस्से भी खूब हुए । जैसी पूर्व - पश्चिम राजनीति जटिल थी , वैसे ही मनुष्यों की आपसी सम्बन्ध भी, खास कर मर्द-औरत के । अर्जुन की मणीपुर वाली चित्रांगदा , भीम की हिडिम्बा , और पांचाली का तो कहना ही क्या । कृष्ण की बुआ कुन्ती का एक बेटा था , अर्जुन , दूसरा कर्ण , दोनों अलग - अलग बापों से और कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया । फिर भी , क्यों जीवन का निचोड़ छन कर आया । क्योंकि कृष्ण जैसा निस्व मनुष्य न कभी हुआ और उससे बढ़ कर कभी होना ही असम्भव है। राम उत्तर - दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बना , राजा भी हुआ । कृष्ण तो पनी मुरली बजाता रहा । महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्ण ने कभी कुछ लिया नहीं , दिया ही ।</p>
<p align="left"><strong>( जारी )</strong></p>
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<title><![CDATA[दो माँ , दो बाप , दो नगर , दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक ( ले. लोहिया)]]></title>
<link>http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2007/04/27/%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%aa-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0/</link>
<pubDate>Fri, 27 Apr 2007 16:14:21 +0000</pubDate>
<dc:creator>अफ़लातून</dc:creator>
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<description><![CDATA[कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ , दो बा]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p align="left">कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ , दो बाप , दो नगर , दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक । जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है , वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गयी है । यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं , लेकिन यशोदानन्दन अधिक । ऐसे लोग भी मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ , पेट-माँ का नाम न जानते हों ,लेकिन बाद वाली दूध वाली , यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा । उसी तरह , वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं , और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़ कर ही रुतबा मिल गया है । द्वारका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं ,क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है । किन्तु यदि कृष्ण की चले , तो द्वारका और द्वारकाधीश , मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे । मथुरा से तो बाललीला और यौवनक्रीडा की दृष्टि से , वृन्दावन और  बरसाना वगैरह अधिक महत्वपूर्ण हैं । प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है । किसकी तुलना की जाय , रुक्मणी और सत्यभामा की , राधा और रुक्मणी की , या राधा और द्रौपदी की । प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा । अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरु की है । जो हो , अभी तो राधा ही बडभागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है । समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुँचाये , लेकिन इतना सम्भव नहीं लगता । हर हालत में , रुक्मणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी ।</p>
<p align="left">    मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख है । यह शारीरिक सीमा उसे अपना एक दोस्त , एक माँ , एक बाप , एक दर्शन वगैरह देती रहती है । किन्तु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है , मन ही के द्वारा उछल सकता है । कृष्ण उसी तत्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलाँघता-उलाँघता सब में मिला देता है , किसी से भी अलग नहीं रखता । क्योंकि कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्य लीला है , केवल सिद्धान्तों और तत्वों का विवेचन नहीं , इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रह कर दो और निरापनी हो गयी है । यों दोनों में ही कृष्ण का तो निरापना है , किन्तु लीला के तौर पर अपनी माँ , बीवी और नगरी से परायी बढ़ गयी है । पराई को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्म करना है । मथुरा का एकाधिपत्य खत्म करती है द्वारका , लेकिन उस क्रम में द्वारका अपना श्रेष्ठत्व जैसा कायम कर लेती है।</p>
<p align="left">    भारतीय साहित्य में माँ है यशोदा और लला हैं कृष्ण । माँ-लला का इन से बढ़ कर मुझे तो कोई सम्बन्ध मालूम नहीं , 