निकल न चौखट से घर की प्यारे जो पट के ओझल ठिटक रहा है सिमट के घट से तिरे दरस को नयन में जी आ, अटक रहा है अगन ने तेरी बिरह की जब से झुलस दिया है मिरा कलेजा हिया की धड़कन में क्या बताऊँ, ये कोयला-सा चटक … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 10 months ago: निकल न चौखट से घर की प्यारे जो पट के ओझल ठिटक रहा है सिमट के घट से तिरे दरस को नयन में जी आ, अटक रहा … more →
विनय wrote 10 months ago: ख़त आ चुका, मुझसे है वही ढंग अब तलक वैसा ही मिरे नाम से है नंग1 अब तलक देखे है मुझको अपनी गली में तो … more →