लहर इक ‘विनय’ टकराया जो पत्थर से टूट गया जब भी निकला आगे उसके हाथों से एक हाथ छूट गया जब भी बैठता है वो यारों के साथ तन्हा बैठता है उसकी यारी इक ख़ता निकली पास जिसके भी गया वो रूठ गया लहर इक ‘विनय’ टक… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 2 years ago: लहर इक ‘विनय’ टकराया जो पत्थर से टूट गया जब भी निकला आगे उसके हाथों से एक हाथ छूट गया जब भी बैठता है … more →