ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय न हुए -२ हज़ार बार रुके हम हज़ार बार चले -२ ना जाने कौन सी मट्टी वतन की मट्टी थी नज़र में धूल, जिगर में लिये गुबार चले हज़ार बार रुके हम हज़ार बार चले -२ ये कैसी सरहदें उलझी… more →
कुछ पल जगजीत सिंह के नामAmarjeet Singh wrote 2 years ago: ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय न हुए -२ हज़ार बार रुके हम हज़ार बार चले -२ ना जाने कौन सी मट्टी वतन क … more →