चले हैं आज ज़माने को आज़माये हुए ये देखो खून में अपने ही हम नहाये हुए न जाने मुझको हुआ कौन सा मक़ाम हासिल लुटा के घर भी चला हूं मै सर उठाये हुए ना उसकी ख़ता थी न थी ख़ता मेरी निकल रहे हैं मगर हम नज़र चुराये… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: चले हैं आज ज़माने को आज़माये हुए ये देखो खून में अपने ही हम नहाये हुए न जाने मुझको हुआ कौन सा मक़ाम हास … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: खाली है जिनका दामन वो हिसाब क्या देंगे सब सवाल ही गलत हैं फिर जवाब क्या देंगे हर तरफ़ हर जगह हर इक शर … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: हूँ चल रहा उस राह पर जिसकी कोई मंज़िल नहीं है जुस्तजू उस शख़्स की जो कभी हासिल नहीं वहम जाने ये मेरे इ … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: मै सजदे में उनके कुछ यूँ झुका था वो शरम कर के बोले सर को उठा लो हैं आँखों का काजल घटाओं सा फ़ैला कहीं … more →