यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं मेरे इस जिस्म की गीली मिट्टी से किसी ने कभी न छुआ ऐसे मुझे जिस तरह से छुआ है तूने मुझको मैं बहुत भटका ह… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 10 months ago: यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं मेर … more →