आओ बच्चों खेल दिखायें छुक-छुक करती रेल चलायें सीटी दे कर सीट पे बैठो एक-दूजे की पीठ पे बैठो आगे-पीछे पीछे-आगे लाइन से लेकिन कोई न भागे सारी सीधी लाइन में चलना आँखें दोनों मीचे रखना बन्द आँखों से देखा … more →
शैशवshadyshades wrote 4 months ago: चाहता हूँ मैं , कोई शबदों मॅ बाँध दे मुझे लिखे कुछ मेरे लिए , नया अंदाज दे मुझे दो चार ख़याल जो हैं … more →
shadyshades wrote 7 months ago: वह वृक्ष अकेला, विशाल, बिन पत्ती का वृक्ष देखने मे भले कितना अच्छा लगता हो मगर जान लो यह की उसके साथ … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: आओ बच्चों खेल दिखायें छुक-छुक करती रेल चलायें सीटी दे कर सीट पे बैठो एक-दूजे की पीठ पे बैठो आगे-पीछे … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: आज सुबह से नल था मौन , पता नहीं कारण था कौन ? मैंने पूछा तनिक पास से , भैय्या दिखते क्यों उदास से ? … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की, कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की, चमकने से जुगनु के था इक समा, हवा में उडे … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: यह मुरझाया हुआ फूल है, इसका हृदय दुखाना मत । स्वयं बिखरने वाली इसकी, पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥ गुजरो अग … more →
अफ़लातून wrote 1 year ago: [ 'भवानी प्रसाद मिश्र के आयाम' , संपादक लक्ष्मण केड़िया,विशेषांक 'समकालीन सृजन' , २० बलमुकुंद मक्कर र … more →
अफ़लातून wrote 2 years ago: Technorati tags: poem, bhavaniprasadmishra [ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने आपात काल के खिलाफ़ कविताओं की त … more →