अपने आप में खोई,अकेली ही खड़ी थी | न जाने किस सोच में डूबी थी | लंबे घने गेसुओं को उसकी ,बहती हवा भी छूने को मचल पड़ी | कभी यूही ल़हेरा के छोड़ देती,कभी एक लट का टुकड़ा उसकी मुख मंडल पर रख देती | म… more →
mehekmehhekk wrote 1 year ago: अपने आप में खोई,अकेली ही खड़ी थी | न जाने किस सोच में डूबी थी | लंबे घने गेसुओं को उसकी ,बहती हवा भ … more →
mehhekk wrote 2 years ago: पानी की बूँदे आती है जो गालों पे अक्सर जब मन भर आए हे रूप अनेक इसके दिल को ये सेहेलाए ग़म अगर हो ज़् … more →