तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ू न हुई वो सई-ए-क़रम फ़रमा भी गये, उस सई-ए-क़रम का क्या कहिये बहला भी गये तड़पा भी गये, एक अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके, यहां हम ने ज़बां ही खोले थी वहां आंख झुकी शरम… more →
कुछ पल जगजीत सिंह के नामAmarjeet Singh wrote 2 years ago: तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ू न हुई वो सई-ए-क़रम फ़रमा भी गये, उस सई-ए-क़रम का क्या कहिये बहला भी गये तड़पा भी गये … more →