मैं दिए गए विषयों पर सोचता हूं मैं दी हुई भाषा में लिखता हूं मैं सुर में सुर मिला कर बोलता हूं ताकि जिंदगी चलती रहे ठीकठाक मिलती रहे पगार घर छूटे हो गए हैं बरसों अब मैं लौटना चाहता हूं अपनी भाषा में अ… more →
यही है वह जगहअफ़लातून wrote 4 months ago: श्रेय पत्थर अगर तेरहवें प्रहार में टूटा तो इसलिए टूटा कि उस पर बारह प्रहार हो चुके थे तेरहवां प्रह … more →
अफ़लातून wrote 4 months ago: मैं दिए गए विषयों पर सोचता हूं मैं दी हुई भाषा में लिखता हूं मैं सुर में सुर मिला कर बोलता हूं ताकि … more →
अफ़लातून wrote 4 months ago: छुटपन में ऐसा होता था अक्सर कि कोई टोके कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हार … more →
अफ़लातून wrote 10 months ago: काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप आंखों में स … more →
अफ़लातून wrote 10 months ago: एक सभा में एक श्रोता के रूप में बहुत-सी सभाओं ने लिया था मेरा समय लेकिन पहली बार एक श्रोता के तौर पर … more →
अफ़लातून wrote 10 months ago: मैदान में जैसे ही पहला पहलवान आया उसकी जयकार शुरु हो गई उसी जयकारे को चीरता हुआ दूसरा पहलवान आया और … more →
अफ़लातून wrote 10 months ago: वे कभी बहस नहीं करते या फिर हर वक़्त बहस करते हैं वे हमेशा एक ही बात पर बहस करते हैं या फिर बहुत-सी … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: अयोध्या का यही अर्थ हम जानते थे जहाँ न हो युद्ध हो शांति का राज्य अयोध्या की यही नीति हम जानते थे ज … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हा … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: वे जान गए हैं कि नहीं उछाला जा सकता वही शब्द हर बार क्योंकि उसका अर्थ पकड़ में आ चुका होता है इसीलि … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: शब्दों में चाहे जितना सार हो मगर बेकार है शब्दों में चाहे जितना प्यार हो मगर बेकार है शब्दों में चाह … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: जैसे बीज पुकारता है बीज को जैसे खोज पुकारती है खोज को जैसे राह पुकारती है राह को शब्द, शब्द को पुका … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: शब्दों में शब्द जोड़ते मैं वहाँ आ पहुंचा हूं जहां और शब्द नहीं मिलते मैं क्या करूँ अब मैं कैसे लिखूं … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: सभ्यता के उत्तरार्ध में शब्दश: कुछ भी नहीं होगा जो भी होगा वह अपने लेबलों से कम होगा लेबलों के बाहर … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: महान होने के लिए जितनी ज्यादा सीढ़ियाँ मैंने चढ़ीं उतनी ही ज्यादा क्रूरताएं मैंने कीं ज्ञानी होने के … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: निश्चिन्त होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से अपनी बंदूकों , तोपों , बचे हुए विस्फोट … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: Technorati tags: बाल कविता, बच्चों की के लिए, राजेन्द्र राजन, rajendr rajan, kid’s poetry, hin … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: शब्दों से ढका हुआ है सब कुछ मैंने कहा फूल एक शब्द ने फूल को छिपा लिया मैंने कहा पहाड़ एक शब् … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: कोयला , लोहे का कबाड़ , रेलवे के ठेके, निर्माण , और ड्रग के धन्धे से जुड़ा बृजेश सिंह भुवनेश्वर म … more →