क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दिल में ख़ुद के ही, आज! क्यों नहीं हूँ कोशिशे-इश्क़ में, ख़ुद के ही आज? मग़रूर तो हूँ मैं, मजबूर भी हूँ… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दि … more →