काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप आंखों में सुलग रही हैं चिनगारियां हड्डियों में छिपा है ज्वर पैरों में घूम रहा है कोई विक्षिप्त वेग चीज़ों को उलट… more →
समाजवादी जनपरिषदअफ़लातून wrote 10 months ago: काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप आंखों में स … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: वे हर वक्त पिले रहते हैं इतिहास में अपनी जगह बनाने में सिर्फ उन्हें मालूम है कितनी जगह है इति … more →