बुझती हुई लौ में रूकती हुई साँसों में आपके हर ग़मों के आहों में मैं नहीं मैं तो हु आपके हर अच्छे पलों का साथी नहीं में आपके ग़मों का साथी क्यूँ ? ये मैं भी न समझ पाया अब … more →
ɤȫʋʂɦɑɳ's ɯɛɓ-ɓɭӧģkalapiketan wrote 5 days ago: जख्म दिल पर (गझल) घनश्याम ठक्कर … more →
kalapiketan wrote 1 week ago: राधाकी व्यथा (गीत) घनश्याम ठक्कर … more →
Rahul Katyayan wrote 3 weeks ago: बरसों से बिना बात जिससे रूठा रहा, उस मुस्कराहट को खींच कर होठों पे लाने की ये कोशिश है सम्मान मैं इत … more →
Rahul Katyayan wrote 3 weeks ago: बरसों से बिना बात जिससे रूठा रहा, उस मुस्कराहट को खींच कर होठों पे लाने की ये कोशिश है सम्मान मैं इत … more →
kalapiketan wrote 3 weeks ago: बीमार तेरे नामके! (गीत) घन-’श्याम’ ठक्कर … more →
kalapiketan wrote 1 month ago: हमारी प्राथमिक शालामें कई अभिप्रेरक कविताएं पढनेकी/गानेकी परंपरा थी. आयु के उस सूर्योदय कालमें कुछ ऐ … more →
kalapiketan wrote 1 month ago: Music Deepavali – Festival of Lights Oasis Thacker … more →
MUKUL wrote 1 month ago: प्रिया,सहज ही तुमने क्योंकर भेजा मुझ तक प्रीत निमंत्रण ..! ********************* मैं विरही हूँ तुम प … more →
kalapiketan wrote 1 month ago: शहनाई (सिंथेसाइझर) वादन संगीतकार और वादकः घनश्याम ठक्कर Happy Diwali Music Composer & Performe … more →
kalapiketan wrote 1 month ago: घूमता है (गझल) घनश्याम ठक्कर … more →
Roushan wrote 1 month ago: बुझती हुई लौ में रूकती हुई साँसों में आपके हर ग़मों के आहों में मैं नहीं मैं तो हु आप … more →
kalapiketan wrote 1 month ago: ओ राज रे (हीच – गरबा) संगीतः: घनश्याम ठक्कर गीतः लोकगीत और घनश्याम ठक्कर स्वरः ज … more →
kalapiketan wrote 1 month ago: पोरा पै दे तुं (छैला पिलादे तू) [रास] संगीतः घनश्याम ठक्कर … more →
kalapiketan wrote 2 months ago: ढोल वागे से (ढोल बजने लगा) [डांडियारास] संगीतः: घनश्याम ठक्कर गरबा-रास … more →
kalapiketan wrote 2 months ago: नव-रात्रि : नव-रास घनश्याम ठक्कर … more →
kalapiketan wrote 2 months ago: नवरात्री और डांडियारास घनश्याम ठक्कर … more →
simplysunidhi wrote 2 months ago: बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो मैं आँचल यकीन का बिछाये उन्हें समेटती रही…. अपने स्पर्श की नमी से वो उ … more →
Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष wrote 2 months ago: सुबह से ले के शाम तक, जूतों से ले के गेहूं- दाल तक, सब खरीदते-बेचते हैं ठाठ में भीड़ भरी इतवार की हाट … more →
Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष wrote 2 months ago: ——पहली—— (जोगिन्दर साहब, आप से आज हुई बातों से प्रेरित । आपके आगरे के घर की … more →