एक अधूरी ख़ाहिश लिए मैं भटक रहा हूँ दर-ब-दर, सुनसान ख़ाली सड़कों पर अँधेरा ही अँधेरा है, इन अँधेरों ने मेरे हाथ-पाँव बाँध दिए हैं और ये तन्हाई मेरा गला घोंट रही है शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 2 years ago: एक अधूरी ख़ाहिश लिए मैं भटक रहा हूँ दर-ब-दर, सुनसान ख़ाली सड़कों पर अँधेरा ही अँधेरा है, इन अँधेरों … more →