आओ बच्चों खेल दिखायें छुक-छुक करती रेल चलायें सीटी दे कर सीट पे बैठो एक-दूजे की पीठ पे बैठो आगे-पीछे पीछे-आगे लाइन से लेकिन कोई न भागे सारी सीधी लाइन में चलना आँखें दोनों मीचे रखना बन्द आँखों से देखा … more →
शैशवअफ़लातून wrote 7 months ago: आओ बच्चों खेल दिखायें छुक-छुक करती रेल चलायें सीटी दे कर सीट पे बैठो एक-दूजे की पीठ पे बैठो आगे-पीछे … more →
अफ़लातून wrote 9 months ago: चलो भाई चारे को बोओ अक्कड मक्कड , धूल में धक्कड, दोनों मूरख, दोनों अक्खड, हाट से लौटे, ठाट से लौटे, … more →
अफ़लातून wrote 11 months ago: आज सुबह से नल था मौन , पता नहीं कारण था कौन ? मैंने पूछा तनिक पास से , भैय्या दिखते क्यों उदास से … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की, कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की, चमकने से जुगनु के था इक समा, हवा में उडे … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: यह मुरझाया हुआ फूल है, इसका हृदय दुखाना मत । स्वयं बिखरने वाली इसकी, पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥ गुजरो अ … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: Technorati tags: बाल कविता, बच्चों की के लिए, राजेन्द्र राजन, rajendr rajan, kid’s poetry, hin … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की, कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की, चमकने से जुगनु के था इक समाँ , हवा में … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: Technorati tags: poem, bhavaniprasadmishra [ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने आपात काल के खिलाफ़ कविताओं की त … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की, कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की, चमकने से जुगनु के था इक समा, हवा में उडे … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: आज सुबह से नल था मौन्, पता नहीं कारण था कौन ? मैंने पूछा तनिक पास से , भैय्या दिखते क्यों उदास से ? … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: सूरज का गोला, इसके पहले ही कि निकलता, चुपके से बोला,हमसे – तुमसे इससे – उससे कितनी चीजों … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: [आपात्काल के दौरान लिखी भवानी बाबू के कविताएं 'त्रिकाल सन्ध्या' में हैं.यहां बाल-कविता के रूप में लि … more →