चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हारे होकर भी और इस लड़त में जब हमारी कामयाबी का रास्ता खुला और वे शब्द लोगों के घरों और दिलो-दिमाग़ में … more →
यही है वह जगहअफ़लातून wrote 2 weeks ago: चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हा … more →
अफ़लातून wrote 9 months ago: श्रेय पत्थर अगर तेरहवें प्रहार में टूटा तो इसलिए टूटा कि उस पर बारह प्रहार हो चुके थे तेरहवां प्रह … more →
अफ़लातून wrote 9 months ago: मैं दिए गए विषयों पर सोचता हूं मैं दी हुई भाषा में लिखता हूं मैं सुर में सुर मिला कर बोलता हूं ताकि … more →
अफ़लातून wrote 9 months ago: छुटपन में ऐसा होता था अक्सर कि कोई टोके कि फल के साथ ही तुमने खा लिया है बीज इसलिए पेड़ उगेगा तुम्हार … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: काफी दिनों से रोज़ – रोज़ की बेचैनियां इकट्ठा हैं हमारे भीतर सीने में भभक रही है भाप आंखों में स … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: एक सभा में एक श्रोता के रूप में बहुत-सी सभाओं ने लिया था मेरा समय लेकिन पहली बार एक श्रोता के तौर पर … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: मैदान में जैसे ही पहला पहलवान आया उसकी जयकार शुरु हो गई उसी जयकारे को चीरता हुआ दूसरा पहलवान आया और … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: वे कभी बहस नहीं करते या फिर हर वक़्त बहस करते हैं वे हमेशा एक ही बात पर बहस करते हैं या फिर बहुत-सी ब … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: अयोध्या का यही अर्थ हम जानते थे जहाँ न हो युद्ध हो शांति का राज्य अयोध्या की यही नीति हम जानते थे जह … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: चिराग़ की तरह पवित्र और जरूरी शब्दों को अंधेरे घरों तक ले जाने के लिए हम आततायियों से लड़ते रहे थके-हा … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: वे जान गए हैं कि नहीं उछाला जा सकता वही शब्द हर बार क्योंकि उसका अर्थ पकड़ में आ चुका होता है इसीलिए … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: शब्दों में चाहे जितना सार हो मगर बेकार है शब्दों में चाहे जितना प्यार हो मगर बेकार है शब्दों में चाह … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: जैसे बीज पुकारता है बीज को जैसे खोज पुकारती है खोज को जैसे राह पुकारती है राह को शब्द, शब्द को पुका … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: शब्दों में शब्द जोड़ते मैं वहाँ आ पहुंचा हूं जहां और शब्द नहीं मिलते मैं क्या करूँ अब मैं कैसे लिखूं … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: सभ्यता के उत्तरार्ध में शब्दश: कुछ भी नहीं होगा जो भी होगा वह अपने लेबलों से कम होगा लेबलों के बाहर … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: महान होने के लिए जितनी ज्यादा सीढ़ियाँ मैंने चढ़ीं उतनी ही ज्यादा क्रूरताएं मैंने कीं ज्ञानी होने के ल … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: निश्चिन्त होकर वे जा चुके थे उस सुनसान जगह से अपनी बंदूकों , तोपों , बचे हुए विस्फोट … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: Technorati tags: बाल कविता, बच्चों की के लिए, राजेन्द्र राजन, rajendr rajan, kid’s poetry, hin … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: शब्दों से ढका हुआ है सब कुछ मैंने कहा फूल एक शब्द ने फूल को छिपा लिया मैंने कहा पहाड़ एक शब्द … more →