और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते वह हमसे अय्यारी नहीं तो और क्या फ़रमाते हमारी क़िस्मत में जीते-जी फ़ना होना लिखा था क्योंकर न हम अपने रक़ीबों से मात खाते मैं ही मिला अपने ख़ुदा को इस सबके लिए हरीफ़ाना क्य… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते वह हमसे अय्यारी नहीं तो और क्या फ़रमाते हमारी क़िस्मत में जीते-जी फ़ना … more →