हमारी इब्तेदा ही है हमारी इंतेहा शायद मुसीबत में भी अब आने लगा हमको मज़ा शायद मोहब्बत बन गई है जान-ओ-दिल का मस’अला शायद के हम से आशना होता है वो नाआशना शायद जो रातों को जगे रहना हुआ है मशग़ला शायद… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: हमारी इब्तेदा ही है हमारी इंतेहा शायद मुसीबत में भी अब आने लगा हमको मज़ा शायद मोहब्बत बन गई है जान-ओ- … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: बादलों ने करीं कुछ आसमाँ में साज़िशें हैं आजकल देखो तभी तो पत्थरों की बारिशें हैं ख़ुश्क़ गुमसुम और बिय … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: नया इक दिल जलाने का बहाना ढ़ूँढ़ लें आओ इन अश्क़ों के लिये कोई ठिकाना ढ़ूँढ़ लें आओ बड़ी मुद्दत से कोई भी … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: मै दिल की दीवारों से निकल आया हूँ मै ग़म के नज़ारों से निकल आया हूँ मुजरिमों कि क़तारों से निकल आया हूँ … more →