सुलझी कभी, कभी अनसुलझी पहेली बन जाता है, जब मुट्ठी खोल कर यों ही बंद कर जाता है| कानों में काँच की चूङी सा खनक जाता है, जब बिन बात यों ही तू खिलखिलाता है| कोठरी के रोशनदान सा चमक जाता है, जब झप से झप-… more →
पलाशshipsag wrote 1 year ago: सुलझी कभी, कभी अनसुलझी पहेली बन जाता है, जब मुट्ठी खोल कर यों ही बंद कर जाता है| कानों में काँच की च … more →
shipsag wrote 2 years ago: कभी किसी बिछङे से पूछो, कैसे घर की याद सताती है| बारिश में सौन्धी हुई मिट्टी, मन भीतर तक गीला कर जात … more →
shipsag wrote 2 years ago: बरसों बाद खुले,कुछ पुरानी किताबों के पन्ने| उम्र के बोझ तले,पीले साँचे में ढले, पन्ने कुछ अधखुले,आज … more →
shipsag wrote 3 years ago: हमारे एक मित्र Entomologist हैं, अर्थात कीट-विज्ञान शास्त्री|एक दिन उनसे मिलने के लिये हम उनकी लैबोर … more →
shipsag wrote 3 years ago: नये ज़माने के रंग में, पुरानी सी लगती है जो| आगे बढने वालों के बीच, पिछङी सी लगती है जो| गिर जाने पर … more →